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एक सेकेण्ड की विनाश, खरबों वर्षों की स्थायित्वता

                                      

वे पर्वत-शृंखलाएँ जो भू-विज्ञान के विशेषज्ञों के अनुसार खरबों वर्षों में बनी थीं, एक सेकेण्ड के भीतर इस प्रकार विनष्ट हो गईं कि उनके चिन्ह तक लुप्त हो गए। इस सत्य से कौन इन्कार कर सकता है कि एक सेकेण्ड की विनाश ने खरबों वर्षों की स्थायित्वता को अपने भीतर समाहित कर लिया। या यूँ कहना चाहिए कि एक सेकेण्ड ने खरबों वर्षों का परिग्रह कर लिया। खरबों वर्षों का रूप वे पर्वत-शृंखलाएँ थीं और एक सेकेण्ड का रूप उन पर्वत-शृंखलाओं का अन्त।

इसी प्रकार श्याम-बिन्दु के एक सेकेण्ड का खरबवाँ अंश अनादि से अनन्त तक व्याप्य है। किन्तु जिस अद्राक का प्रयोग करने के हम अभ्यस्त हैं, वह सेकेण्ड के खरबवें अंश का अवलोकन नहीं कर सकता। जो अद्राक सेकेण्ड के खरबवें अंश का अवलोकन कर सकता है उसका उल्लेख सूरः क़द्र में है।

अनुवाद: हमने उतारा शब्--क़द्र में और तू क्या जानता है शब्--क़द्र क्या है? शब्--क़द्र उत्तम है हज़ार मासों से। अवतरित होते हैं देवदूत और आत्मा इसमें अपने प्रभु की आज्ञा से प्रत्येक कार्य पर। शान्ति है वह रात्रि प्रभात के उदय तक।

शब्--क़द्र वह रात्रि है जिसमें श्याम-बिन्दु के अद्राक का अवतरण होता है। यह अद्राक सामान्य चेतना से सत्तर हज़ार गुना या उससे भी अधिक है, क्योंकि एक रात्रि को एक हज़ार मासों से सत्तर हज़ार गुने की संगति है। इस अद्राक से मनुष्य ब्रह्माण्डीय आत्मा का, देवदूतों का और उन विषयों का जो सृष्टि के रहस्य हैं, प्रत्यक्षीकरण करता है।

सूफ़ी विचार में इस अद्राक को विजय (फ़तह) कहा जाता है। विजय में मनुष्य अनादि से अनन्त तक के प्रसंगों को जाग्रत अवस्था में चल-फिर कर देखता और समझता है। ब्रह्माण्ड के अत्यन्त दूरस्थ अन्तरालों में खगोलीय पिण्डों को बनते और अपनी स्वाभाविक आयु पूरी कर नष्ट होते देखता है। असंख्य आकाशगंगाएँ उसकी निगाह के सामने सृजित होती हैं और असीमित कालखण्ड व्यतीत कर विनष्ट हो जाती हैं। विजय का एक सेकेण्ड प्रायः अनादि से अनन्त तक के कालखण्ड का व्याप्य हो जाता है।

अद्राक क्या है?

ज़ैद कहता है कि मैंने अख़बार पढ़ा, मैंने पत्र लिखा, मैंने भोजन किया। अख़बार किसने पढ़ा, पत्र किसने लिखा, भोजन किसने किया? ज़ैद ने। यह सब कुछ ज़ैद ने किया। मगर यह सब कुछ बयान करने वाला, समझने वाला ज़ैद का ज़ेहन है। ज़ैद ने क्या किया, इसका जानने वाला केवल ज़ैद का ज़ेहन है। जानने की प्रकृति सूचना से अधिक कुछ नहीं है। अख़बार पढ़ना, पत्र लिखना इत्यादि सूचनाएँ हैं। जब हम इन सूचनाओं से कटा दृष्टि करते हैं तो ज़ैद कौन है, ज़ैद ने क्या किया है, सब निरर्थक है। वास्तविकता केवल इतनी है कि ज़ैद के ज़ेहन को सूचनाएँ प्राप्त हुईं। यहाँ दो संस्थाएँ उल्लेखनीय हैं: सूचनाएँ और ज़ेहन। सूचना देने वाला भी ज़ेहन है और सूचनाएँ प्राप्त करने वाला भी।

एक ही इकाई है जिसके दो पक्ष हैं। ज़ेहन कहता है नष्ट होने वाले पर्वतों की आयु दो खरब वर्ष है। यह एक सूचना है। यदि एक वर्ष को एक इकाई ठहराया जाए तो दो खरब वर्षों को दो खरब इकाइयाँ कहा जाएगा। इसका अर्थ यह हुआ कि अद्राक ने एक अनुभव को दो खरब हिस्सों पर बाँट दिया। यह एक सूचना है लेकिन इसकी अवधि दो खरब वर्षों का काल है। जब यह सूचना मिली तो सुनने वाले ज़ेहन ने वास्तव में दो खरब वर्षों की अवधि का अनुभव किया। अर्थात् अद्राक के एक सेकंड में दो खरब वर्षों का माप उपस्थित है। दो खरब वर्ष कब गुज़रे, किसने गुज़ारे, कैसे गुज़रे यह कोई नहीं बता सकता। यह केवल सूचना है, ऐसी सूचना जिसका अद्राक केवल एक सेकंड से अधिक नहीं। हमारे ज्ञान में केवल ज़ेहन ही एक संस्था है जिसे ब्रह्मांड कहते हैं। ईसा (अलैहि सलाम) ने कहा:

’’God Said LIght and There Was Light‘‘

ईश्वर ने कहा रोशनी हो और रोशनी हो गई।" क़ुरआन के शब्दों में: "कुन फ़ैकून"हो जा और वह हो गया। जब हमारी निगाह किसी पुस्तक के शब्दों पर पड़ती है तो मानो रोशनी पड़ती है, क्योंकि हम रोशनी के अलावा कुछ देख ही नहीं सकते। जब हम पुस्तक पढ़ते हैं तो रोशनी पढ़ते हैं, और जो कुछ समझते हैं, रोशनी समझते हैं। क्योंकि जब हम रोशनी पढ़ेंगे तो रोशनी ही समझेंगे। और जो कुछ हम समझ रहे हैं वह केवल सूचना है। अब कहना पड़ेगा कि नूर और सूचना एक ही वस्तु हैं। देखना यह है कि सूचना का स्थान क्या है। यदि हम स्थान का पता कर लें तो काल और मकान(Time and Space) को समझ लेंगे। खगोलशास्त्री कहते हैं कि हमारे सौर-मंडल से अलग कोई ऐसा तारा नहीं जिसकी रोशनी हम तक चार वर्ष से कम में पहुँचे। वे ऐसे तारों का भी उल्लेख करते हैं जिनकी रोशनी हम तक एक करोड़ वर्ष में पहुँचती है। इसका अर्थ यह हुआ कि हम इस सेकंड में जिस तारे को देख रहे हैं, वह एक करोड़ वर्ष पहले का स्वरूप है। इसे मानना पड़ेगा कि वर्तमान क्षण ही एक करोड़ वर्ष पहले का क्षण है। यह विचारणीय है कि इन दोनों क्षणों के बीच जो एक ही और बिल्कुल एक हैं एक करोड़ वर्षों का अंतराल है। यह एक करोड़ वर्ष कहाँ गए? यह स्पष्ट हुआ कि ये केवल अद्राक की विधि है। अद्राक की विधि ने केवल एक क्षण को एक करोड़ वर्षों पर बाँट दिया। जिस प्रकार अद्राक बीते हुए एक करोड़ वर्षों को वर्तमान क्षण में देखता है, उसी प्रकार अद्राक आने वाले एक करोड़ वर्षों को भी वर्तमान क्षण में देख सकता है। इस प्रकार यह प्रमाणित हो जाता है कि अनादि से अनंत तक तक का सम्पूर्ण अंतराल केवल एक क्षण है, जिसे अद्राक की विधि ने अनादि से अनंत तक के चरणों पर बाँट दिया है। हम इसी बाँट को मकान (Space) कहते हैं। अर्थात् अनादि से अनंत तक तक का सम्पूर्ण अंतराल मकान है और जितनी घटनाएँ ब्रह्मांड ने देखी हैं, वे सब एक क्षण की बाँट में सीमित हैं। यह अद्राक का चमत्कार है जिसने एक क्षण को अनादि से अनंत तक तक का रूप दे दिया है।

अद्राक कहाँ से आया?

ऊपर उल्लेख हो चुका है कि वह केवल सूचना है। यह सूचना कहाँ से प्राप्त हुई है?

ईश्वर कहते हैं कि श्रवण मैंने दिया है, निगाह मैंने दी है। इसका अर्थ यह हुआ कि सूचना मैंने प्रदान की है। हम सामान्य परिस्थितियों में जितनी सूचनाएँ प्राप्त करते हैं, उनकी तुलना समस्त प्रदत्त सूचनाओं के सामने क्या है? संभवतः शून्य के समान। प्राप्त सूचनाएँ इतनी सीमित हैं कि उन्हें नगण्य कहा जाएगा। यदि हम व्यापकतर सूचनाएँ प्राप्त करना चाहें तो उसका साधन आत्मविद्या (आध्यात्मिक विज्ञान) के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, और आत्मविद्या के लिए हमें क़ुरआन पाक की ओर ही उन्मुख होना पड़ेगा।

 

 

 

 

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai