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विचार
कहाँ से आता है? यह बात गम्भीर चिन्तन की है। यदि हम इन प्रश्नों की ओर
ध्यान न दें तो असंख्य सत्य गुप्त रह जाएँगे और उन सत्यों की श्रृंखला, जिसकी
सौ प्रतिशत कड़ियाँ इसी विषय को समझने पर निर्भर हैं, अनजानी
रह जाएगी। जब मन में कोई विचार आता है तो उसका कोई न कोई ब्रह्मांडीय
कारण अवश्य होता है। विचार का आना इस बात का प्रमाण है कि मन के परदों में गति हुई
है। यह गति मन की अपनी नहीं हो सकती। इसका सम्बन्ध उन ब्रह्मांडीय तन्तुओं से है
जो ब्रह्मांड की व्यवस्था को एक विशेष क्रम में गतिशील रखते हैं। उदाहरणार्थ, जब
वायु का कोई तीव्र झोंका आता है तो इसके यह अर्थ होते हैं कि वायुमण्डल में कोई
परिवर्तन घटित हुआ। उसी प्रकार जब मनुष्य के ज़ेह्न में कोई वस्तु प्रविष्ट होती
है तो उसके अर्थ भी यही हैं कि मनुष्य के अवचेतन में कोई गति प्रकट हुई है। इसे
समझना स्वयं मानवीय ज़ेह्न की खोज पर आधारित है। ज़ेह्न के दो पृष्ठभाग होते
हैं। एक पृष्ठभाग वह है
जो व्यक्ति की ज़ेह्नी गति को ब्रह्मांडीय गति से जोड़ता है—अर्थात्
यह गति व्यक्ति के इरादों और अनुभूतियों को व्यक्ति के ज़ेह्न तक लाती है। ज़ेह्न के
दोनों पृष्ठभाग दो
प्रकार की इन्द्रिय-शक्तियाँ उत्पन्न करते हैं। यदि एक पृष्ठभाग की
सृष्टि को सकारात्मक इन्द्रियाँ कहें
तो दूसरे पृष्ठभाग की
सृष्टि को नकारात्मक इन्द्रियाँ कह
सकते हैं। वस्तुतः सकारात्मक इन्द्रियाँ एक अर्थ में इन्द्रियों का विभाजन हैं। यह
विभाजन जाग्रत अवस्था में घटित होता है। इस विभाजन के अंग शारीरिक अवयव हैं। इस
प्रकार हमारी शारीरिक क्रियाशीलता में यही विभाजन कार्य करता है। एक ही समय में
नेत्र किसी एक विभाग को देखते हैं और कर्ण किसी ध्वनि को सुनते हैं। हस्त किसी
तीसरी वस्तु में संलग्न होते हैं और पाद किसी चौथी वस्तु की माप करते हैं। जिह्वा
किसी पाँचवीं वस्तु के स्वाद में और घ्राणेन्द्रिय किसी अन्य वस्तु को सूँघने में
व्यस्त रहती है। और मस्तिष्क में इन सब से भिन्न कितने ही अन्य विचार आते रहते
हैं। यही सकारात्मक इन्द्रियों की कार्यप्रणाली है, किन्तु
इसके विपरीत नकारात्मक इन्द्रियों में जो प्रेरणाएँ होती हैं उनका सम्बन्ध मनुष्य
के इरादे से नहीं होता।
उदाहरण के लिए, स्वप्न में यद्यपि उपर्युक्त समस्त इन्द्रियाँ कार्य करती हैं, किन्तु शारीरिक अवयवों के निश्चल होने से यह संकेत मिल जाता है कि इन्द्रियों
का संकलन केवल एक ही मानसिक बिंदु में है। स्वप्न की अवस्था में उस बिंदु के भीतर
जो गति घटित होती है, वही गति जागृति में शारीरिक अवयवों के भीतर विभाजित
हो जाती है।
विभाजन होने से पूर्व हम उन इन्द्रियों को नकारात्मक इन्द्रियाँ कह सकते हैं, किन्तु शारीरिक अवयवों में विभाजित होने के बाद उन्हें सकारात्मक कहना उचित होगा। यह बात विचारणीय है कि नकारात्मक और
सकारात्मक दोनों इन्द्रियाँ एक ही पृष्ठभाग में स्थित नहीं रह सकतीं। उनका निवास मन की दोनों पृष्ठभागों में मानना पड़ेगा। तसव्वुफ़ की परिभाषा में नकारात्मक पृष्ठभाग का नाम नस्मा-ए-मुफ़रद और सकारात्मक पृष्ठभाग का नाम नस्मा-ए-मुरक्कब लिया जाता है।
नस्मा-ए-मुरक्कब ऐसी गति का नाम है जो निरंतर घटित होती रहती है—अर्थात् एक क्षण, दूसरा क्षण, फिर तीसरा क्षण और इस प्रकार क्षण पर क्षण गति होती
रहती है। इस गति की कालिकता क्षणों में है जिसमें एक ऐसी व्यवस्था पाई जाती है जो कालिकता
का निर्माण करती है। प्रत्येक क्षण एक स्थान है। इस प्रकार सम्पूर्ण कालिकता क्षणों
की गिरफ्त में है। क्षण ऐसी बंदिश करते हैं जिसके भीतर कालिकता स्वयं को बंधा हुआ
पाती है और क्षणों के नेहर में परिभ्रमण और ब्रह्मांडीय चेतना में स्वयं को
उपस्थित रखने पर विवश है। मूल क्षण
ईश्वर के ज्ञान में उपस्थित हैं और जिस ज्ञान का यह शीर्षक है, ब्रह्मांड उसी ज्ञान की व्याख्या और अभिव्यक्ति है। ईश्वर ने क़ुरआन में आदेश दिया है कि मैंने हर वस्तु को दो पहलुओं पर
उत्पन्न किया है। अतः सृष्टि के यही दो पहलू हैं। सृष्टि का एक पहलू स्वयं क्षण हैं, अर्थात् क्षणों का आंतरिक भाग या एकवर्ण चेतना। और
दूसरा पहलू क्षणों का बाहरी भाग या बहुवर्ण चेतना। एक ओर क्षणों
की गिरफ्त में ब्रह्मांड है और दूसरी ओर क्षणों की गिरफ्त में ब्रह्मांड के
व्यक्ति हैं। क्षण एक साथ दो पृष्ठभागों में गति करते हैं। एक पृष्ठभाग की गति ब्रह्मांड की
प्रत्येक वस्तु में अलग-अलग घटित
होती है। यह गति उस चेतना का निर्माण करती है जो वस्तु को उसकी विशिष्ट सत्ता के
दायरे में बनाए रखती है। दूसरी पृष्ठभाग की गति ब्रह्मांड की समस्त वस्तुओं में एक
साथ प्रवाहित है। यह गति उस चेतना का निर्माण करती है जो ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं
को एक ही मंडल में उपस्थित रखती है। क्षणों की एक
पृष्ठभाग में ब्रह्मांडीय व्यक्ति अलग-अलग विद्यमान
हैं—अर्थात् व्यक्तियों की चेतना भिन्न-भिन्न है। क्षणों की दूसरी पृष्ठभाग में ब्रह्मांड के
सभी व्यक्तियों की चेतना एक ही बिंदु पर केन्द्रित है। इस प्रकार क्षणों की दोनों
पृष्ठभाग दो चेतनाएँ हैं—एक पृष्ठभाग
व्यक्तिगत चेतना और दूसरी पृष्ठभाग सामूहिक चेतना। सामान्य परिभाषा में सामूहिक
चेतना को ही अवचेतन कहा जाता है।
यदि हम ब्रह्मांड को एक व्यक्ति मान लें और ब्रह्मांड
के भीतर की वस्तुओं को उसके अवयव मान लें, तो ब्रह्मांडीय चेतना को केन्द्रीय चेतना कहेंगे। फिर उसी केन्द्रीय चेतना के विभाजन का नाम व्यक्तिगत चेतना होगा। वास्तव में एक ही चेतना है जो ब्रह्मांड की हर
वस्तु में अलग-अलग प्रवाहित हो रही है। उदाहरण के
लिए, किसी व्यक्ति की चेतना में उसके अपने विशेष परिवेश की
वस्तुएँ होती हैं। अर्थात् क्षणों की एक पृष्ठभाग उस विशेष समय में व्यक्ति की
चेतना का निर्माण करती है, और साथ ही क्षणों की दूसरी पृष्ठभाग में ब्रह्मांड के
कण-कण की प्रेरणाएँ प्रवाहित होती हैं। यही स्थिति केन्द्रीय चेतना की है। अब हम इस प्रकार कह सकते हैं कि व्यक्ति को
परिवेश की जानकारी क्षणों की ऊपरी पृष्ठभाग से होती है और ब्रह्मांड की पूर्ण
जानकारी क्षणों की निचली पृष्ठभाग से मिल सकती है। क्षणों की
निचली पृष्ठभाग व्यक्ति की केन्द्रीय चेतना है। उसी में अनादि से अनन्त तक का पूरा
लेखा-जोखा उपस्थित है। और क्षणों की एक पृष्ठभाग व्यक्ति
की अस्थायी चेतना है और क्षणों की दूसरी पृष्ठभाग व्यक्ति की शाश्वत चेतना है।
व्यक्ति की शाश्वत चेतना (अवचेतन) में अनादि से अनन्त तक की समस्त प्रेरणाएँ एक ही क्षण
में स्थित हैं। हम इसे अमर क्षण कहेंगे। यही क्षण व्यक्ति की चेतना की गहराई है। इसी
क्षण के लिए हुज़ूर अलैहि अस्सलातो वस्सलाम ने कहा:
"ली मा’अ अल्लाहि वक़्तु- لِیْ مَعَ اللّٰہِ وَقْتُ
अनुवाद: समय में मेरा और अल्लाह का साथ है।
यही क्षण वास्तविक है। समय-नेहर इसी क्षण की एक शाखा है। यही क्षण ज्ञान-ए-इलाही है। इसी क्षण को प्रत्यक्ष ज्ञान (इल्म ह़ुज़ूरी) कहा जाता है। इसी क्षण के भीतर परमात्मा की वे गुणधर्म एकत्र हैं जिन्हें कुरआन पाक में “शेयू़न” कहा गया है। हमारा उद्देश्य यहाँ परमात्मा के सभी
गुणधर्मों का उल्लेख करना नहीं है। परमात्मा के गुणधर्म तो अनन्त हैं। यहाँ केवल
उन गुणधर्मों का वर्णन है जो ब्रह्मांड से परिचित हैं। यह क्षण जिसे हमने ज्ञान-ए-इलाही कहा है, उसी क्षण के भीतर इरादा-ए-इलाही प्रवाहित है और इरादा-ए-इलाही के ही अंश समय-नेहर हैं।
अकाल (लाज़मान) और काल (ज़मान) की व्याख्या अनेक प्रकार हो सकती है। आदिकाल से ही नबियों (अलैहि अस्सलातो वस्सलाम) ने परमात्मा और परमात्मा के आदेश का परिचय कराया है। नबियों ने अपनी शिक्षा
में सदैव इस पर बल दिया है कि स्वरूप-ए-निरपेक्ष सत्ता(ज़ात-ए-मुतलक़) को समझना अनिवार्य है। बिना स्वरूप-ए-निरपेक्ष
सत्ताको समझे उसके आदेश (अमर) को समझना सम्भव नहीं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि अमर (आदेश) क्या स्वयं अमर को समझने का उत्तरदायी हो सकता है? इसका उत्तर हाँ में देना होगा। यदि अमर किसी बात का उत्तरदायी है तो
वह बात केवल यह हो सकती है कि अमर अपनी वास्तविकता की तलाश स्वामी-अमर (साहिब-ए-अमर) के परिचय से करे। तब यह सम्भावना निकलती है कि अमर अपने विषय में बोध उत्पन्न
कर सके और अपनी गहनता को जान ले। बिना स्वरूप-ए-निरपेक्ष
सत्ताके परिचय के अमर अपनी वास्तविकता को नहीं पहचान सकता। जब मूसा अलैहि अस्सलातो वस्सलाम ने कोह-ए-तूर पर रोशनी देख कर प्रश्न किया—“कौन?” तो परमात्मा ने उत्तर में फरमाया—“मैं हूँ तेरा रब।” इसी घटना से स्वरूप-ए-निरपेक्ष सत्ताऔर स्वरूप-ए-अमर की सीमाओं का ज्ञान मिलता है। मूसा अलैहि अस्सलातो वस्सलाम स्वरूप-ए-अमर हैं और परमात्मा स्वरूप-ए- निरपेक्ष सत्ता साथ ही परमात्मा का गुण रब्बानियत और मूसा अलैहि अस्सलातो वस्सलाम की स्थिति मर्बूबियत प्रकट होती है। एक ओर स्वरूप-ए-निरपेक्ष
सत्ताऔर उसके गुणधर्म, दूसरी ओर स्वरूप-ए-अमर और उसकी
आवश्यकता। यही वे चार बातें हैं जिन पर ज्ञान-ए-नुबुव्वत (विज्ञान-ए-नबी) का आधार है। कुछ लोगों ने अपने अभिव्यक्ति-पद्धति में स्वरूप-ए-निरपेक्ष सत्ताको सत्य-ए-निरपेक्ष
सत्ता(हक़ीक़त-ए-मुतलक़ा) कहा है और स्वरूप-ए-अमर निरपेक्ष
सत्ता को ब्रह्मांड कहा है। यह पद्धति हिकमत-ए-रब्बानी (दैवी दार्शनिकों) की है। नबियों और दार्शनिकों में यह अन्तर है कि नबी भीतर से बाहर को खोजते
हैं और दार्शनिक बाहर से भीतर को खोजते हैं। किसी सीमा तक दार्शनिकों की पद्धति
गलत नहीं है, लेकिन उसमें एक कमी है कि जिन चिन्हों को वे बाहर
नहीं देखते, उन्हें उपेक्षा कर देते हैं।
इस प्रवृत्ति से ब्रह्मांड की रचना में जितने सत्य छिपे हैं वे अधिकतर अज्ञात रह
जाते हैं। नबियों की प्रवृत्ति में यह कमी नहीं। वे स्वरूप-ए-निरपेक्ष सत्ताके
माध्यम से अमर-मुतलक़ की खोज करते हैं। इस प्रकार उनकी चिन्तन-धारा उन तत्वों तक पहुँचती है जो केवल प्रपंच (मज़ाहिर) के बन्धन में
नहीं हैं। नबी प्रपंच को नज़रअंदाज़ नहीं करते, किन्तु वे प्रपंच को मूल मान कर केवल उसी की रोशनी में गुम नहीं हो जाते। वे
प्रपंच को उतनी ही महत्ता देते हैं जितनी उसकी मूलों (असलों) को। नबियों
की भाषा में प्रपंच की मूलों का नाम गुणधर्म-ए-इलाही ए इलाहीया) है। वे इन्हीं गुणों के माध्यम से स्वरूप-ए-निरपेक्ष सत्तातक पहुँचते हैं। उन पर स्वरूप-ए-निरपेक्ष
सत्ताकी मसलहतें (गूढ़ रहस्य
और हित) उद्घाटित हो जाती हैं। तब उनके लिए
यह असम्भव हो जाता है कि उन मस्लहतों को उपेक्षा कर दें या
उन्हें जीवन का उद्देश्य न बनाएं। नबियों के चिन्तन में स्वरूप-ए-निरपेक्ष
सत्ताही जीवन है। इसलिए वे जीवन को अनन्त (अब्दी) मानने पर विवश हैं। इसी प्रकार उनके दृष्टिकोण में यहाँ से ब्रह्मांड द्वितीयक
स्तर में प्रवेश करता है। इसके विपरीत
प्रपंच को प्राथमिक मानने वाले जीवन की सम्पूर्ण गहराइयों और विस्तारों तक नहीं
पहुँच सकते।
नबियों ने यह बात अनुसंधान की है कि मानव-विचार में ऐसी प्रकाश-रेखा मौजूद है जो किसी प्रकट के आंतरिक का, किसी उपस्थित के गुप्त का अवलोकन कर सकती है। और गुप्त का अवलोकन उपस्थित के
अवयवों की विश्लेषण-प्रक्रिया
में सफल हो जाता है। अन्य शब्दों में यदि हम किसी वस्तु के आंतरिक को देख सकें तो
फिर उसके प्रकट का छिपा रहना सम्भव नहीं है। इस प्रकार प्रकट की व्यापकताएँ मानव-मन पर उद्घाटित हो जाती हैं और यह जानने की
सम्भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं कि जीवन की आदि कहाँ से होती है और अन्त कहाँ तक
है। नबी मृत्यु के बाद की जीवन पर इसी लिए बल देते हैं।