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इस निस्बत का तृतीय अंग निस्बत-ए-जज़्ब है। यह वही निस्बत है जिसे
उत्तरवर्ती संतों के बाद सबसे पहले बहाउलहक़ वद्दीन नक्शबन्दी ने निशानहीन का निशान नाम दिया। इसी को नक्शबन्दी परंपरा स्मृति कहती है। जब ज्ञानी का ज़ेह्न उस
दिशा में रुझान करता है जहाँ अनादि के अनवार छाए हुए हैं और अनादि से पहले की आकृतियाँ विद्यमान हैं, तो वही आकृतियाँ ज्ञानी के हृदय
में बार-बार घूमती हैं और केवल अस्तित्व की एकता (वह्दत) ज्ञानी के विचार को घेरे रहती है। और जब हर ओर हुईयत का आधिपत्य हो जाता है, तो यहीं से इस निस्बत की किरणें
आत्मा पर अवतरण करती हैं। जब ज्ञानी उनमें घिर जाता है और कहीं निकलने का मार्ग
नहीं पाता, तो बुद्धि और चेतना से
विरक्त होकर स्वयं को इस निस्बत के रोशनी पर छोड़ देता है।