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ईश्वर का वचन है:
هَلْ أَتَى عَلَى الْإِنْسَانِ حِينٌ مِّنَ الدَّهْرِ لَمْ يَكُنْ شَيْـًٔا مَّذْكُورًا
(सूरह दहर, आयत 1)
अनुवाद: “क्या आया है
मनुष्य पर एक काल का वक़्फ़ा जब वह कोई उल्लेखनीय वस्तु न था।”
अनुवाद: “मनुष्य को बनाया खनखनाती मिट्टी से जैसे ठिकरा।”
अनुवाद: “क्या नहीं आया मनुष्य पर एक समय जब वह वस्तु (छवि) बिना क्रम के
(अव्यवस्थित) था।”
अनुवाद: “तुझे बनाया मिट्टी से फिर बूंद से।”
अनुवाद: “हमने मनुष्य को बनाया एक मिश्रित बूंद से, उसे पलटते रहे फिर कर दिया उसे सुनने वाला और देखने
वाला।”
ईश्वर ने मिट्टी को “बजती और
खनखनाती” कहा है, अर्थात् अंतराल (ख़ला) मिट्टी के
प्रत्येक कण का स्वभाव है। इसी आकाश को हीन कहा गया है।
और फ़रमाया: “हमने मनुष्य को फिर देखने-सुनने वाला बना दिया।” अभिप्राय यह है कि अंतराल में इन्द्रियाँ उत्पन्न कर
दी गईं। यही इन्द्रियाँ वह “बूंद” हैं जिनका उल्लेख नुत्फ़ा के शब्द से
है। अंतराल ग़ैर-क्रमबद्ध समय (ज़मान-ए-ग़ैर-मुतवातिर) है और बूंद क्रमबद्ध समय (ज़मान-ए-मुतवातिर) है। अंतराल नूर है और बूंद नस्मा है। बूंद का आशय
कोई स्थूल देह नहीं है बल्कि वह एक नुक़्ता है जिसमें छवियाँ संचित होती हैं। और फ़रमाया: “पलटते रहे उसे” — अर्थात् जो छवियाँ मूल-सूत्र (दहर/अमर) से अंतराल (हीन) को प्राप्त
हुईं, उनमें व्यवस्था स्थापित की गई। और उसी व्यवस्था ने
इन्द्रियों अथवा प्रकट रूप की संरचना धारण कर ली।
क़ुरआन-पाक में किताब-उल-मुबीन का उल्लेख है। यह किताब-उल-मुबीन वही ग़ैब है जिसे हम भविष्य कहते हैं। यह अनादि से अनंत तक की पूर्ण छवि है तथा
समस्त प्रकट-विश्व का आदिस्रोत है। जब हम ‘अनंत’ शब्द
उच्चारित करते हैं तो यह एक मात्र शब्द अनादि से अनंत तक की सभी धारणा-छवियों का समग्र संकलन है। शब्द स्वयं प्रकट है, और उस शब्द के भीतर निहित धारणाएँ ग़ैब हैं। शब्द, वास्तव में, ज़ेह्न की एक गति है। इस गति में तीन प्रकार की किरणें
संकेन्द्रित होती हैं—
१. अनुभूति-सम्बन्धी किरणें
२. आस्था-सम्बन्धी किरणें
३. परिवर्तन-सम्बन्धी किरणें
अनुभूति-सम्बन्धी
किरणें एकात्मक होती हैं, और आस्था-सम्बन्धी
किरणें संयुक्त। एकात्मक और संयुक्त किरणें मिलकर परिवर्तन-सम्बन्धी किरणों का रूप ग्रहण कर लेती हैं। इन्हीं
परिवर्तन-सम्बन्धी किरणों को ब्रह्मांड के प्रकट रूप का नाम दिया जाता है।