Topics

समय और स्थान



क़लंदर शऊर यह स्पष्ट करता है कि मानसिकता को संसारिक बंधनों और भौतिक गतिविधियों से मुक्त करने के लिए विशेष अभ्यासों की आवश्यकता होती है। इन अभ्यासों का उद्देश्य मन को अस्थायी रूप से भौतिक संसार से पृथक करना है। जब इन अभ्यासों के माध्यम से मन एकाग्रता की स्थिति तक पहुँचता है और संसार की महत्ता समाप्त हो जाती है—यानी संसारिक कार्य मात्र यांत्रिक दिनचर्या बन जाते हैं—तब व्यक्ति की आध्यात्मिक क्षमताएँ सक्रिय होने लगती हैं। जैसे ही ये आध्यात्मिक क्षमताएँ सक्रिय होती हैं और मन पूरी तरह इन पर केंद्रित होता है, चेतना पर छाया पीले रंग का आवरण टूटने लगता है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, समय और स्थान की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। व्यक्ति जाग्रत अवस्था में रहते हुए भी ऐसे कार्य करने में सक्षम हो जाता है, जो सामान्य रूप से स्वप्न अवस्था में ही संभव होते हैं। ध्यान (मेडिटेशन) की अवस्था में, जब व्यक्ति अपनी आँखें बंद किए हुए होता है, तब उसे यह तीव्र अनुभव होता है कि वह शारीरिक रूप से पृथ्वी पर बैठा हुआ है, लेकिन इसके बावजूद वह स्वयं को चलता-फिरता, उड़ता हुआ, और दूरस्थ स्थानों पर पहुँचता हुआ देखता है। यह अनुभव उसे स्थान और दूरी की सीमाओं से परे, अस्तित्व की नई परिभाषाएँ समझने में सक्षम बनाता है।

Topics


कलंदर शऊर(Qalandar Shaoor)

ख्वाजा शम्सुद्दीन अजीमी

कलंदर शऊर

 

अच्छी है बुरी है, दुनिया (dahr) से शिकायत मत कर।
जो कुछ गुज़र गया, उसे याद मत कर।
तुझे दो-चार सांसों (nafas) की उम्र मिली है,
इन दो-चार सांसों  (nafas)  की उम्र को व्यर्थ मत कर।

 

(क़लंदर बाबा औलिया)