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حم ﴿١﴾ وَالْكِتَابِ الْمُبِينِ ﴿٢﴾ إِنَّا أَنزَلْنَاهُ فِي لَيْلَةٍ مُّبَارَكَةٍ ۚ إِنَّا كُنَّا مُنذِرِينَ ﴿٣﴾ فِيهَا يُفْرَقُ كُلُّ أَمْرٍ حَكِيمٍ ﴿٤﴾ أَمْرًا مِّنْ عِندِنَا ۚ إِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ ﴿٥﴾ رَحْمَةً مِّن رَّبِّكَ ۚ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ ﴿٦﴾ رَبِّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ ﴿٧﴾
(सूरा
दुख़ान)
परमेश्वर कहते हैं:
उस रात में प्रत्येक हिकमतपूर्ण कार्य हमारी उपस्थिति से आदेश होकर निश्चित
किया जाता है।” (सूरा दुख़ान, रुकू पहला)
हिकमतपूर्ण कार्य से आशय मानव-जाति की चिंतन-क्षमताएँ और उनके कर्म हैं। मनुष्यों को ईश्वर ही की ओर से प्रत्येक प्रकार की
सफलता और नहर-एप्रदान होती है। जो पद्धतियाँ आलम-ए-ज़ाहिर (प्रकट लोक) के लिए ईश्वर की ओर से निश्चित होती हैं, वे आलम-ए-अमर (ईश्वर के मन में स्थित
कार्यों का लोक) अथवा आलम-ए-मिसाल (प्रतिमात्मक लोक) में मूल रेखाचित्र के रूप में स्थित रहती हैं और एक क्रम के साथ आलम-ए-ख़ल्क़ या आलम-ए-ज़ाहिर (सृष्टि-लोक) में संचारित होती रहती हैं। यद्यपि आलम-ए-अमर आलम-ए-ख़ल्क़ को आवृत्त किए हुए
है, तथापि इस आलम को बाह्य निगाह
से देखने वाली दृष्टि नहीं देख सकती। हाँ, उस दृष्टि-पक्ष से देखा जा सकता है जो
आंतरिक में देखता है।
जब हम किसी वस्तु की ओर निगाह करते हैं तो कोई न कोई तत्त्व हमारे और उस वस्तु
के मध्य साझे में होता है। वही साझी वस्तु देखने का साधन है और ब्रह्मांड की अन्य
वस्तुओं से हमारे संबंध का कारण है। उदाहरणतः जब सूर्य हमारी आँखों के सम्मुख आता
है तो हमारे और सूर्य के मध्य, सूर्य के नुक्ता-ए-ज़ात और हमारे नुक्ता-ए-ज़ात के अतिरिक्त, कोई तीसरा तत्त्व विद्यमान
होता है। यह तत्त्व इतना तीव्रगामी है कि हमारे नुक्ता-ए-ज़ात और सूर्य के नुक्ता-ए-ज़ात के मध्य की दूरी को
प्रत्येक क्षण संबद्ध रखता है। इसी के माध्यम से हमारी सत्ता सूर्य की सत्ता से
आदिकाल से परिचित है। हज़ारों वर्ष पूर्व की दुनिया भी सूर्य से उसी प्रकार परिचित
थी जिस प्रकार आज की दुनिया परिचित है। परिचय की शैली में परिवर्तन होना परिचय के
मूल रेखाचित्रों पर कोई प्रभाव नहीं डालता। यदि इन रेखाचित्रों के माध्यम से परिचय
की खोज की जाए तो परिचय के गुणों को समझना संभव हो सकता है।
परिचय का एक गुण यह है कि हज़ारों वर्ष पूर्व का मनुष्य जिस रूप में सूर्य को
देखता था, वर्तमान युग का मनुष्य भी
उसी रूप में देखता है। इस तथ्य से यह स्पष्ट हो गया कि परिचय की रोशनी अनादि से एक
ही रूप में स्थापित है। सभी व्यक्तियों का नुक्ता-ए-ज़ात अलग-अलग है और एक-दूसरे से परिचित है। यह
परिचय उस रोशनी के माध्यम से स्थापित है जो निगाह की बाह्य नेत्र से दिखाई नहीं
देता, बल्कि आंतरिक पक्ष से देखा
जा सकता है। उस रोशनी की दो प्रकारें हैं। एक
प्रकार निगाह के बाह्य पक्ष से देखी जा सकती है और दूसरी निगाह के आंतरिक पक्ष से।
जो प्रकार निगाह के आंतरिक पक्ष से देखी जा सकती है, वह अनादि से समान दशा में स्थापित
है। उसमें कोई परिवर्तन घटित नहीं होता और उस अपरिवर्तनीय रोशनी में किसी प्रकार
के रेखाचित्र नहीं होते। वही ब्रह्मांड का "अयन" संपूर्ण स्वरूप बन जाते
हैं। यही "अयन" संपूर्ण स्वरूप प्रकटनों के रेखाचित्रों की मूल हैं। इसी "अयन" संपूर्ण स्वरूप की गति स्तरों में विभक्त हो जाती है। इन दोनों स्तरों को गमनशीलता (ग़ुरैज़) और आकर्षण (कशिश) के नाम से जाना जाता है।
रोशनी की एक मूल जो अपरिवर्तनीय है उसे "सादिरुल-अइन" कहा जाता है, जबकि दूसरी जो परिवर्तनशील है उसे "अइन" कहा जाता है। ये दोनों मूल
आलम-अमर में "सादिरुल-अइन" और "अइन" के उपरान्त सम्भावना की सीमा में प्रविष्ट होते हैं। उन सीमाओं का प्रथम चरण "मिसालियत" और दूसरा चरण "अन्सुरियत" है। मिसालियत रोशनी का वह हीुला है जिसे अन्य शब्दों में रोशनी का शरीर कहा जाता
है। आन्तरिक निगाह इसे देख सकती है और बोध इसका अनुभव कर सकता है। इस हीुला में
आयाम विद्यमान रहते हैं किन्तु इसका केन्द्र भौतिक लोक में नहीं है। परन्तु दूसरा
चरण अन्सुरियत का केन्द्र भौतिक लोक में है।
ये दोनों सम्भावना-लोक के पदानुक्रम हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण
ब्रह्मांड में चार आयाम पाये जाते हैं।
आयाम संख्या 1 — सादिरुल-अइन (अपरिवर्तनीय)
आयाम संख्या 2 — अइन (परिवर्तनीय)
आयाम संख्या 3 — मिसालियत (आदर्श शरीर)
आयाम संख्या 4 — अन्सुरियत (तत्त्वता)
हम पहले धाराएँ का उल्लेख कर चुके हैं। प्रत्येक धारा अपनी सीमाओं में "बु'अद" कहलाती है और विशिष्ट
गुणधर्म रखती है। जब हज़रत मुहम्मद (अलैहिस्सलातो वस्सलम) से यह प्रश्न किया गया कि इस ब्रह्मांड से पहले क्या था, तो आपने कहा — "अमआ"। फिर पूछा गया — उसके बाद क्या हुआ? तो आपने कहा — "मा"।
अमआ" अरबी परिभाषा में ऐसी नकारात्मकता
है जो मानव बुद्धि में नहीं आ सकती। और "मा" अरबी में "मुशबियत-सकारात्मकता" कहलाता है, जो ब्रह्मांड की नींव हैं। इसी मुशबियत का नाम "आलम-अमर" है। अमआ, जिसे परिभाषा में "मावराउल-मावराउ" कहा जाता है, उसका परिचय "आलम-नूर" से किया जाता है। मानव समझ और शिक्षा की पराकाष्ठा जहाँ तक पहुँचती है, उस सीमा का परिभाषिक नाम "हिजाब महमूद" है। महमूद-आवरण वे उच्चताएँ हैं जिनसे
महान सिंहासन की अन्तिम सीमा अभिप्रेत है। यह मानवीय सत्ता त्म-बिन्दु की मेराज का कमाल है
कि वह अपने बोध को महमूद-आवरण की समझ का अभ्यस्त बना सके और उन दैवी गुणों को समझ सके जो उन उच्चताओं
में सक्रिय हैं। यह लोक ईश्वर-निकट देवदूतों की उड़ान से परे है। निकटस्थ देवदूतों की उड़ान जहाँ तक पहुँचती
है, उस सीमा को अन्तिम-सीमा-वृक्ष (सिद्रतुल मुन्तहा) कहा जाता है। देवदूत अति समीपी सिद्रतुल मुन्तहा से आगे नहीं जा सकते। इस सिद्रतुल मुन्तहा से नीचे एक और ऊँचाई है; उस ऊँचाई की व्यापकता को
स्वर्गीय आबाद गृह कहा जाता है।
सिदरतुल-मुन्तहा और बैतुल-मामूर की सीमा में रहने वाले और उड़ान भरने वाले देवदूत तीन समूहों पर आधारित हैं। एक समूह ईश्वर के सामने रहकर स्तुति में स्त है, दूसरा समूह ईश्वर के आदेश आलम तक पहुँचाता है, और तीसरा समूह उन देवदूत का है जो आलम-ए-अमर के लिए ईश्वर के आदेशों
को अपने स्मृति में रखते हैं। ये सभी देवदूत लौह-ए-महफ़ूज़ (सुरक्षित पट्टिका) से संबंध रखते हैं। आलम-ए-नूर से नीचे मलाइका-ए-मुक़र्रबीन (निकटतम देवदूत) या मलए आला की सीमाएँ हैं।
इनमें मलए आला छह पंखों वाले देवदूत हैं। इन्हें आलम-ए-नूर को समझाने की अंतरनिगाह प्राप्त है और ये आलम-ए-नूर के संदेशों का वहन करते हैं। आलम-ए-नूर के आदेश वही हैं जो ईश्वर अर्श-ए-अज़ीम (महान सिंहासन) से लागू करते हैं। इस स्तर से नीचे मलाइका-ए-रूहानी (आत्मिक देवदूत) का स्तर है। इन्हें श्रेष्ठ देवदूत के संदेशों को समझने की अंतरनिगाह प्राप्त
है। और इस स्तर से नीचे मलाइका-ए-सामवी (आकाशीय फ़रिश्ते) का स्तर है। ये आत्मिक मलाइका के संदेशों को समझने की अंतरनिगाह रखते हैं। चौथे दर्जे में अदना फ़रिश्ते (साधारण देवदूत) हैं। ये उन आदेशों को लागू कराने की अंतरनिगाह रखते हैं जो इनके पास पहुँचते
हैं। ये मलाइका पृथ्वी के स्तरों पर हर ओर फैले हुए हैं। छह पंखों वाले फ़रिश्ते छह अंतरनिगाह के अधिकारी हैं। इनमें से प्रत्येक अंतरनिगाह एक नूर (रोशनियाँ ) है।
नंबर 1। उन्हें कुछ न कुछ ज़ात (स्वरूप) का अर्फ़ान (ज्ञान/पहचान) प्राप्त है।
नंबर २। वे गुणों की आत्मिक अनुभूति रखते हैं।
नंबर ३। आलम-ए-अमर के सादिर-उल-अइन (अपरिवर्तनीय संपूर्ण स्वरूप) की समझ रखते हैं।
नंबर ४। अइन की क्रमबद्धता और सृष्टि से परिचित हैं।
नंबर ५। आलम-ए-इम्कान / आलम-ए-ख़ल्क़ की मिसालियत के ज्ञान पर उन्हें पूरा अधिकार है।
नंबर ६। आलम-ए-ख़ल्क़ / आलम-ए-इम्कान के अंशों पर अधिकार रखते हैं।
दूसरे शब्दों में, मलए-आला (श्रेष्ठ फ़रिश्ते) उपर्युक्त छह ज्ञानों के रोशनियाँ का
संग्रह है। यह न समझा जाए कि ज्ञान कोई ऐसी वस्तु है जो रोशनी के अस्तित्व से अलग
है। वस्तुतः रोशनी ही का नाम ज्ञान है। यदि हमारे सम्मुख ज्ञान (यहाँ ज्ञान से आशय इल्म-ए-हुज़ूरी या इल्म-उल-हक़ीक़त) का स्वरूप आएगा तो वह एक
प्रकार की रोशनी होगा, जो उस ज्ञान के विशिष्ट गुणों के
रंगों का प्रदर्शन करेगा।
इस प्रकार आध्यात्मिक फ़रिश्ते तीन, चार, पाँच, छह रोशनियाँ का संग्रह हैं। उन्हें आलम-ए-अमर और आलम-ए-ख़ल्क़[1] की मारिफ़त (ज्ञान) प्राप्त है। उनके चार पंखों
से ये रोशनियाँ अभिप्रेत हैं। समावी फ़रिश्ते (स्वर्गदूत) ‘आलम-ए-अमर’ की ज्ञान रखते हैं। उनके
भीतर ‘सादिरुल-ऐन’ (संपूर्ण स्वरूप का उद्गम) और ‘ऐन’ (संपूर्ण स्वरूप) की रोशनियाँसं चित हैं। अधम फ़रिश्ते ‘आलम-ए-ख़ल्क़’ के अवयवों की अवधारणा पर
अधिकार रखते हैं। ये ‘मिसालित’ (आदर्श स्वरूप) और ‘अन्स्रियत’ (तत्व स्वरूप) की रोशनियाँ का संयोग हैं।