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निगाह की दूसरी समतल व्यक्तिगत है। इस समतल से स्वरूप (नफ़्स) जो कुछ देखता है, वह ब्रह्मांड के अन्य व्यक्तियों से गुप्त रहता है।
पहली निगाह एकता है और दूसरी बहुलता (कस्रत)। यह बहुलता वास्तव में उसी एकता की निगाह है, अथवा एकता-निगाह के
असंख्य कोण हैं जिन्हें व्यक्तिगत निगाह कहा जाता है। हम इस आशय को इस प्रकार
स्पष्ट कर सकते हैं कि एकता-निगाह अपनी
प्रत्येक शान को अलग-अलग देखती
है। अलग-अलग देखने से ही व्यक्ति अथवा बहुलता की सृष्टि होती है। हदीस क़ुदसी "कुन्तु क़न्ज़न मख़्फ़ियन्"-کُنْتُ کَنْزاًمَخْفِیاً -में इसी ओर संकेत है।