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जब मानव-हृदय में ईश्वर की अनुकम्पाओं और उपकारों की भीड़ होती है और मनुष्य ईश्वर के
वरदानों पर विचार करता है, उस समय ईश्वर-अनवार के तमसुल बार-बार मानव-स्वभाव में प्रवाहित होते हैं। यहीं से इस संबंध या निस्बत-ए-इश्क़ की नींव पड़ती है। क्रमशः
इस निस्बत के आंतरिक तल्लीनता की अवस्थाएँ प्रकट होने लगती हैं। फिर वे सूक्ष्म
केंद्र या रोशनी के मंडल, जो आत्मा को घेरे रहते हैं, उनमें रोशनी का रंग चढ़ने लगता है। अर्थात् उन मंडलों में ईश्वरीय अनवार क्रमशः जुड़ते रहते हैं। इस प्रकार निस्बत-ए-इश्क़ की जड़ें दृढ़ हो जाती हैं।