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काल–अकालिक की व्याख्या अकालिक कोण से

 

काल और अकालिक दो भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं। रोशनी से मिलने वाली सूचनाओं की जो समतल हमारे सामने है हम उसे अकालिक कहते हैं और जो समतल निगाह से ओझल है उसे काल का नाम देते हैं। वास्तव में ये दोनों समतल मिलकर एक इकाई हैं। चेतना की ऊपरी समतल में यह क्षमता नहीं है कि वह एक साथ असंख्य वस्तुओं को देख सके, सुन सके और समझ सके। यह क्रमशः एकएक वस्तु को देखती, सुनती और समझती है। इन्द्रियों की इस क्रमबद्धता में जो अवस्थाएँ आती हैं उन्हें विराम, आन, क्षण आदि विविध शब्दों से पुकारा जाता है। यही काल के अंश हैं। जब इन अंशों को निगाह देखती है, कान सुनते हैं, ज़ेह्न समझता है तो अकालिक की रचना होती है।

यद्यपि ब्रह्माण्ड की बनावट अत्यधिक जटिल नहीं है किन्तु मानवविचार इस बनावट को अपरिचित होने के कारण जटिल समझता है। विषय अत्यन्त सरल है। उसका कहना और समझना भी सहज है। अनन्तता का एक लोक है। यह लोक ब्रह्माण्ड के पार स्थित होकर सम्पूर्ण आकाशगंगातंत्रों को आच्छादित करता है। सम्पूर्ण आकाशगंगाओं को इस लोक से बोध वितरित होता है। यह बोध असंख्य क्षणों से होकर प्रवाहित होता है। यही क्षण आकाशगंगातंत्रों का रूप और संरचना धारण कर लेते हैं। किसी परमाणु के सूक्ष्मतम अंश और किसी ग्रह के विराट्तम पिण्ड का प्रकट होना एक ही क्षण में घटित होता है। इस तथ्य को अन्य प्रकार से भी कहा जा सकता है कि ब्रह्माण्ड के बोध में गति होती है, स्वयं अनन्तता में गति नहीं होती। यह गति एक इकाई, एक सत्ता अथवा ईश्वरीय संकल्प है और दो सतहों पर आधारित हैएक काल और दूसरा अकालिक ये दोनों जुड़वाँ हैं और एकदूसरे का प्रतिपादन करते हैं। कुरआनपाक में ईश्वर ने काल को "अमर" और अकालिक को "ख़लक़" कहा है।


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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai