Topics
जब चित्रकार चित्र बनाता है तो वह चित्र उसके छवि का प्रतिबिंब होता
है। छवि स्वयं काग़ज़ पर स्थानांतरित नहीं होती। इसी कारण वह किसी वस्तु की जितनी
भी आकृतियाँ बनाना चाहे बना सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि छवि ज्यों की त्यों उसके
मस्तिष्क में सुरक्षित रहती है और प्रतिबिंब स्थानांतरित होता है। इस प्रकार
सृष्टि का यह नियम उद्घाटित हो जाता है कि मूल अपनी जगह सुरक्षित रहती है और
प्रतिबिंब प्रवाहित होता है। अतः सारी सृष्टि प्रकट होने से पहले जिस प्रकार
सृजनहार के इरादे में सुरक्षित थी अब भी उसी प्रकार सुरक्षित है। ब्रह्मांड का यही
केंद्र सुरक्षित पट्टिका (लौह महफ़ूज़) कहलाता है, जिसे नुक्ता-ए-वह्दानी भी कहा जा सकता
है।
अस्तित्वात् वस्तुएँ
में जितनी भी प्रकारें हैं, उनकी सबकी मूलताएँ नुक्ता-ए-वह्दानी में सुरक्षित हैं। नुक्ता-ए-वह्दानी के ठीक सामने एक दर्पण है जिसे आलम-ए-मिसाल( लोक प्रतिरूप) कहते हैं। इस
दर्पण में प्रत्येक प्रकार की अलग-अलग केंद्रिकता होती है। यह केंद्रिकता
किसी प्रकार के सभी व्यक्तियों का एक ऐसा समष्टिगत हीुला है जिसमें उस प्रकार की
निश्चित आकृति और रूप अंकित होती है। अतः नुक्ता-ए-वह्दानी की असंख्य प्रकारें अपनी रोशनियाँ से असंख्य प्रकारों का केंद्रीय हीुला निर्मित
करती हैं।
जब नुक्ता-ए-वह्दानी की किरणें आलम-ए-मिसाल की ओर गति करती हैं तो काल (टाइम) का उद्भव होता है लेकिन यह गति एकहरी होती है। इसमें एक
सततता पाई जाती है। इस गति की लंबाई अनादि से अनंत तक है। काल भी अनादि से अनंत
है। इसी कारण इस गति को काल (टाइम) कहा जाता है। यह गति अनादि से अनंत तक निरंतर यात्रा करती
है। जब यह गति आलम-ए-मिसाल से गुज़र जाती है तो टुकड़ों में विभाजित हो जाती है।
आलम-ए-मिसाल का दर्पण किरणों को स्वीकार कर अपनी प्रकृति के
अनुसार उन्हें लौटाने का प्रयास करता है। इस प्रयास से किरणों की सततता टूट जाती
है। एक ओर नुक्ता-ए-वह्दानी की प्रकृति उन्हें आगे बढ़ाने पर बाध्य करती है, दूसरी ओर मिसाली दर्पण की प्रकृति किरणों को लौटाने में
अपनी पूरी शक्ति लगा देती है। इस संघर्ष में यह गति संयुक्त (दोहरी) हो जाती है। गति में भी दो रुख़ होते हैं:
एक आकर्षण (कश्श), दूसरा प्रत्याख्यान (गुरेज़)।
मुफ़रद गति (काल) जो नुक्ता-ए-वह्दानी से आरंभ होती है, अवरोही गति है। नुक्ता-ए-वह्दानी से विपरीत दिशा में यात्रा करती है, इसलिए इसे प्रत्याख्यान (गुरेज़) कहा जाता है।
जब मिसाली दर्पण प्रतिबिंब को लौटाने का प्रयास करता है तो एकवचन (मुफ़रद) गति की दिशा बदल जाती है। वह अब तक अवरोह कर रही थी, लेकिन गति के विपरीत होने से आरोहण की ओर मुड़ जाती
है। यह गति आकर्षण (कश्श) कहलाती है।