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किसी न किसी प्रकार मनुष्य को इस
मत पर एकत्र होना पड़ेगा कि यह प्रत्यक्ष ब्रह्माण्ड किसी भी प्रकार भौतिक कणों का
समूह नहीं है, अपितु केवल चेतना का ही आदिम तत्व
है। उपर्युक्त वर्णन में ब्रह्माण्ड को चार चेतनाओं का संयोग बताया गया है। प्रथम
चेतना नूर (नूर-ए-मुफ़रद) से निर्मित है, द्वितीय चेतना रोशनियाँ -समष्टि (नूर-ए-मुर्क़ब) से। तृतीय चेतना नस्मा-ए-मुफ़रद की संरचना है और चतुर्थ
चेतना नस्मा-ए-मुर्क़ब की। इन चारों चेतनाओं में
केवल चतुर्थ चेतना जन-साधारण से
परिचित है। साधारण जन केवल इसी चेतना को जानते और समझते हैं। शेष तीन चेतनाएँ आम
जन की परिचिति से परे हैं। अब तक मनोविज्ञान के विशेषज्ञों ने चतुर्थ चेतना से
हटकर जिस वस्तु का अन्वेषण किया है, वह तृतीय चेतना है, जिसे वे अपनी परिभाषा में अवचेतन कहते हैं। किन्तु क़ुरआन पवित्र ग्रन्थ प्रथम
चेतना और द्वितीय चेतना का भी परिचय कराता है। अतः इन दोनों चेतनाओं को भी हम
अवचेतन ही गिनेंगे। इस प्रकार ब्रह्माण्ड की संरचना में तीन अवचेतन पाए जाते हैं—प्रथम अवचेतन प्रथम चेतना, द्वितीय अवचेतन द्वितीय चेतना, तृतीय अवचेतन तृतीय चेतना है। इन
चारों चेतनाओं में प्रथम चेतना लामकान है और अन्य तीन चेतनाएँ मकान हैं। प्रथम
चेतना को अपरिवर्तनशील होने के कारण ‘लामकान- अलौकिक आयाम’ कहा गया है।
प्रथम ब्रह्माण्ड के भीतर विद्यमान
किसी वस्तु की अक्ष-परिक्रमा को
समझना है और फिर दीर्घ-पथ की
परिक्रमा को।
उदाहरण: हम अपनी आँखों के सम्मुख एक शीशे का गिलास रखकर विचार करें तो गिलास की अक्ष-परिक्रमा का विश्लेषण निम्नलिखित
शब्दों में कर सकते हैं। जब गिलास पर हमारी निगाह पड़ती है तो अवरोहण और आरोहण के
छह मंडल पार कर जाती है। हमारे इन्द्रियों के भीतर प्रथम गिलास वह्मा की दशा में
प्रवेश करता है। फिर वही वह्मा गिलास की कल्पना बन जाता है। तत्पश्चात वही कल्पना छवि (तसव्वुर) का रूप धारण करके अनुभव का स्तर
प्राप्त कर लेती है। फिर तुरंत ही अनुभव छवि में, छवि कल्पना में और कल्पना वह्मा में स्थानान्तरित हो जाती है। यह
समस्त क्रिया लगभग एक सेकण्ड के सहस्रवें अंश में घटित होती है और बार-बार परिभ्रमण करती रहती है। इस
परिभ्रमण की गति इतनी तीव्र होती है कि हम प्रत्येक वस्तु को अपनी आँखों के सम्मुख
स्थिर अनुभव करते हैं।
वह्मा से आरम्भ होकर कल्पना, छवि, अनुभव… फिर छवि और कल्पना तक अवरोहण और
आरोहण के छह चरण होते हैं। इन्हीं छह यात्राओं को लताइफ़-सित्ता- सूक्ष्म तत्त्व-षट्क कहा जाता है, किन्तु वह्मा से अनुभव तक आयाम केवल चार होते हैं। इन चार आयामों या चार चेतनाओं में एक
चेतना है और तीन अवचेतन। सर्वप्रथम हमें वह्मा से सम्बन्ध स्थापित रखना पड़ता है, फिर कल्पना और छवि से। तथापि ये तीनों दशाएँ हमारी चेतना से परे हैं। केवल
चतुर्थ दशा जिसे दर्शन (रुइयत) कहा जाता है, हमसे परिचित है।
दर्शन (रुइयत) की चेतना वास्तव में शेष तीन अवचेतनों का
संयोग है। हम सर्वप्रथम पर-ब्रह्माण्डीय चेतना से, जो अपरिवर्तनशील है, अपने जीवन की शुरुआत करते हैं।
अर्थात् ईश्वरीय गुणों में एक फव्वारा फूटता है और वह फव्वारा तृतीय चरण पर आकर
व्यक्ति का रूप ले लेता है। प्रथम चरण पर वह फव्वारा आदिम तत्व (हीुला) के रूप में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड
होता है, दूसरे चरण पर वह ब्रह्माण्ड की
किसी एक जाति का आदिम तत्व होता है और तृतीय चरण पर वह व्यक्ति बनकर प्रकट हो जाता
है।
व्यक्ति की दशा में असंख्य रंगों
का एक फव्वारा अस्तित्व में आता है। इन असंख्य रंगों की व्यवस्था को अनुभव (एहसास) में सुरक्षित रखना लगभग असम्भव है।
इसी कारण चतुर्थ चेतना के इन्द्रिय अक्सर बड़ी भूलें करती हैं। इस व्यवस्था को
प्रायः अनुमान (क़यास) द्वारा स्थिर रखने की कोशिश की
जाती है किन्तु यह प्रयास लगभग निष्फल सिद्ध होता है। इसी कारण आध्यात्मिक
विद्याओं में चतुर्थ चेतना पर विश्वास नहीं किया जाता।
तृतीय चेतना में ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण का
सम्बन्ध व्यक्ति के मन से जुड़ा होता है। ब्रह्माण्ड में जो कुछ परिवर्तन घट चुके
हैं या होने वाले हैं, वे सब व्यक्ति की द्वितीय चेतना
में संचित रहते हैं। द्वितीय चेतना का आदिम तत्व (हीुला) आदिकाल से अनन्तकाल तक की सम्पूर्ण
ब्रह्माण्डीय गतिविधियों का लेखा होता है। इस चेतना में वे सभी अवयव विद्यमान रहते
हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि की जड़ हैं। आध्यात्मिकता में सबसे महत्त्वपूर्ण आधार प्रथम चेतना है क्योंकि प्रथम चेतना में
ईश्वरीय इच्छा (मशीयत-ए-इलाही) प्रत्यक्ष होती है। सूफ़ी परिभाषा में यही चेतना हक़ीक़त-उल-हक़ाइ़क़ कहलाती है। इसी को हक़ीक़त-ए-मुहम्मदिया कहा जाता है। हज़रत मुहम्मद
अलैहिस्सलातो वस्सलाम से पूर्व किसी नबी ने इस चेतना पर रोशनी नहीं डाली ईसाई शिक्षा का आरम्भ भी द्वितीय चेतना से होता है।
सर्वप्रथम इस चेतना की तहक़ीक़ात हज़रत मुहम्मद अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने ही की।
इसी कारण क़ुरआनी सूफ़ियों ने इसे हक़ीक़त-ए-मुहम्मदिया के नाम से सम्बोधित
किया। नबियों-ए-मुर्सलीन की वही का अन्त द्वितीय चेतना पर
होता है और अन्य नबियों की वही का अन्त तृतीय चेतना पर। केवल हज़रत मुहम्मद
अलैहिस्सलातो वस्सलाम वे नबी मुर्सल हैं जिनकी वही का अन्त प्रथम चेतना पर होता
है। ईश्वर का यह कथन — "यदि मैं मुहम्मद (स.अ.व.) को उत्पन्न न करता तो ब्रह्माण्ड
को भी न रचता" — इसी तथ्य की ओर संकेत करता है। इसी
कारण क़ुरआन पवित्र ग्रन्थ में प्रथम चेतना को इल्म-उल-क़लम के नाम से प्रस्तुत किया गया है। हज़रत मुहम्मद अलैहिस्सलातो
वस्सलाम ने एक दुआ-ए-मासूरा में फ़रमाया:
اسئلك بکل اشھر ھولك سمیت بہ نفسك اوانزلتہ فی کتابك اوعلمتہ احداً من خلقك اواستاقدت بہ فی علم الغیب عند ك
अनुवाद : "मैं तेरी बारगाह में तेरे उन सभी
नामों का वास्ता लाता हूँ जो तेरे पवित्र नाम हैं और जिन्हें तूने अपने लिए
निर्धारित किया है, या जिन्हें तूने अपनी किताब-ए-मजीद में उतारा है, या अपनी सृष्टि में से किसी को
उनका ज्ञान दिया है, या अपने गुप्त ज्ञान में उन्हें
अपने लिए सुरक्षित रखा है।"