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एक ज्ञानी सूफ़ी साधक (आरिफ़) मज़हर अर्थात् भौतिक लोक (आलम-ए-नासूत) से आरोहण करता हुआ सीढ़ी-दर-सीढ़ी देव-लोक (आलम-ए-मल्कूत), शक्ति (जबरूत) और ईश्वरलोक (लाहूत) तक पहुँच जाता है। यह
उन्नति शारीरिक प्रयत्नों का परिणाम नहीं होती। इस मार्ग में केवल आत्मा के
प्रयत्न ही काम देते हैं।
मनुष्य की उत्पत्ति से लेकर हज़रत मुहम्मद अलैहिस्सलातो वस्सलाम तक जितने भी
शास्त्र अवतरित हुए हैं उनमें इस तथ्य की पूर्ण व्याख्या की गई है। यूनानी दर्शन
ने भी इन्हीं शास्त्रों से लाभ उठाया है, यद्यपि यह लाभ उन्हें केवल नबियों के शिष्यों द्वारा
पहुँचा; किन्तु उनकी अपनी बुद्धि की क्रीड़ा ने इसे और अधिक उलझा दिया और ऐसी
परिवर्तित विकृतियाँ उत्पन्न कीं जिनसे उनके शिष्य भ्रामक मार्ग पर पड़ गए। इन यूनानी दार्शनिकों के
अतिरिक्त अन्य देशों के दार्शनिक भी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से पूर्व इन विकृतियों
में सहभागी थे। दर्शन-शिक्षा का यह विशेष काल हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की उत्पत्ति के बाद और हज़रत
ईसा अलैहिस्सलाम की उत्पत्ति से पूर्व का है। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और
उनके बाद आने वाले नबियों की शिक्षाओं में जिस स्व-अहं (अना) की व्याख्या की गई है, उसी स्व-अहं को दार्शनिकों के
प्रयासों ने न केवल अस्पष्ट किया बल्कि निरर्थक बना दिया। विशेषतः तीसरी, चौथी और पाँचवीं हिजरी
शताब्दी में इस्लामी विद्वान यूनानी दर्शन से अत्यधिक प्रभावित हुए। उनकी विचारधारा बुद्धि की
ऐसी राहों पर अग्रसर दिखाई देती है जो दर्शन ने निकाली थीं। वास्तव में इस प्रकार
के छलपूर्ण विद्वान उस आत्मिक अनुभूति (मारिफ़त) से दूर हो चुके थे जो हज़रत मुहम्मद अलैहिस्सलातो वस्सलाम से सहाबा-ए-कराम, ताबेईन और ताबे-ताबेईन तक पहुँची थी। जिस स्व-अहं (अना) का हमने उल्लेख किया है, क़ुरआन पाक में अनेक स्थानों पर उसकी ओर संकेत मिलता है। हज़रत इब्राहीम
अलैहिस्सलातो वस्सलाम के ज़ेह्न में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि “मेरा रब कौन है? कहाँ है?” और इस जिज्ञासा में उनका ज़ेह्न
तारे, चाँद और सूर्य की ओर
स्थानांतरित होता है। क़ुरआन पाक की आयत…
وَكَذَٰلِكَ نُرِي إِبْرَاهِيمَ مَلَكُوتَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلِيَكُونَ مِنَ الْمُوقِنِينَ ﴿٧٥﴾ فَلَمَّا جَنَّ عَلَيْهِ اللَّيْلُ رَأَىٰ كَوْكَبًا ۖ قَالَ هَـٰذَا رَبِّي ۖ فَلَمَّا أَفَلَ قَالَ لَا أُحِبُّ الْآفِلِينَ ﴿٧٦﴾ فَلَمَّا رَأَى الْقَمَرَ بَازِغًا قَالَ هَـٰذَا رَبِّي ۖ فَلَمَّا أَفَلَ قَالَ لَئِن لَّمْ يَهْدِنِي رَبِّي لَأَكُونَنَّ مِنَ الْقَوْمِ الضَّالِّينَ ﴿٧٧﴾ فَلَمَّا رَأَى الشَّمْسَ بَازِغَةً قَالَ هَـٰذَا رَبِّي هَـٰذَا أَكْبَرُ ۖ فَلَمَّا أَفَلَتْ قَالَ يَا قَوْمِ إِنِّي بَرِيءٌ مِّمَّا تُشْرِكُونَ ﴿٧٨﴾ إِنِّي وَجَّهْتُ وَجْهِيَ لِلَّذِي فَطَرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ حَنِيفًا ۖ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُشْرِكِينَ ﴿٧٩﴾ وَحَاجَّهُ قَوْمُهُ ۚ قَالَ أَتُحَاجُّونِّي فِي اللَّـهِ وَقَدْ هَدَانِ ۚ وَلَا أَخَافُ مَا تُشْرِكُونَ بِهِ إِلَّا أَن يَشَاءَ رَبِّي شَيْئًا ۗ وَسِعَ رَبِّي كُلَّ شَيْءٍ عِلْمًا ۗ أَفَلَا تَتَذَكَّرُونَ ﴿٨٠﴾ وَكَيْفَ أَخَافُ مَا أَشْرَكْتُمْ وَلَا تَخَافُونَ أَنَّكُمْ أَشْرَكْتُم بِاللَّـهِ مَا لَمْ يُنَزِّلْ بِهِ عَلَيْكُمْ سُلْطَانًا ۚ فَأَيُّ الْفَرِيقَيْنِ أَحَقُّ بِالْأَمْنِ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ ﴿٨١﴾ لَّذِينَ آمَنُوا وَلَمْ يَلْبِسُوا إِيمَانَهُم بِظُلْمٍ أُولَـٰئِكَ لَهُمُ الْأَمْنُ وَهُم مُّهْتَدُونَ ﴿٨٢﴾ وَتِلْكَ حُجَّتُنَا آتَيْنَاهَا إِبْرَاهِيمَ عَلَىٰ قَوْمِهِ ۚ نَرْفَعُ دَرَجَاتٍ مَّن نَّشَاءُ ۗ إِنَّ رَبَّكَ حَكِيمٌ عَلِيمٌ ﴿٨٣﴾
अनुवाद (सूरा अनआम, आयत 76–84, पारा 7):
और इसी प्रकार हमने इब्राहीम को आकाशों और पृथ्वी की सृष्टियों का दर्शन कराया
ताकि वे आरिफ़ हो जाएँ और पूर्ण विश्वास (यक़ीन) करने वालों में सम्मिलित हो जाएँ। फिर जब रात्रि का अंधकार उन पर छा गया तो उन्होंने एक तारा देखा। कहा — “यह मेरा प्रभु है।” परन्तु जब वह अस्त हो गया
तो कहा — “मैं अस्त हो जाने वालों से प्रेम नहीं रखता।” फिर जब उन्होंने चन्द्रमा को प्रकाशित देखा तो कहा — “यह मेरा प्रभु है।” परन्तु जब वह भी अस्त हो
गया तो कहा — “यदि मेरा प्रभु मुझे निरंतर मार्गदर्शन न करता रहे तो मैं भी अवश्य ही
पथभ्रष्ट जनों में सम्मिलित हो जाऊँ।” फिर जब उन्होंने सूर्य को
प्रकाशमान देखा तो कहा — “यह मेरा प्रभु है, यह सबसे महान है।” परन्तु जब वह भी अस्त हो
गया तो कहा — “ऐ मेरी क़ौम! निश्चय ही मैं तुम्हारे शिर्क से विमुख हूँ। मैं अपना मुख उसकी ओर करता हूँ
जिसने आकाशों और पृथ्वी को उत्पन्न किया, और मैं शिर्क करने वालों में नहीं हूँ।” और उनकी क़ौम ने उनसे वाद-विवाद करना आरम्भ किया। उन्होंने कहा — “क्या तुम अल्लाह के विषय में मुझसे
वाद-विवाद करते हो, जबकि उसी ने मुझे मार्ग
प्रदान किया है? और मैं उन वस्तुओं से नहीं
डरता जिन्हें तुम अल्लाह का साझी ठहराते हो। हाँ, यदि मेरा पालनहार कोई आदेश (अमर) चाहता हो, तो वही होगा। मेरा पालनहार हर
वस्तु को अपने ज्ञान के घेरे में लिए हुए है। क्या तुम ध्यान नहीं करते?” “और मैं उन वस्तुओं से कैसे भय करूँ
जिन्हें तुमने अल्लाह का साझी बनाया है, जबकि तुम उस बात से नहीं डरते कि तुमने अल्लाह के साथ ऐसी चीज़ों को साझी
ठहराया है जिन पर अल्लाह ने कोई प्रमाण अवतरित नहीं किया? तो दोनों दलों में से शांति का
अधिक अधिकारी कौन है, यदि तुम जानते हो? वे लोग जो आस्था (ईमान) रखते हैं और अपनी आस्था को
शिर्क के साथ मिश्रित नहीं करते — उन्हीं के लिए शांति है और वही मार्गदर्शन पर चल रहे हैं।” “और यही हमारी दैवी तर्क थी जो हमने इब्राहीम को उनकी क़ौम के मुकाबले में दी थी। हम जिसे चाहते हैं, पद में ऊँचा उठा देते हैं। निश्चय
ही आपका प्रभु बड़ा ज्ञानवान और बड़ा तत्वदर्शी है।”
(सूरह अन्आम — आयत 76 से 84 — पारा 7)
किन्तु जब वे चन्द्रमा और सूर्य को अपनी आँखों से ओझल होते देखते हैं तो कहते
हैं — “मैं छिपने वालों को अपना मित्र नहीं रखता।” इसका अर्थ यह है कि प्रभु (रब) का निषेध असम्भव है। प्रभु
वह है जिसका मनुष्य के अंतःकरण (ज़मीर) से पृथक होना कदापि सम्भव नहीं। ग़ैर-प्रभु वह है जिसका मनुष्य के अंतःकरण से पृथक होना सम्भव है। हज़रत इब्राहीम
अलैहिस्सलातो वस्सलाम के इस कथन से स्व-अहं (अना) की व्याख्या हो जाती है। इसी स्व-अहं (अना) को हज़रत मुहम्मद अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने स्वरूप (नफ़्स) कहा है और ईश्वर ने इसे हबल-उल-वरिद (जीवनी-रेखा) कहा है। यही वह मानवीय स्वरूप (ज़ात-ए-इंसानी) या स्व-अहं (अना/ज़मीर) है जिससे उसका प्रभु अलग नहीं हो सकता। और यही आत्मिक अनुभूति (मारिफ़त-ए-इलाही) का पहला चरण है। यदि स्व-अहं (अना) अपने प्रभु को स्वयं से अलग समझे तो वह आत्मिक अनुभूति (मारिफ़त-ए-इलाही) से वंचित है।
दुनिया का प्रत्येक मनुष्य जानता है कि जीवन की नवीनीकरण (तजदीद) प्रत्येक क्षण होता रहता
है। इस नवीनीकरण के प्रकट भौतिक साधन वायु, जल और आहार हैं। किन्तु मनुष्य-शरीर पर एक अवस्था ऐसी भी
आती है जब वायु, जल और आहार जीवन का
नवीनीकरण नहीं कर सकते। भौतिक लोक (मादी दुनिया) में ऐसी स्थिति को मृत्यु कहा जाता है। जब मृत्यु आ जाती है तो किसी प्रकार की
वायु, किसी प्रकार का जल और किसी
प्रकार का आहार मनुष्य के जीवन को पुनः स्थापित नहीं कर सकता।
यदि वायु, जल और आहार ही मानवीय जीवन
का कारण होते तो किसी मृत शरीर को इन वस्तुओं के माध्यम से पुनर्जीवित करना असम्भव
न होता। अब यह सत्य प्रकट हो जाता है कि मानवीय जीवन का कारण वायु, जल और आहार नहीं है बल्कि कुछ और
है। उस कारण की व्याख्या भी क़ुरआन पाक के इन शब्दों से होती है: …
سُبْحٰنَ الِّذِیْ خَلَقَ الْاَزْوَاجَ کُلَّھَا مِمَّاتُنْبِتُ الْاَرْضُ وَمِنْ اَنْفُسِھِمْ وَا مِمَّالَایَعْلَمُوْنَ
(सूरा या-सीन, आयत 36):
“पवित्र
है वह सत्ता जिसने सब वस्तुओं को द्वैत स्वरूप पर उत्पन्न किया।”
इस आयत की प्रकाशना में जीवन के कारणों में एक ओर चेतन कारण हैं और दूसरी ओर
अवचेतन कारण। एक कारण ग़ैर-प्रभु (ग़ैर-रब) का निषेध है, जो जीवन को बनाए रखने के लिए अविभाज्य अंश (जुज़्व-ए-आज़म) है। मनुष्य, समष्टि-स्वरूप (शख़्स-ए-अकबर) की इच्छा (इरादा) के अधीन इस आदेश का पालन करने पर विवश है। जब हम आदमी के समूचे जीवन का विश्लेषण करते हैं तो यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है
कि मानवीय जीवन का आधा भाग अवचेतन के अधीन और आधा चेतन के अधीन है। जन्म के पश्चात मानवीय आयु का एक
अंश पूर्णतः अचेतन अवस्था में व्यतीत होता है। फिर यदि हम सम्पूर्ण जीवन में
निद्रा (नींद) के अवकाश को गिनें तो वह आयु का एक तिहाई से भी अधिक होता है। यदि अचेतन आयु और निद्रा के अवकाश
को एक साथ जोड़ा जाए तो वे आयु का आधा भाग होंगे। यही वह आधा है जिसे मनुष्य
अवचेतन के अधीन जीता है। ऐसा कोई मनुष्य उत्पन्न नहीं हुआ जिसने ईश्वर (क़ुदरत) के इस नियम को तोड़ दिया
हो। चुनाँचे हम जीवन के दो हिस्सों को अवचेतन जीवन और चेतन जीवन के नाम से जानते हैं। यही जीवन की दो प्रकारें हैं। अवचेतन जीवन का भाग अनिवार्यतः ग़ैर-प्रभु का निषेध करता है और उस निषेध का परिणाम उसे
अनैच्छिक रूप से शारीरिक जागृति के रूप में प्राप्त होता है। अब यदि कोई व्यक्ति अवचेतन के अधीन जीवन के अवकाशों में वृद्धि कर दे तो उसे आत्मिक जागृति (रूहानी बिदारी) प्राप्त हो सकती है। इसी सिद्धान्त को क़ुरआन पाक ने
सूरा मज़म्मिल में व्यक्त किया है।
हे वस्त्रों में लिपटने वाले! रात को नमाज़ में खड़े रहा करो — किन्तु थोड़ी रात; अर्थात् आधी रात (जिसमें विश्राम करो) या आधे से कुछ कम, अथवा आधे से कुछ अधिक। और क़ुरआन को भली प्रकार स्पष्ट पढ़ो — (एक-एक अक्षर को पृथक करके)। निश्चय ही हम तुम पर एक
भारी वचन उतारने वाले हैं। निस्संदेह रात का उठना दिल और ज़बान का उत्तम सामंजस्य
लाता है और बात भली प्रकार सीधी निकलती है। निस्संदेह तुम्हें दिन में बहुत से
कार्य रहते हैं (सांसारिक भी और धार्मिक भी)। और अपने प्रभु का नाम स्मरण करते रहो और सब से कटकर केवल उसी की ओर ध्यान
लगाओ। वही पूर्व और पश्चिम का स्वामी है, उसके सिवा कोई उपास्य नहीं।”
(सूरा मज़म्मिल, आयतें 1–9)
उपरोक्त आयतों की रोशनी में जिस प्रकार शारीरिक ऊर्जा के लिए मनुष्य अवचेतन
रूप से ग़ैर-प्रभु का निषेध करने का बाध्य है, उसी प्रकार आत्मिक जागृति के लिए चेतन रूप से ग़ैर-प्रभु का निषेध करना
अनिवार्य है। सूरा मज़म्मिल की इन आयतों में ईश्वर ने यही नियम स्पष्ट किया है: जिस प्रकार अवचेतन रूप से ग़ैर-प्रभु का निषेध करने से शारीरिक जीवन निर्मित होता है, उसी प्रकार चेतन रूप से ग़ैर-प्रभु का निषेध करने से आत्मिक जीवन प्राप्त होता है।
जिस वस्तु को उपरोक्त अनुच्छेद में अवचेतन कहा गया है, और जिसे हज़रत मुहम्मद
अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने स्वरूप (नफ़्स) कहा, और क़ुरआन पाक ने हबल-उल-वरिद (जीवनी-रेखा) कहा, उसी को तसव्वुफ़ की भाषा में स्व-अहं (अना) कहा जाता है। जब ग़ैर-प्रभु का निषेध किया जाता है और स्व-अहं (अना) का चेतन शेष रहता है, तो यही स्व-अहं (अना) अपने प्रभु की ओर आरोहण करता है। जब यह स्व-अहं (अना) आरोहण करके दैवी गुण (सिफ़त-ए-इलाही / समष्टि-स्वरूप) में लीन हो जाता है तो दैवी गुण के साथ सम्बद्ध होकर गति करता है। स्व-अहं (अना) के दैवी गुण में लीन हो
जाने की अनेक अवस्थाएँ हैं। पहली अवस्था है — आस्था (ईमान) लाना। इस आस्था के विषय में क़ुरआन पाक ने अपनी प्रारम्भिक आयत में शर्तें निर्धारित
कर दी हैं।
المoذٰلِکَ الْکِتٰبُ لَارَیْبَ فِیْہِ ھُدًی لِّلْمُتَّقِیْنَoالَّذِیْنَ یُؤْمِنُوْنَ بِالْغَیْب
अनुवाद: (सूरा अल-बक़रह): “यह ईश्वर की पुस्तक है, जिसमें कोई संदेह नहीं; यह मार्ग-दर्शन करने वाली है ईश्वर
से डरने वालों के लिए। ऐसे लोग वे हैं जो अदृश्य (ग़ैब) पर आस्था (ईमान) रखते हैं।”
क़ानून: अदृश्य लोक से परिचित होने के लिए अदृश्य लोक पर आस्था रखना आवश्यक है। उपरोक्त आयत में सुरक्षित पट्टिका (लौह-ए-महफ़ूज़) का यही नियम व्यक्त हुआ है। मानव-प्रकार अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इस नियम पर अमल करता है। यह दिन-रात के अनुभव और अवलोकन
हैं। जब तक हम किसी वस्तु की ओर आस्था के साथ उन्मुख नहीं होते, हम न तो उसे देख सकते हैं और न समझ
सकते हैं। यदि हम किसी वृक्ष की ओर निगाह उठाते हैं तो उस वृक्ष की संरचना, पत्तियाँ, पुष्प, रंग सब कुछ हमारी आँखों के सम्मुख
आ जाता है; किन्तु पहले हमें नियम की
शर्त पूरी करनी पड़ती है — अर्थात् पहले हमें इस बात पर आस्था रखनी होती है कि हमारी आँखों के सामने एक
वृक्ष है। उस आस्था के कारण कुछ भी हों, तथापि अपने बोध (इद्राक) में उस वृक्ष को, जो हमारी आँखों के सामने उपस्थित
है, एक स्थायी सत्य मानने के
बाद ही हम उसके पुष्प, पत्ते, संरचना और रूप-रंग को देख सकते हैं। यदि हमारे ज़ेह्न में वृक्ष का
विचार ही न हो, तो फिर उसकी व्याख्या करना
हमारी निगाह (बसारत) के लिए असम्भव है, क्योंकि निगाह स्वयं आस्था
की पुष्टि करती है।
हमारी दैनंदिन जीवन में यही क़ानून प्रवाहित और सक्रिय है। जब हम एक नगर से
दूसरे नगर की ओर यात्रा करते हैं तो हमें इस बात का विश्वास होता है कि जिस नगर की
ओर हम जा रहे हैं वह अस्तित्व में है, यद्यपि उस नगर को हमने देखा न हो। सुरक्षित पट्टिका का यही वह क़ानून है जो
भौतिक दुनिया और आत्मिक दुनिया दोनों में समान रूप से लागू है। शिशु की शिक्षा-प्रशिक्षण का सारा आधार इसी
क़ानून पर है। प्रत्येक शिशु बताई हुई बात को सत्य मानकर लाभ प्राप्त करता है।
अब हम स्व-अहं (अना) के अवतरण और आरोहण की थोड़ी व्याख्या करते हैं। स्व-अहं या मानवीय स्वरूप या
नफ़्स जिसे आत्मा भी कहते हैं, रोशनी का ऐसा ही सूक्ष्म तत्व है जो एक ओर अपनी मूल के साथ और दूसरी ओर अपनी
प्रकार के साथ सम्बद्ध है। इसकी मूल दैवी गुणों का वह समुच्चय है जिसके माध्यम से समस्त ब्रह्मांड की
इंद्रियाँ एक सूत्र में बँधी हुई हैं। मानो रोशनी का एक सूक्ष्म सागर है जिसकी समतल
पर ब्रह्मांड की सभी आकृतियाँ और रूप उभरते हैं और उनमें से प्रत्येक आकृति और रूप
अपने कार्यों और प्रयोजनों को पूरा कर पुनः सागर में विलीन हो जाती है। प्रत्येक प्रकार की किसी एक आकृति
या रूप का नाम व्यक्ति (फ़र्द) है। इस व्यक्ति का अनुभव दो अंशों से मिश्रित है। यह अनुभव सागर की गहराई से
अपना सफ़र प्रारम्भ कर समतल तक पहुँचता है। समतल पर उभरने के बाद व्यक्ति का गुप्त
अनुभव चेतना बन जाता है। इस स्थिति में व्यक्ति से जो क्रियाएँ प्रकट होती हैं वे
सभी चेतन क्रियाएँ कहलाती हैं। यही उसकी बाह्य जीवन है।
किन्तु व्यक्ति का गुप्त अनुभव उसका अवचेतन है। वास्तव में यह अवचेतन सागर की
सभी बूँदों के गुप्त अनुभवों का समुच्चय है। दूसरे शब्दों में इसे सागर का सामूहिक
चेतन कहा जाना चाहिए। सागर का सामूहिक चेतन ही व्यक्ति का अवचेतन होता है। इसी प्रकार समस्त व्यक्ति जो सागर
की गहराई से उभरकर समतल पर आते हैं, वे सब एक गुप्त चेतन के सूत्र में बँधे हुए हैं। जब सागर में इस चेतन की डोर
हिलती है तो समतल पर उभरने वाले सभी व्यक्ति स्वयं को एक-दूसरे से परिचित और आत्मीय
अनुभव करते हैं। जब एक आदमी सूर्य को देखता है तो उसे ऐसा अनुभव होता है कि सूर्य भी मेरी
भाँति इस ब्रह्मांड का एक व्यक्ति और एक अंग है। वहाँ उसके ज़ेह्न की समतल पर उसकी
हस्ती और सूर्य की हस्ती का समान अनुभव होता है, यद्यपि एक आदमी की प्रकार सूर्य की
प्रकार से पूर्णतः भिन्न है। इसी सम्बन्ध और परिचय को तसव्वुफ़ में निस्बत संबंध कहा जाता है। यह निस्बत वही
गुप्त अनुभव है जो सागर की गहराई में प्रत्येक प्रकार के प्रत्येक व्यक्ति को
व्यापता है। इसी कारण ब्रह्मांड का प्रत्येक कण ब्रह्मांड के समान्य गुणों का
स्वामी है। मनुष्य का स्व-अहं अपने चेतन में इसी गुप्त अनुभव या निस्बत के माध्यम से धीरे-धीरे अपने प्रयत्नों द्वारा
ब्रह्मांड के विभिन्न गुणों से परिचित हो लेता है। गुप्त रूप से तो मनुष्य का स्व-अहं ब्रह्मांड के समान्य
गुणों से पहले ही परिचित होता है, किन्तु वह अपने प्रयत्नों के द्वारा धीरे-धीरे इस गुप्त अनुभव को
अपने चेतन में स्थानांतरित कर लेता है। अब उसमें यह योग्यता उत्पन्न हो जाती है कि सागर के भीतर ब्रह्मांड के समान्य
गुणों में जो प्रेरणाएँ होती हैं उन्हें अनुभव करता और देख लेता है। जब सागर के
भीतर या अदृश्य में गति होती है तो व्यक्ति को उसका पूर्ण ज्ञान होता है। क़ुरआन पाक में ईश्वर ने इसका वही
क़ानून स्पष्ट किया है जिसका उल्लेख पहले आ चुका है।
“हमने सब वस्तुओं को दो प्रकारों पर
उत्पन्न किया है।”
दो प्रकार या दो पक्ष मिलकर अस्तित्व होते हैं। उदाहरण के लिए, प्यास, वस्तु का एक पक्ष है और जल दूसरा
पक्ष। प्यास आत्मा की आकृति है और जल शरीर की आकृति — अर्थात् अनुपालन (उमत्साल) के दो पक्ष हैं: एक आत्मा, दूसरा शरीर। वे दोनों एक-दूसरे से पृथक नहीं हो
सकते। यदि संसार से प्यास का अनुभव लुप्त हो जाए तो जल भी लुप्त हो जाएगा। सूफ़ी
भाषा में आत्मा वाले पक्ष को तम्स्सुल कहा जाता है और भौतिक पक्ष
को शरीर कहा जाता है। यदि संसार में कोई
महामारी उत्पन्न हो तो यह निश्चित है कि उसकी औषधि पहले से विद्यमान है। इसी
प्रकार महामारी और उसकी औषधि दोनों मिलकर एक अनुपालन (उमत्साल) कहलाएँगे।
क़ानून: किसी वस्तु की अर्थवत्ता, माहियत या आत्मा को इल्म-ए-शै कहा जाता है और उसका शारीरिक
प्रसार या प्रकट रूप को शै कहा जाता है। यदि किसी प्रकार
आत्मा का प्रमाण हो जाए तो वस्तु का अस्तित्व होना निश्चित है।
जिस समय हम उष्णता अनुभव करते हैं उस समय हमारे अनुभव के आंतरिक पक्ष में
निरंतर शीत का अनुभव सक्रिय रहता है। जब तक आंतरिक रूप से शीत का यह अनुभव शेष
रहता है, हम बाह्य रूप से उष्णता
अनुभव करते हैं। अर्थात् अवचेतन में शीत का अनुभव और चेतन में उष्णता का अनुभव
दोनों मिलकर एक अनुपालन (उमत्साल) हैं। अत एक पक्ष इल्म-ए-शै और दूसरा पक्ष शै होता है। यदि कहीं इल्म-ए-शै का पता मिल जाए तो फिर वस्तु का
अस्तित्व में आना अनिवार्य है। यदि किसी की प्रकृति कुनैन (Quinine) की ओर आकर्षित होने लगे तो अवश्य
ही उसके भीतर मलेरिया (Malaria) विद्यमान है। उसका होना अनिवार्य
है क्योंकि कुनैन की ओर आकर्षण इल्म-ए-शै है और मलेरिया शै है।