जब ईश्वर ने ब्रह्मांड की रचना की और कुन कहा, उस समय अस्मा रहीम की क़ुव्वते-तसर्फ़ (आत्मिक संचरण की शक्ति) ने गति में आकर ब्रह्मांड के सभी अवयवों और कणों को आकृति और रूप प्रदान किया। जब तक शब्द रहीम "अस्मा-ए-इ़तलाक़िया" नामकी हैसियत में था, तब तक उसकी गुण केवल ज्ञान की अवस्था में थी; लेकिन जब ईश्वर ने कुन कहा, तो रहीम अस्मा-ए-इ़तलाक़िया से संदर्भ में अवतरण कर के "अस्मा-ए-आईनिया" नाम-प्रत्यक्ष की सीमाओं में प्रवेश कर गया और रहीम की सिफ़त-ए-इल्म में गति (गति) उत्पन्न हो गई। इसके बाद गति की गुण के संबंध से शब्द रहीम का नाम अस्मा-ए-आईनिया ठहरा।
इसके बाद ईश्वर ने अस्तित्वगत को संबोधित किया:
اَلَسْتُ بِرَبِّكُمْ
(पहचान लो, मैं तुम्हारा रब हूँ)
आत्माओं ने उत्तर में कहा: बला (जी हाँ, हमने पहचान लिया)।
जब आत्माओं ने रब होने का स्वीकार कर लिया तो अस्मा रहीम की हैसियत अस्मा-ए-आईनिया से संदर्भ में अवतरण कर के अस्मा-ए-कोनिया नाम-सृष्टिगत हो गई।
तसव्वुफ़ की भाषा में अस्मा-ए-इ़तलाक़िया की सीमा को सिफ़ते-तदल्ला कहा जाता है। अस्मा-ए-आइनिया की गुण को इबदा कहा जाता है और अस्मा-ए-कोनिया की गुण को ख़ल्क़ कहा जाता है। अस्मा-ए-कोनिया की गुण के प्रकट को तदबीर कहा जाता है। जहाँ ईश्वर ने क़ुरआन पाक में ईसा (अलैहिस्सलातो वस्सलाम) के आत्मा फूँकने का वर्णन किया है, वहाँ अस्मा रहीम की इन तीनों गुण की ओर संकेत किया गया है और तीसरी गुण के प्रकट को आत्मा फूँकने का नाम दिया गया है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि मनुष्य को साबिता की स्थिति में अस्मा रहीम की सिफ़ते-तदल्ला प्राप्त है और वह ईश्वर द्वारा प्रदत्त इसी गुण से मुर्दों को जीवित करने या किसी वस्तु को उत्पन्न करने का कार्य संपन्न कर सकता है।
फिर यही अस्मा रहीम का संदर्भ में अवतरण (तनज़्ज़ुल) सिफ़ते-आइनिया की सूरत में अअयान के भीतर मौजूद है, जिसके आत्मिक संचरण की क्षमताएँ मनुष्य को पूर्ण रूप से प्राप्त हैं। अस्मा रहीम की सिफ़ते-कोनिया मनुष्य के जवैया में पैवस्त है और उसे ईश्वर की ओर से इस गुण के प्रयोग का अधिकार भी प्राप्त है। ईश्वर ने हज़रत ईसा की मिसाल देकर इस नेमत की व्याख्या कर दी है। यदि कोई मनुष्य इस गुण की क्षमता को उपयोग करना चाहे तो उसे अपने साबिता, अपने अअयान और अपने जवैया में मुराकबा के माध्यम से इस विचार को स्थिर करना होगा कि मेरी स्वरूप अस्मा-ए-रहीम की गुण से सम्बद्ध है। इस विचार के अभ्यास के दौरान वह इस तथ्य का साक्षात्कार करेगा कि उसके साबिता, उसके अअयान और उसके जवैया से अस्मा-ए-रहीम की गुण आत्मा बनकर उस मुर्दे में प्रविष्ट हो रही है जिसे वह जीवित करना चाहता है। यह सत्य है कि अस्तित्वमान की जितनी भी आकृतियाँ और रूप हैं वे सभी अस्मा-ए-रहीम की गुण का नूरी (प्रकाशात्मक) समुच्चय हैं। यह समुच्चय मनुष्य की आत्मा को प्राप्त है। इस स्थिति में मनुष्य की आत्मा एक सीमा में साहिबे-तदल्ला, एक सीमा में साहिबे-इबदा और एक सीमा में साहिबे-ख़ल्क़ है। जिस समय वह विचार की पूर्ण अभ्यास प्राप्त कर लेने के बाद अस्मा-ए-रहीम की इस गुण को स्वयं से पृथक आकृति और रूप देने का संकल्प करेगा, तो सिफ़ते-तदल्ला के अंतर्गत उसका यह अधिकार गति में आ जाएगा।
सिफ़त-इबदा के अंतर्गत हिदायत गति में आएगी और सिफ़त-ख़ल्क के अंतर्गत तक़वीन गति में आएगी। और ये तीनों गुण का प्रकट उस सजीव की आकृति और रूप धारण करेगा जिसे अस्तित्व में लाना अभिप्रेत है।
संयोजन:
सिफ़त-तदल्ला (दैवी अधिकार) (साबिता) + सिफ़त-इबदा-इलाही (अइन) (किसी वस्तु की पूर्ण आकृति और रूप) + सिफ़त-ख़ल्क-इलाही (जुय्या) (जीवन की गतियाँ और स्थितियाँ) = प्रकट (अस्तित्व-नासूती)
हमारी दुनिया के अनुभव यह बताते हैं कि पहले हम किसी वस्तु के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। यदि कभी संयोगवश ऐसा हो जाए कि हमें किसी वस्तु के बारे में कोई जानकारी न हो और वह अचानक हमारी आँखों के सामने आ जाए, तो हम उस वस्तु को बिल्कुल नहीं देख सकते।
उदाहरण संख्या 1:
लकड़ी के एक फ़्रेम में एक छवि लगाकर उस छवि की समतल पर बहुत ही पारदर्शी दर्पण रखा जाए और किसी व्यक्ति को कुछ दूरी पर खड़ा कर परीक्षणार्थ यह पूछा जाए कि बताओ तुम्हारी आँखों के सामने क्या है—तो उसकी निगाह केवल छवि को देखेगी। पारदर्शी होने की वजह से दर्पण को नहीं देख सकेगी। यदि उस व्यक्ति को यह बता दिया जाए कि दर्पण में छवि लगी हुई है, तो पहले उसकी निगाह दर्पण को देखेगी, फिर छवि को देखेगी। पहली स्थिति में, यद्यपि देखने वाले की निगाह दर्पण में से गुज़रकर छवि तक पहुँची थी, लेकिन उसने दर्पण को अनुभव नहीं किया। परंतु जानकारी होने के बाद दूसरी स्थिति में कोई व्यक्ति पहले दर्पण को देखता है और फिर छवि को। यह उदाहरण निगाह का है।
उदाहरण संख्या 2:
हिरोशिमा का एक पर्वत जो परमाणु बम से नष्ट हो चुका था, लोगों को दूर से अपनी आकृति और रूप में दिखाई देता था, लेकिन जब उसे छूकर देखा गया तो धुएँ के प्रभाव तक नहीं पाए गए। इस अनुभव से यह स्पष्ट हो गया कि केवल देखने वालों का ज्ञान ही निगाह का कार्य कर रहा था।
उदाहरण संख्या 3:
सामान्य अनुभव है कि गूँगे-बहरों में देखने की क्षमता तो होती है लेकिन वे न बोल सकते हैं और न सुन सकते हैं। न बोल पाना और न सुन पाना इस तथ्य का प्रमाण है कि उनका ज्ञान केवल निगाह तक पहुँच सकता है। अर्थात उनकी निगाह ज्ञान का स्थानापन्न तो बन जाती है लेकिन देखी हुई वस्तुओं की व्याख्या नहीं कर सकती। उनकी वे क्षमताएँ जो ज्ञान को सुनने और बोलने की आकृति और रूप देती हैं, लुप्त हैं। इसलिए उनका ज्ञान केवल निगाह तक सीमित रहता है। यहाँ से यह उद्घाटित हो जाता है कि ज्ञान क्रमशः विभिन्न रूप धारण करता है। इस प्रकार की हज़ारों मिसालें मिल सकती हैं। परिणामस्वरूप यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि किसी वस्तु का ज्ञान न हो तो निगाह रिक्त के समान है। अर्थात ज्ञान को हर अवस्था में प्राथमिकता प्राप्त है और शेष इंद्रियों को गौणता।
क़ानून:
प्रत्येक अनुभूति चाहे वह निगाह हो, श्रवण हो या स्पर्श हो, वह ज्ञान की ही एक शाखा है। ज्ञान ही उसकी नींव है। ज्ञान के बिना सभी अनुभूतियाँ नकारात्मक स्तर रखती हैं। यदि किसी वस्तु का ज्ञान नहीं है तो न उस वस्तु का देखना संभव है और न सुनना संभव है। अन्य शब्दों में, किसी वस्तु का ज्ञान ही उसका अस्तित्व है। यदि हमें किसी वस्तु की जानकारी प्रदान नहीं की गई है तो हमारे लिए वह वस्तु रिक्त है।
नियम:
जब ज्ञान प्रत्येक अनुभूति की नींव है तो ज्ञान ही निगाह है, ज्ञान ही श्रवण है, ज्ञान ही वाणी है और ज्ञान ही स्पर्श है। अर्थात किसी मनुष्य का सम्पूर्ण चरित्र केवल ज्ञान है।
सूत्र:
ज्ञान और केवल ज्ञान ही अस्तित्वगत तत्व है। ज्ञान से बढ़कर अस्तित्वगत तत्व की कोई हैसियत नहीं।
सत्य:
ज्ञान सत्य है और अज्ञान अनस्तित्व है। नाम-ए- गुण ही अस्तित्वगत तत्व हैं। गुण की पहली उपस्थिति का नाम इ़तलाक़, दूसरी उपस्थिति का नाम आइन, तीसरी उपस्थिति का नाम कोन है और इन तीनों उपस्थितियों का नाम प्रकट या अस्तित्व है।
व्याख्या:
ज्ञान-इ़तलाक़, ज्ञान-आइन और ज्ञान-कोन के एकीकृत होने का नाम अस्तित्व या प्रकट है।
निगाह = इ़तलाक़ + आइन + कोन = ज्ञान = अस्तित्व
श्रवण = इ़तलाक़ + आइन + कोन = ज्ञान = अस्तित्व
वाणी = इ़तलाक़ + आइन + कोन = ज्ञान = अस्तित्व
घ्राण = इ़तलाक़ + आइन + कोन = ज्ञान = अस्तित्व
स्पर्श = इ़तलाक़ + आइन + कोन = ज्ञान = अस्तित्व
दृष्टि, श्रवण, वाणी, घ्राण और स्पर्श = अस्तित्व = ज्ञान
ऊपर वर्णित तथ्यों के अनुसार अस्तित्व केवल नाम-ए-इलाही के गुणों का प्रतिबिम्ब है। ईश्वर का प्रत्येक नाम ईश्वर का गुण है। ईश्वर का प्रत्येक गुण ईश्वर का ज्ञान है और ईश्वर के ज्ञान के तीन प्रतिबिम्ब हैं—
प्रयोग )इ़तलाक़)
आइन और (अनादि सूक्ष्म रूप)
कोन।
इन तीनों प्रतिबिम्बों का समष्टि ही प्रकट या अस्तित्व है। वास्तव में किसी भी अस्तित्व या प्रकट की नींव नाम-ए-इलाही के गुण हैं और नाम-ए-इलाही के छह अवतरणों से ब्रह्मांड लोक-अस्तित्व में आया। नाम का अवतरण गुण है, गुण का अवतरण ज्ञान है। ज्ञान ने जब अवतरण किया तो उसके तीन प्रतिबिम्ब अस्तित्व में आए—इ़तलाक़, आइन और कोन। इन तीनों प्रतिबिम्बों ने जब अवतरण किया तो प्रकट या अस्तित्व बन गया। अस्तित्व की व्याख्या ऊपर हो चुकी है और यह निश्चित किया जा चुका है कि अस्तित्व केवल ज्ञान है। जब गुण का प्रतिबिम्ब अस्तित्व है तो गुण का प्रतिबिम्ब ही ज्ञान हुआ। क्योंकि नाम गुण है, इसलिए नाम का संबंध प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान से सिद्ध हो जाता है। जब नाम अवतरण करेगा तो ज्ञान बन जाएगा और ज्ञान ही अपनी आकृति और रूप में प्रकट-कोनिया होगा। यही वे नाम हैं जिनका उल्लेख क़ुरआन पाक में है।