Topics
अतः सजीव या निर्जीव प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अकबर योग्यता ही सामाजिक जीवन
की समझ रखती है। एक बकरी सूर्य की ऊष्मा को इसलिए अनुभव करती है कि वह और सूर्य
समष्टि-स्वरूप (शख्स-ए-अकबर) की सीमाओं में एक-दूसरे से संबद्ध रहते हैं। यदि कोई मनुष्य समष्टि-स्वरूप की सीमाओं में समझ
और विवेक न रखता हो तो वह किसी दूसरी प्रकार के व्यक्तियों को न पहचान सकता और न ही उसका उपयोग
जान सकता है। जब आदमी की आँख तारे को एक बार देख लेती है तो उसका स्मरण तारों की
प्रकार को सदा-सदा के लिए अपने भीतर सुरक्षित कर लेता है। स्मरण को यह योग्यता समष्टि-स्वरूप (शख्स-ए-अकबर) से प्राप्त होती है। परंतु जब कोई मनुष्य अपनी प्रकार
के किसी मनुष्य को देखता है तो उसकी ओर एक आकर्षण अनुभव करता है। यह आकर्षण
व्यष्टि-स्वरूप (शख्स-ए-असगर) का विशेष गुण है। यहाँ से असगर सार और अकबर सार का विभाजन हो जाता है। अकबर
सार को दूरस्थ आकर्षण कहा जाता है और असगर सार को समीपस्थ आकर्षण।
तज्ली की धारा सभी प्रकारों की सृष्टियों में दूरस्थ आकर्षण का परस्पर संबंध
उत्पन्न करती है। यही तज्ली जब अवतरण करके नूर का रूप धारण करती है तो समीपस्थ
आकर्षण बन जाती है। तृतीय स्तर पर जब यह तज्ली नूर से अवतरण करके रोशनी का रूप धारण करती है तो एक ही प्रकार के दो
व्यक्तियों के बीच पारस्परिक आकर्षण को गति में ले आती है।
आध्यात्मिक लोक में अनैच्छिक गति का नाम आकर्षण है और ऐच्छिक गति का नाम कर्म
है। सभी अनैच्छिक गतियाँ समष्टि-स्वरूप (शख्स-ए-अकबर) की इच्छा से घटित होती हैं, लेकिन व्यक्ति की सभी गतियाँ व्यक्ति की अपनी इच्छा से संपन्न होती हैं। जहाँ
तक नहर-ए-तस्वीद, नहर-ए-तज्रीद और नहर-ए-तशहीद के गुण मानव-स्वरूप में गति करते हैं, वहाँ तक उसका स्थान सामाजिक और समष्टि-स्वरूप का स्थान है। परंतु जहाँ से नहर-ए-तज़हीर का गुण गति में आता
है, वहाँ से मानव-स्वरूप का स्थान व्यक्तिगत हो जाता है।
नहर-ए-तस्वीद , नहर-ए-तज्रीद और नहर-ए-तशहीद की सीमाओं की गति में जब कोई अलौकिक घटना घटित होती है तो उसे दिव्य
सिद्धि (करामत) कहा जाता है। और जब नहर-ए-तज़हीर की सीमाओं की गति में कोई अलौकिक घटना घटित होती है तो उसे इस्तिदराज़
कहा जाता है।
क़ुरआन पाक में ईश्वर ने कहा है:اَللہُ نُوْرُ السّمٰوٰاتِ وَالْاَرْض इसका उल्लेख पहले आ चुका है। इसकी
और व्याख्या यह है कि सभी उपस्थितियाँ एक ही मूल से उत्पन्न होती हैं, चाहे वे उपस्थितियाँ ऊँचाई
की हों या गहराई की। हम संरचना की क्रमबद्धता को निम्नलिखित उदाहरण से स्पष्ट कर
सकते हैं।
काँच का एक बहुत बड़ा ग्लोब है। इस ग्लोब के भीतर दूसरा ग्लोब है। इस दूसरे
ग्लोब के भीतर एक तीसरा ग्लोब है। इस तीसरे ग्लोब में गति का प्रकट रूप होता है और
यह गति रूप-आकृति, शरीर और भौतिकता के माध्यम
से प्रकट होती है। पहला ग्लोब सूफ़ी भाषा में नहर-ए-तस्वीद या तज्ली कहलाता है। यह तज्ली अस्तित्वमान
के प्रत्येक कण से क्षण-प्रतिक्षण गुजरती रहती है ताकि उसकी मूल सींची जाती रहे। दूसरा ग्लोब नहर-ए-तज्रीद या नूर कहलाता है। यह भी तज्ली की तरह क्षण-प्रतिक्षण ब्रह्मांड के
प्रत्येक कण से गुजरता रहता है। तीसरा ग्लोब नहर-ए-तशहीद या तजल्लि का है। इसका कार्य जीवन को
बनाए रखना है। चौथा ग्लोब नस्मा का है जो गैसों का समूह है। इसी नस्मा की भीड़ से भौतिक रूप-आकृति और प्रकट रूप (मज़हरात) बनते हैं। इंजील के भीतर इसी बात को
निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया गया है।
इंजील: आमाल, अध्याय संख्या 17, आयत 24 से 28
संख्या 1। आयत संख्या 24
जिस ईश्वर ने संसार और उसकी सभी वस्तुओं को उत्पन्न किया, वह आकाशों और धरती का स्वामी होकर
मनुष्य के हाथों से बनाए हुए मंदिरों में नहीं रहता।
इस आयत में नहर-ए-तस्वीद और नहर-ए-तज्रीद का वर्णन है। प्रथम — ईश्वर की सृजन-शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड के प्रत्येक कण पर प्रभावी है। इसी शक्ति के प्रभाव को आध्यात्मिक भाषा में नहर-ए-तज्रीद या नूर कहा जाता है। (“संसार और उसकी सभी वस्तुओं को उत्पन्न किया” = नहर-ए-तस्वीद ,“आकाशों और धरती का स्वामी होकर”۔۔۔۔ नहर-ए-तज्रीद)
न वह किसी वस्तु का मोहताज होकर आदमियों के हाथों से सेवा लेता है क्योंकि वही
तो स्वयं सभी को जीवन, श्वास और सब कुछ प्रदान
करता है।
(जीवन नहर-ए-तशहीद, सब कुछ नहर-ए-तज़हीर या नस्मा)
संख्या 3: नहर-ए-तशहीद या रोशनी, जिसे इंजील की भाषा में जीवन कहा
गया है। इसकी दान-प्रणाली अनादि से अनंत तक जारी है।
संख्या 4: नहर-ए-तज़हीर की धारा जिसका दूसरा
नाम नस्मा है, ब्रह्मांड के भौतिक पिंडों
को सुरक्षित और सक्रिय रखती है।
अब हम नस्मा की योग्यताओं का वर्णन करेंगे। इस वर्णन के कुछ हिस्से इस्तिदराज़
के विशेष विवरण हैं। क़ुरआन पाक से यह तथ्य सिद्ध है कि अनादि से अनंत तक ईश्वर का आदेश लागू है और
ईश्वर हर वस्तु पर व्याप्त है:
اَلَآ اِنَّـهُـمْ فِىْ مِرْيَةٍ مِّنْ لِّـقَـآءِ رَبِّـهِـمْ ۗ اَلَآ اِنَّهٝ بِكُلِّ شَىْءٍ مُّحِيْطٌ
(आयत 54, सूरा हाम सिजदा, पारा 25)
ईश्वर के आदेश की अवहेलना और ईश्वर के ज्ञान से किसी वस्तु का बाहर होना असंभव
है। अन्य शब्दों में ईश्वर की ओर से एक रिकार्ड ज्ञान का है जो ईश्वर का गुण है और
एक रिकार्ड ईश्वर का आदेश है जो ईश्वर की आत्मिक अनुभूति (मारिफ़त) है।
ईश्वर की आत्मिक अनुभूति (मारिफ़त) प्राचीन है। वह ईश्वर की भाँति सदैव और सदैव स्थिर रहेगी।[1]
अतः ये दोनों अभिलेख (रिकार्ड) ईश्वर की ज्ञान-गुण (सिफ़त-ए-इल्म) और आदेश-गुण (सिफ़त-ए-हुक्म) में उपस्थित हैं। ज्ञान-गुण को इल्म-उल-क़लम और आदेश-गुण को सुरक्षित पट्टिका (लौह-ए-महफ़ूज़) कहा जाता है। ये दोनों अभिलेख ऐसी अदृश्य (ग़ैब) की दुनिया का संकेत देते
हैं जिससे हमारी दुनिया की शुरुआत होती है। सुरक्षित पट्टिका (लौह-ए-महफ़ूज़) के सभी आदेश तमसुल के रूप में अदृश्य
लोक (आलम-ए-ग़ैब) में उपस्थित हैं और ये आदेश ईश्वर के ज्ञान के अनुसार विस्तारपूर्वक लोक-ए-नासूत (आलम-ए-नासूत) अर्थात् इस भौतिक दुनिया
में अवतरित होते हैं। ईश्वर ने क़ुरआन पाक में कहा है: “मैंने हर वस्तु को दो
पहलुओं पर उत्पन्न किया है।” इस अवतरण का एक पहलू कार्य कराने वाले — अर्थात् उच्च देवदूत हैं और दूसरा पहलू कार्य करने
वाली लोक-ए-नासूत (आलम-ए-नासूत) की सृष्टि है।
नहरों की सीमाएँ चार आलमों से संबोधित हैं।
नहर तसविद’ की सीमा आलम-ए-लाहूत है।
नहर-ए-तज्रीद की सीमाएँ आलम-ए-जबरूत हैं,
नहर-ए-तशहीद की सीमाएँ आलम-ए-मल्कूत और
नहर-ए-तज़हीर की सीमाएँ आलम-ए-नासूत हैं।
आलम-ए-लाहूत वह मंडल है जिसके भीतर इल्म-ए-इलाही ग़ैब के रूप में प्रतिष्ठित है। इस मंडल की तजल्लि में असंख्य मंडल ऐसे हैं जो सूक्ष्मतम बिंदु से वृत्ताकार रूप धारण कर विस्तार पाते हैं और सम्पूर्ण ब्रह्मांड को आवृत करते रहते हैं। तजल्लि का प्रत्येक बिंदु जब वृत्त बनता है तो पहले प्रत्येक बिंदु के वृत्त से विशाल होता है। तजल्लि के ये असंख्य वृत्त ब्रह्मांड की सभी मूलताओं की मूल हैं। हम इस ग़ैब का नाम 'बरतर-ओ-राए-शहूद' (ग़ैबुल-ग़ैब) रख सकते हैं। अवचेतन की मूल तजल्लि के इन्हीं मंडलों से सृष्टि की विभिन्न प्रकार की मूलताएँ बनती हैं। यदि समस्त अस्तित्वमान तत्वों की क्षमताएँ संचित कर ली जाएँ और हम
उन क्षमताओं की सार को खोजना चाहें तो इस खोज की पराकाष्ठा पर हमें तजल्लि के मंडल मिलेंगे। परंतु उन मंडलों को केवल आत्मा की निगाह देख सकती है, जो सृष्टि की मूल है।
जब यह तजल्लि अपनी सीमा से अवतरण करती है तो ब्रह्मांड की प्रकारांतरों (अन्वाअ काएनात) की स्वरूपता — छवि बन जाती है।[2]
हम इसे सामान्य शब्दों में अवचेतन (ग़ैब) कह सकते हैं। तसव्वुफ़ में ऐसी स्वरूपता (माहियत) की सीमाओं का नाम नहर-ए-तज्रीद है। जब यह नेहर-मार्ग अपनी सीमाओं से अवतरण
करता है तो चेतना बन जाता है। इसी चेतना-मंडल का नाम नहर-ए-तशहीद है। जब नहर-ए-तशहीद अपनी सीमाओं से अवतरण
करता है तो यह अनुभव-जगत (आलम-ए-महसूस) की सीमाओं में प्रवेश करता है, जिसे भौतिक लोक (आलम-ए-नासूत) भी कहा जाता है। यही लोक गति (हरकत) का प्राकट्य है। इसी को तसव्वुफ़ की भाषा में मज़हर कहते हैं।
ज्ञान की दो प्रकारें हैं: प्रत्यक्ष ज्ञान (इल्म-ए-हुज़ूरी) अर्जित ज्ञान (इल्म-ए-हुसूली)
प्रत्यक्ष ज्ञान (इल्म-ए-हुज़ूरी) की दो प्रकारें हैं: ग़ैब-उल-ग़ैब और ग़ैब — (इल्म-उल-क़लम और इल्म-उल-लौह)
अर्जित ज्ञान (इल्म-ए-हुसूली) की भी दो प्रकारें हैं: चेतना का ज्ञान (इल्म-ए-शऊर) अनुभव का ज्ञान (इल्म-ए-अहसास)
‘इल्म-ए-हुज़ूरी’ ब्रह्मांड के गुणात्मक अनुभूति का समुच्चय है। ‘इल्म-ए-हुज़ूरी’ आत्मा की जागृति से प्राप्त होता है।
‘इल्म-ए-हुसूली’ यद्यपि केवल आत्मा की प्रेरणाओं का परिणाम है, परन्तु उसका प्रकटिकरण शरीर के माध्यम से होता है।
[1] (नोट): ईश्वर के ये चारों अधिकार (तसल्लुत) निरंतर और स्थायी हैं। इनमें से कोई भी अधिकार यदि विच्छेदित हो जाए तो ब्रह्मांड नष्ट हो जाएगा। चाहे वह अधिकार सृजन (ख़ालिक़ियत) का हो, स्वामित्व (मालिक़ियत) का हो, जीवन-दान का हो या सूक्ष्म वायु-समूह (नस्मा) का दान हो।
[2] होने से ईश्वर पर किसी कर्म (फ़अल) के प्रकट होने की ज़िम्मेदारी आरोपित नहीं होती, क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य को बुराई या भलाई करने का अधिकार (इख़्तियार) दिया है।
इसकी पहली मिसाल हज़रत आदम (अ.स.) के लिए निषिद्ध वृक्ष (शजर-ए-ममनूआ) के समीप जाने की मनाही थी। इसका अर्थ यह हुआ कि ईश्वर ने मनाही करने से पहले हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को यह अधिकार दे दिया था कि वे उस निषिद्ध वृक्ष के समीप जाएँ या न जाएँ।
स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में बुराई और भलाई का स्रष्टा (ख़ालिक़) होना ईश्वर का गुण (सिफ़त) है, लेकिन बुराई करना या न करना मनुष्य का अपना अधिकार (इख़्तियार) है।