Topics
यह ज्ञान इल्म-ए-हुज़ूरी (प्रत्यक्ष ज्ञान) और इल्म-ए-हुसूली (अर्जित ज्ञान) दोनों की सीमाएँ निर्धारित करता है
और दोनों को एक-दूसरे से
परिचित कराता है। यह उन सत्यों पर आधारित है जिन्हें इल्म-ए-हुसूली की गहराइयों में खोजा जा सकता है।
इस ज्ञान के आकृतियाँ ईश्वर
के चिन्ह (आयात-ए-इलाही) से निर्मित होते हैं। आयात-ए-इलाही से आशय वे निशानियाँ हैं जिनकी ओर ईश्वर ने बार-बार क़ुरआन पाक में ध्यान दिलाया है। वास्तव में सभी प्राकृतिक नियम आध्यात्मिक नियमों का अनुसरण करते हैं। प्राकृतिक
नियमों से आध्यात्मिक नियमों का पता लगाना और उनकी वास्तविकता तक पहुँचकर इल्म-ए-हुज़ूरी से परिचित होना ही इल्म-ए-लदुन्नी का लक्षण है। जब यह ज्ञान अनबिया को प्राप्त होता है तो इसे इल्म-ए-नुबूवत कहा जाता है और जब यही ज्ञान औलिया-अल्लाह को प्राप्त होता है तो इसे इल्म-ए-लदुन्नी कहा जाता है। वही अनबिया के लिए विशिष्ट है और इल्हाम औलिया के लिए।
यह ज्ञान अनबिया या औलिया को किस
प्रकार प्राप्त होता है, इसे नीचे की पंक्तियों में संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है क्योंकि विस्तार
की इस पुस्तक में गुंजाइश नहीं है। यदि ईश्वर की आज्ञा हुई तो किसी अन्य पुस्तक
में इसका विस्तार किया जा सकेगा।
ब्रह्माण्ड की संरचना चार आयामों (या चार मंडलों) पर आधारित है। पिछले पृष्ठों में
उनकी ओर संकेत किया गया है लेकिन वहाँ उनके गुण केवल एक दृष्टिकोण से वर्णित हुए
हैं। इन मंडलों का दूसरा दृष्टिकोण तसव्वुफ़ की परिभाषा
में अलग-अलग चार
नामों से जाना जाता है:
इस दृष्टिकोण के ये चार गुण अवचेतन से संबंधित हैं। राह नकारात्मक अवचेतन है और रूह सकारात्मक अवचेतन। इसी प्रकार रुईया नकारात्मक चेतन है और रुईयत सकारात्मक चेतन।
राह अर्थात् नकारात्मक अवचेतन में कोई परिवर्तन नहीं होता। वहाँ ला-मकान और मकान अर्थात् कालिक और स्थानिक दोनों ही दूरी लुप्त होती हैं। अनादि से अनन्त तक की समस्त वारदात
एक ही बिंदु में निहित रहती हैं। जब यह बिंदु गति में आता है तो इसका नाम बदल जाता
है। पहले यह बिंदु राह कहलाता था, लेकिन गति उत्पन्न होने के बाद यही
बिंदु रूह कहलाता है। इसी बिंदु में गति का
प्रकट होना कालिक और स्थानिक दूरी उत्पन्न करता है।
पूर्ववर्ती पृष्ठों में ब्रह्माण्डीय निगाह का वर्णन हुआ
है। वही ब्रह्माण्डीय दृष्टि, राह है। यही निगाह
कालिक और स्थानिक दूरियों में विभाजित होने के बाद हक़ीक़त वारिदा या रूह कहलाती है।
यदि हम किसी व्यक्ति के सुनने को सूर्य का नाम दें तो तत्क्षण उसके ज़ेह्न से सूर्य का प्रतिबिंब गुजर जाएगा।
वस्तुतः उसके ज़ेह्न से गुजरने वाला वही सूर्य है जिससे
वह बाहरी जगत में परिचित है। वह किसी और सूर्य को नहीं जानता। वह केवल उसी सूर्य
से अवगत है जो उसके ज़ेह्न में वारिद है। यही गति रूह कहलाती है, अर्थात् रूह मानवीय ज़ेह्न से एक हक़ीक़त वारिदा की सूरत में परिचित है और समस्त अस्तित्वमान
में समान रूप से प्रवाहित है। जब कोई व्यक्ति इस हक़ीक़त
वारिदा को अपने ज़ेह्न में स्थिर करता है तो यह छवि का रूप धारण कर लेती है, यानी रूह चेतना में समाने के बाद छवि बन जाती है। इसी अवस्था को रुईया (स्वप्न-दृष्टि) कहते हैं। लेकिन जब यही छवि दृष्टि-बिंदु की पृष्ठभाग पर आ जाती है तो रुईयत (प्रत्यक्ष-दर्शन) कहलाती है। उस समय किसी व्यक्ति की निगाह वस्तु को सम्मुख मूर्त रूप
में देखती है। दृष्टि का
चरित्र इस मंज़िल में भी वही रहता है जो राह, रूह और रुईया में था। सामान्य परिभाषा में पहले
मंडल को अवचेतन, दूसरे को अद्राक (अनुभूति/बोध), तीसरे को छवि और चौथे को वस्तु (शैʾ) कहते हैं।