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रात्रि और दिवस (लैल व नहार)

                                                                                         

ऊपर उल्लेख हो चुका है कि चेतना (ज़ात--वाजिब-उल-वुजूद) अपनी पुनरावृत्ति करती रहती है और जैसे ही पुनरावृत्ति घटित होती है, एक बिन्दु के दो हो जाते हैं। फिर प्रत्येक बिन्दु के दो हो जाते हैं। आदि से यही क्रम चल रहा है। यदि हम गणितज्ञों की शैली में समझें तो ये असंख्य बिन्दु मिलकर एक वृत्त का रूप धारण कर लेते हैं। इन बिन्दुओं में प्रत्येक बिन्दु स्वयं अपनी जगह एक वृत्त है। ये सभी वृत्त मिलकर एक महान् वृत्त बनाते हैं। इस महान् वृत्त का नाम ब्रह्मांड है। इसी को गोलक-गति (हरकत--दौरी) कहा जाता है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि गोलक-गति केवल चेतना की पुनरावृत्ति है। क़ुरआन मजीद में इस पुनरावृत्ति का उल्लेख इस प्रकार हैः

وَلَہٗ مَاسَکَنَ فِی الَّیْلِ وَالنَّھَارِ وَھُوَالسَّمِیْعُ الْعَلِیْمُo

"वलहु मा सकन फ़ी लैलि व नहारि व हुवास्समीउल अलीम"

(सूरतुल अनआम, आयत १२)

अनुवादःअल्लाह ही का है जो रात और दिन में वास करता है। वही सुनने वाला और जानने वाला है।

रात्रि और दिवस में जो कुछ निवास करता है, वह सब अल्लाह ही का स्वामित्व है। मनुष्य की अनुभूति (इद्राक) और इन्द्रियाँ (हवास) जिनको ग्रहण करती हैं, ईश्वर ने उन्हें दो भागों में विभाजित कर दिया है। एक भाग वह है जिसका सम्बन्ध रात्रि के इन्द्रियों से है। ये दो वृत्त हैं, अथवा इन्हें गोलक-गति की दो सतहें कहा जा सकता है। ये दोनों सतहें विभिन्न इन्द्रियों का स्रोत हैं। इसी कारण ईश्वर ने लैल (रात्रि) और नहार (दिवस) के लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग किया है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि रात्रि की इन्द्रियों को अन्धकार, निद्रा अथवा तन्द्रा कहकर अवास्तविक समझा जाता है। किन्तु ईश्वर के शब्द इस अवधारणा का खण्डन कर देते हैं और यह प्रमाणित हो जाता है कि अल्लाह के निकट रात्रि और दिवस की इन्द्रियाँ समान रूप से सुदृढ़ और वास्तविक हैं। यदि हम थोड़ा विश्लेषण करें तो यह तथ्य स्पष्ट हो जाएगा कि दिवस की इन्द्रियों को सामूहिक साक्ष्य प्राप्त है और रात्रि की इन्द्रियों को व्यक्तिगत साक्ष्य। किन्तु यह सत्य भी नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता कि सामूहिक साक्ष्य में अनेक भूलें होती हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे व्यक्तिगत साक्ष्य में।

यहाँ यह उल्लेख आवश्यक है कि निगाह की दो सतहों में सामाजिक समतल को वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिगत समतल को आत्मनिष्ठ नाम दिया जाता है। इन्हीं दो सतहों से काल (Time) की नींव पड़ती है। जब एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से परिचित होता है तो यही परिचय का चरण काल बनता है। यह परिचय आत्मा का एक क्रियान्वयन है। जब आत्मा अपनी किसी विशेषता को देखती है तो एक ठहराव घटित होता है। वास्तव में यह ठहराव देखने की एक शैली है जिसे मानव-बुद्धि काल कहती है। ऐसा नहीं है कि कोई वस्तु या क्षण गुजरता हो, बल्कि यह केवल ज़ात की विचार-शैली है, चेतना-शैली है, दृष्टि-शैली है।

ईश्वर का एक वचन यह है कि मैं समीअ हूँ, मैं बसीर हूँ,” अर्थात् श्रवण और दर्शन मेरी एकमात्र स्वामित्व है। और दूसरा वचन यह है कि मैंने मनुष्य को श्रवण दिया, दर्शन दिया।इन दोनों वचनों से यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य ईश्वर की श्रवण-शक्ति से सुनता है और ईश्वर की दर्शन-शक्ति से देखता है। यह ध्यान रहे कि ईश्वर का सुनना और देखना वास्तविक है, चाहे वह ईश्वर की ज़ात में घटित हो अथवा व्यक्तियों की ज़ात में। देखने और सुनने में समानता (मुतशाबेह) केवल मनुष्यों को प्रतीत हो सकती है। क्योंकि जो कुछ ईश्वर की ओर से होता है, मनुष्य उसे स्वयं से सम्बद्ध कर लेता है और यहीं से वह किसी वस्तु को समझने में भूल करता है। यह सम्भव नहीं है कि किसी व्यक्ति की निगाह बादाम को अंजीर देखे। वह अंजीर को अंजीर देखने के लिए बाध्य है। हाँ, अर्थ पहनाने में अपनी गलत राय प्रयोग कर सकता है। यह कह सकता है कि अंजीर एक निरर्थक वृक्ष है, एक हानिकर वृक्ष है। क़ुरआन पाक में ईश्वर का वचन है:

ُُوَ الَّذِیْ خَلَقَكُمْ مِّنْ نَّفْسٍ وَّاحِدَۃٍ(सूरा अअराफ़, आयत 189)

वही है जिसने तुम्हें बनाया एक स्वरूप से।

समस्त मानव-जाति एक गुप्त योजना के अन्तर्गत बनाई गई है। वह गुप्त योजना जो प्रकट रूपों के पीछे कार्य कर रही है। उसी को ईश्वर ने स्वरूप एकत्व (नफ़्से-वाहितह) कहा है। गुप्त योजना दृश्य अन्धकार और रोशनी की गहराई में ऐसे नक़्श की रचना करती है जिन्हें हमारी इन्द्रियाँ प्रकट रूपों के रूप में देखती और अनुभव करती हैं। यह असम्भव है कि हम उन नक़्शों के बोध से इन्कार कर दें या उनकी उपस्थिति को स्वीकार न करें। हम अपने भ्रम में केवल इतना कर सकते हैं कि सत्य को असत्य कह दें और असत्य को सत्य समझ लें। अतः इसी भ्रम और गलत विचार-शैली के अधीन मनुष्य गुमराही में पड़ जाता है।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai