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पिछले पृष्ठों में हमने विभक्त इन्द्रियाँ और अविभक्त
इन्द्रियाँ का उल्लेख किया है। अतः ये विभक्त इन्द्रियाँ (अमर्-‘मुतलक़’) ही हैं जो स्वयं को अनादि से अनन्त तक का रूप देकर
ब्रह्माण्ड की आकृति और स्वरूप में प्रस्तुत करती हैं। आकृति और स्वरूप से आत्मा
को पा जाना सम्भव नहीं, किन्तु आत्मा से आकृति और स्वरूप की गहनता तक पहुँचना
निश्चित है। इस स्थान से उन लोगों की भूल स्पष्ट हो जाती है जो प्रकट को ही “जीवन-व्यापकता” मानते हैं। प्रकट को जीवन-व्यापकता समझने वालों का तात्पर्य इसके अतिरिक्त क्या
हो सकता है कि वे भूत और भविष्य दोनों का इन्कार कर रहे हैं। अर्थात् उन्होंने काल
की आपेक्षिकता को पूर्णतः नज़रअंदाज़ कर दिया, जबकि काल की आपेक्षिकता ही अमर्-‘मुतलक़’ और ब्रह्माण्ड है। वास्तव में भूत ही ब्रह्माण्ड है।
जहाँ तक वर्तमान और भविष्य का प्रश्न है—ये दोनों
स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रखते, अपितु भूत ही के अवयव हैं। प्रत्येक क्षण भविष्य से
भूत की ओर यात्रा कर रहा है।
हज़रत मुहम्मद ‘अलैहि-स्सलातु वस्सलाम’ का यह कथन جَفَّ الْقَلَمُ بِمَا هُوَ كَائِنٌ(जो कुछ होने
वाला है उसे लिखकर कलम सूख गया) इसी तात्पर्य
की व्याख्या करता है। इस हदीस से भूत के अतिरिक्त काल का कोई अन्य ढाँचा ज्ञात
नहीं होता। वर्तमान और भविष्य दोनों भूत ही के अवयव हैं।
यहाँ से ब्रह्माण्ड की संरचना का प्रत्यक्ष संकेत
मिलता है। क़ुरआन पाक में ईश्वर का यह इरशाद है:
اِنَّمَا اَمْرُہٗ اِذَا اَرَادَ شَيْئًا اَنْ یَّقُوْلَ لَہٗ کُنْ فَیَکُوْن
अनुवाद: ख़ुदा का अमर यह है कि जब वह किसी वस्तु को उत्पन्न करने का इरादा करता है तो कहता है ‘हो जा’ और वह हो जाती है।
इस आयत में इरादा की महत्ता और अवयवों का वर्णन है।
ज्ञात नहीं प्राचीन लोगों ने ‘माहियत’ को किस अर्थ में प्रयुक्त किया, किन्तु हम इस शब्द में ‘नूर’ का अवलोकन करते हैं। अर्थात् ईश्वर का इरादा अनन्त नूर
है। इस आयत में ईश्वर ने अपने अमर की व्याख्या की है। यह कथन कि मैं जिस वस्तु को
होने का आदेश देता हूँ, वह हो जाती है—इस बात की
व्याख्या है कि अम्र-ए-इलाही के तीन अंग हैं:
१. इरादा
२. जो कुछ इरादा
में है अर्थात् वस्तु
३. फिर उसका प्राकट्य
ईश्वर के शब्दों से यह वस्तु प्रमाण तक पहुँच जाती है
कि वह जो कुछ करना चाहते हैं, पहले से उनके ज्ञान में विद्यमान
है। अतः जो कुछ विद्यमान है, वह भूत है। जब यह
प्रश्न उत्पन्न होता है कि भूत की मात्रा क्या है? हमारे पास भूत की मात्रा को समझने के बहुत से ढंग
हैं। उदाहरणतः वर्तमान काल के वैज्ञानिक रोशनी की गति एक लाख छियासी हज़ार दो सौ बयासी मील
प्रति सेकण्ड बताते हैं। इस प्रकार रोशनी की दुनिया में एक सेकण्ड का विस्तार एक
लाख छियासी हज़ार दो सौ बयासी मील हुआ।
ब्रह्माण्ड के एक लाख छियासी हज़ार मील जिस कालिकता पर आधारित हैं, उसी में एक
साथ कितने कर्म और क्रियाएँ अर्थात् घटनाएँ प्रकट हुईं—इसका अनुमान असम्भव है। इसको इस प्रकार समझना चाहिए
कि एक सेकण्ड के भीतर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जितनी भी क्रियाएँ घट सकती हैं, वे सब केवल एक ही सेकण्ड में घटित होने वाली घटनाएँ
हैं। यदि किसी प्रकार इन क्रियाओं का गणना सम्भव हो तो ज्ञात हो सकता है कि एक
सेकण्ड का विस्तार कितना है। यह विचारणीय है कि एक सेकण्ड की ब्रह्माण्डीय घटनाओं
को लेखनी में लाने के लिये निश्चय ही मानव जाति को अनादि से अनन्त तक का काल
चाहिए। यदि यह दावा किया जाये कि एक सेकण्ड अनादि से अनन्त तक की अवधि के समान है
तो इस दावे में शंका की कोई गुंजाइश नहीं। जब अनादि से अनन्त तक एक ही सेकण्ड (क्षण) कार्यशील है
तो क्रमबद्ध काल का कोई अर्थ नहीं रह जाता। वास्तव में ईश्वर के शेऊन ही काल की वास्तविकता हैं।
ब्रह्माण्ड में तीन काल परिचित हैं: सत्य काल क्रमबद्ध काल अक्रमबद्ध काल
क्रमबद्ध काल वह है जिसका अनुभव हमें विभक्त इन्द्रियों में होता है। ब्रह्माण्ड की बाहरी समतल पर सभी
क्रियाओं और घटनाओं को क्रमबद्ध काल ही के पैमाने से मापा जाता है। ब्रह्माण्ड जो
भी कदम उठाता है वह एक क्षण का बन्धन है। इसी प्रकार दूसरा कदम दूसरे क्षण का
बन्धन है। अतः ब्रह्माण्ड की यात्रा जब एक बिन्दु के बाद दूसरे बिन्दु और तीसरे
बिन्दु में घटित होती है तो बिना परिवर्तन के नहीं होती। अर्थात् एक क्षण एक
परिवर्तन है और दूसरा क्षण दूसरा परिवर्तन। दूसरे शब्दों में क्षण ब्रह्माण्डीय
परिवर्तन का नाम है। इस प्रकार क्षणों का अलग-अलग होना इस बात की दलील है कि प्रत्येक क्षण की
घटनाएँ अलग-अलग हैं। साथ ही काल की पृथक इकाइयाँ इस तथ्य पर
संकेत करती हैं कि उनके बीच विभाजन है और यह विभाजन विरोधी इकाइयाँ हैं। और ये विरोधी इकाइयाँ अपनी सत्ता में अलग-अलग गुणधर्म रखती हैं। शब्दावली में इन्हीं को अक्रमबद्ध काल कहा जाता है। यदि क्रमबद्ध काल ज्ञात घटनाएँ हैं तो अक्रमबद्ध काल अज्ञात घटनाएँ हैं। यदि क्रमबद्ध काल की इकाइयाँ ऐसी घटनाओं का
संग्रह हैं जिनसे चेतना परिचित है तो
अक्रमबद्ध काल की इकाइयाँ ऐसी घटनाओं का संग्रह हैं जिनसे चेतना अपरिचित है।
ईश्वर ने क़ुरआन पाक के भीतर दोनों कालों का उल्लेख इस प्रकार किया है।
इरशाद है:
“मैंने आदम की मूर्ति में अपनी आत्मा फूँकी और उसे
वस्तुओं का ज्ञान दिया।”
ये दो एजेंसियाँ हुईं: आत्मा-ए-इलाही वस्तुओं का ज्ञान
वस्तुओं का ज्ञान के मुकाबिल प्राकृतिक
जगत (क्रमबद्ध काल) है जिसे क़ुरआन पाक में आलम-ए-शहादत कहा गया है। और आत्मा-ए-इलाही के मुकाबिल आध्यात्मिक जगत (अक्रमबद्ध काल) है जिसे क़ुरआन पाक में आलम-ए-ग़ैब का नाम दिया गया है।
दो एजेंसियों का विवरण जानने के लिए किसी सीमा तक नूर
और नसम को समझना आवश्यक है। मानव सत्ता इन्हीं दोनों से संयोजित है। यही दोनों
मानव ज़ेह्न के अचेतन और चेतन मापदण्ड हैं।
मानव ज़ेह्न की तीन पृष्ठभाग हैं। पहली पृष्ठभाग के
दो पक्ष हैं वराए वहम और वहम इसी प्रकार दूसरी पृष्ठभाग के भी दो पक्ष हैं—अनुभूति और निरीक्षण। ज़ेह्न की एक पृष्ठभाग अर्थात्
भ्रांति-पार (आत्मा) के सम्मुख आलम-ग़ैब अवस्थित
है। इस आलम का विस्तार आत्मा में होता है। चेतन इस आलम से अनभिज्ञ रहता है। यह आलम
ब्रह्मांड के पार और ब्रह्मांड के भीतर के तत्त्वों पर आधारित है। यह आलम काल-हक़ीक़ी (Timeless-ness) और काल-अगैर-मुतवातिर (Non-serial Time) का सम्मिलन है। काल-हक़ीक़ी ईश्वर का ज्ञान है, जिसे शब्दावली में ग़ैबुल-ग़ैब कहा जाता है। काल-अगैर-मुतवातिर
देवदूतों की सत्ता है, जिसे शब्दावली में ग़ैब कहते हैं। इस प्रकार आलम-ग़ैब की ये दोनों एजेंसियाँ—ग़ैबुल-ग़ैब और ग़ैब—आत्मा के सम्मुख अवस्थित हैं। ग़ैबुल-ग़ैब नूर-मुफ़रद में
और ग़ैब नूर-मुर्क़ब में। बाक़ी मानव ज़ेह्न
के पाँच पक्ष—वाह्मा, विचार, छवि, अनुभूति और
निरीक्षण—इन्हीं का समुच्चय हैं और इन्हीं के सम्मुख आलम-फितरत अवस्थित है। अब ब्रह्मांडीय जीवन का विवेचन यह
हुआ कि पहले आलम-ग़ैब का क्षण आता है और फिर आलम-फितरत का। आलम-ग़ैब के क्षण
से हमारा चेतन अनभिज्ञ रहता है किन्तु आत्मा जागरूक रहती है।
ग़ैबुल-ग़ैब अनन्तता
है, अर्थात् काल-हक़ीक़ी। इस
अनन्तता के सम्मुख प्रत्येक सीमितता का स्वरूप है, जिसका दूसरा नाम ज्ञान है। अन्य शब्दों में ज्ञान वह
सत्ता है जो अनन्तता के भीतर अन्वेषण करती है और अनन्तता की व्याख्या में संलग्न
रहती है। ज्ञान की सत्ता अनन्तता की उन रोशनियों को ज्ञात
करना चाहती है जो अब तक उसके सम्मुख नहीं आईं। ज्ञान की सत्ता अनन्तता की रोशनि की खोज करती
रहती है और जिन्हें पा लेती है उन्हें अपने भीतर समाहित कर लेती है। वह जिस रोशनियों को ग्रहण
करती है, उस रोशनि की सत्ता ज्ञान की सत्ता में स्थायी छाप बन जाती है।
इस छाप का नाम जाति है। यही काल-अगैर-मुतवातिर है। ज्ञान की
सत्ता में जाति की छाप का यह अर्थ है कि जाति को अपनी सत्ता का बोध है। इसीलिए
जाति अपनी सत्ता के बोध को सुरक्षित रखने के लिए स्वयं को पुनरावृत्त करती है, जिससे जाति के व्यक्तियों की सृष्टि होती रहती है।
यही कालानुक्रमिक समय है। स्पष्ट रहे कि जाति का स्वयं को दोहराना अनन्तता के स्तर
के सम्मुख सीमितता के स्तर में प्रकट होता है। अनन्तता का स्तर "ग़ैबुलग़ैब" है और
सीमितता का स्तर "ग़ैब" है। ज्ञान का
स्तर-सीमितता जाति है किन्तु जाति का स्तर-सीमितता व्यक्ति है। व्यक्ति का प्राकट्य "आलम-ए-शहादत" है।
पारिभाषिक रूप में व्यक्ति के प्राकट्य को कालानुक्रमिक समय कहा जाता है।
हमने प्रतिपादित किया है कि ज्ञान-ए-ग़ैब के दो स्तर हैं—“ग़ैबुलग़ैब” और “ग़ैब”। “ग़ैबुलग़ैब” का मरतबा नूर (नूर-ए-मुफ़रद) का क्षण है। इसी क्षण को हमने “सत्य समय” (ज़मान-ए-हक़ीक़ी) कहा है। यह क्षण अपरिवर्तनीय है, जिसकी व्यापकता अनादि से अनन्त तक व्याप्त है। ज्ञान की सत्ता इसी क्षण के
गुणों को ग्रहण करने में संलग्न रहती है—अर्थात्
ज्ञान इस क्षण की अनन्तता से सीमितता की दिशा में प्रवासरत रहता है। ज्ञान का यह
संक्रमणकालीन क्षण, जो अनन्तता से सीमितता की ओर यात्रा करता है, नूर-ए-मुरक्कब का
क्षण है। इस क्षण की अवधि मानव-चेतना की
सीमाओं से परे है, क्योंकि मानव-चेतना का
उद्भव स्वयं सीमितता (तनाहियत) में होता है। सीमितता का क्षण हमारी भौतिक दुनिया का
समय है, जिसका उल्लेख “क्रमानुगत
समय” (ज़मान-ए-मुतवात्तर) के नाम से
किया गया है। यह क्षण नस्मा-ए-मुफ़रद से आरम्भ होकर नस्मा-ए-मुरक्कब पर
समाप्त हो जाता है। मानव-चेतना, बो धगम्य वस्तुएँ (वहम, ख़याल, तसव्वुर) की सीमाओं
में नस्मा-ए-मुफ़रद से
अवगत होती है और महसूसात व मशाहिदात की सीमाओं में नस्मा-ए-मुरक्कब से
परिचित होती है। चेतना में घटित रूपान्तरों को समझने की प्रक्रिया ही चेतना की
सत्ता है। इस प्रकार चेतना की सत्ता उसी क्षण के भीतर निर्मित होती है। क़ुरआन की भाषा में नस्मा के क्षण का नाम “आफ़ाक़” और नूर के
क्षण का नाम “अनफ़ुस” है। नूर का
क्षण मानव-आत्मा के सम्मुख और नस्मा का क्षण मानव-ज़ेह्न के सम्मुख स्थित है।
उदाहरण: ज़ैद एक व्यक्ति है। यदि प्रश्न किया जाए कि ज़ैद कौन
है, तो उत्तर होगा—ज़ैद अमुक का
पुत्र है, अमुक का भ्राता है, ज़ैद विद्वान है, उसकी आयु पच्चीस वर्ष है, वह सदाचारी है, विवेकी है, युवा है, रूपवान है, धैर्यशील है। इसका तात्पर्य यह है कि ज़ैद इन समस्त
गुणों का संग्रह है और उसकी सत्ता इन्हीं विशेषताओं से निर्मित है। अतः ज़ैद की
वास्तविक सत्ता केवल रगों, स्नायु-पेशियों, अस्थियों और मांस से नहीं, वरन् उसके समस्त आचरण और क्रियाओं के समष्टि से है।
यदि ज़ैद के जीवन को एक चलचित्र की भाँति व्यवस्थित किया जाए तो उस चलचित्र का नाम
“वराय-ए-चेतन” अर्थात् “अवचेतन” होगा—या वह नूर-ए-मुरक्कब की ऐसी सत्ता होगी जो अक्रमानुगत समय (ज़मान-ए-ग़ैर-मुतवात्तर) पर आधारित है। यहाँ ज़ैद की सत्ता को समझने के लिए
अक्रमानुगत समय की अवधारणा को ग्रहण करना आवश्यक है।
उदाहरण: यदि ज़ैद को सूर्य का ख़याल आया, तो इसका अर्थ यह हुआ कि ज़ैद के ज़ेह्न ने अवचेतन रूप से सूर्य के सम्पूर्ण
तंत्र को अपने घेरे में ले लिया। परिणामस्वरूप ज़ैद की आंतरिक सत्ता (आत्मा) के सम्मुख
सूर्य का पूर्ण तंत्र एक चलचित्र की भाँति उपस्थित हो गया। इस चलचित्र में सूर्य-तंत्र की समस्त विवरणियाँ अक्रमानुगत समय का एक क्षण हैं।
क्षण का विवरण अर्थात् आसार
व अवस्थाएँ, स्थितियाँ और घटनाएँ यदि समेट दी जाएँ तो यह ज़ैद के
जीवन का एक क्षण बनता है। यह क्षण क्रमानुगत समय (ज़मान मुतवात्तर) का क्षण है।
इस क्षण की भी दो पृष्ठभाग हैं—एक पृष्ठभाग
इन्द्रियों के सम्मुख स्थित है जिसे प्रकृति-लोक (आलम-ए-फ़ित्रत) कहा जाता है।
ऐसे असंख्य क्षणों का समष्टिगत नाम ज़ैद है। वही ज़ैद जिसे इन्द्रियाँ देखतीं, छूतीं और जानती हैं। अर्थात् ज़ैद असंख्य क्षणों, यानी प्रकृति-लोक की समेटी हुई एक बंद चलचित्र-पट्टी है। उसी बंद चलचित्र-पट्टी का नाम ठोस और प्रत्यक्ष ज़ैद है। अन्य शब्दों
में, ज़ैद क्रमानुगत समय की इकाई (Unit) का एक शीर्षक है। इस शीर्षक का विस्तार अक्रमानुगत समय (ज़मान ग़ैर मुतवात्तर) की वह इकाई(Unit) है जिसे ज़ैद का स्वरूप (माहियत) कहा जाना
चाहिए। हम यह भी कह सकते हैं कि अक्रमानुगत समय की इकाई(Unit) ज़ैद का स्वरूप है। हम स्पष्ट कर
चुके हैं कि स्वरूप (माहियत) का अर्थ है नूर का विस्तार—या ऐसा विस्तृत नूर जो किसी इकाई के अंगों की चलचित्र
छवि है। इस चलचित्र-छवि में किसी
इकाई का प्रत्येक वहम, प्रत्येक ख़याल, प्रत्येक तसव्वुर और प्रत्येक अनुभूति लिपिबद्ध है।
हम उपर्युक्त कथन को इस प्रकार भी रख सकते हैं कि क्रमानुगत समय का क्षण शीर्षक या शरीर है और अक्रमानुगत समय का क्षण उसकी विस्तृत चलचित्र है। यह जानना आवश्यक है
कि अक्रमानुगत समय का क्षण निरन्तर हमारे सम्मुख रहता है किन्तु हमारा ज़ेह्न उसकी ओर नहीं जाता।
इसी कारण वह ग़ैब है।
उदाहरण: जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो अक्रमानुगत समय का क्षण, मध्यवर्ती दूरी को हमारी अज्ञानता में इस प्रकार माप
लेता है कि न तो वस्तु का रोशनी हमारे ज़ेह्न से रत्तीभर बाहर रहता है और न
रत्तीभर हमारे ज़ेह्न की पृष्ठभाग में प्रवेश करता है। यही कारण है कि हम वस्तु को
देख सकते हैं। यदि हमारा ज़ेह्न वस्तु से रत्तीभर दूर हो जाए या रत्तीभर वस्तु में
प्रवेश कर जाए तो वस्तु अदृश्य हो जाएगी और हम उसे किसी प्रकार नहीं देख पाएँगे।
क्रमानुगत चेतना (मतवात्तर शऊर) में निरन्तरता होती है। जैसे:
आज के बाद परसों का दिन तब तक नहीं आता जब तक कल का
दिन न बीत जाए। इसी प्रकार रबीउल-अव्वल के बाद
ज़ीक़अद का महीना तब तक नहीं आ सकता जब तक मध्यवर्ती महीने न बीत जाएँ। इसके विपरीत अक्रमानुगत समय क्रम का बन्धन स्वीकार नहीं करता। इसका एक उदाहरण
स्वप्न है। स्वप्न देखने वाला मनुष्य दस वर्ष पश्चात् की घटनाएँ अचानक देख लेता है, यद्यपि अभी मध्यवर्ती अवधि नहीं बीती होती। अर्थात् अक्रमानुगत समय में भूत, वर्तमान, भविष्य की कोई शर्त नहीं है। अक्रमानुगत
समय में ब्रह्मांडीय घटनाओं को मापने के ऐसे समस्त मानक
उपस्थित हैं जिनसे भूत, वर्तमान और भविष्य बिना किसी क्रम के मापे जा सकते
हैं। स्वप्न अथवा कल्पना में हम ऐसे काल को लौटा सकते हैं जो सहस्त्रों वर्ष पूर्व
बीत चुका है। कल्पना या स्वप्न में उसे वापस लाने में मध्यवर्ती अंतराल उपेक्षित
हो जाता है। अक्रमानुगत समय की एक पृष्ठभाग वह है जिसका हमने
उपर्युक्त पंक्तियों में उल्लेख किया है। और अक्रमानुगत समय की दूसरी पृष्ठभाग
निरन्तर हमारे ज़ेह्न के साथ जुड़ी रहती और क्रियाशील रहती है—जिसका एक उदाहरण ऊपर गुज़र चुका है और असंख्य उदाहरण
निरन्तर हमारे अनुभव में आते रहते हैं। उदाहरण: जब हम किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जिसे हमने आज से पच्चीस वर्ष पूर्व देखा
था, तो हमें पिछले पच्चीस वर्षों की सम्पूर्ण घटनाएँ
स्मरण करने की आवश्यकता नहीं होती, वरन् हम तत्काल उस व्यक्ति का चेहरा अपने ज़ेह्न में
ले आते हैं। वस्तुतः वह अक्रमानुगत समय के घेरे में सुरक्षित रहता है। हमारा ज़ेह्न उसकी व्यक्तित्व को वापस लाने के
लिए सभी मध्यवर्ती अंतरालों को हटा देता है। अन्य शब्दों
में, या तो हमारा ज़ेह्न अक्रमानुगत समय के उस घेरे में प्रवेश कर जाता है जिसमें वह व्यक्तित्व सुरक्षित है, या फिर अक्रमानुगत समय का घेरा हमारे ज़ेह्न में प्रवेश कर जाता है।
इस दूसरी पृष्ठभाग की और भी अनेक मिसालें दी जा सकती
हैं। जब हम सीढ़ी से उतरते हैं तो सीढ़ियों का माप जो पहले से अक्रमानुगत समय में अंकित है, हमारे पैरों का सही मार्गदर्शन करता है। इसीलिए हमें सीढ़ी उतरते समय सचेतन
विचार नहीं करना पड़ता। किन्तु कभी-कभी पाँव
डगमगा जाता है और हम गिर पड़ते हैं। उस क्षण किसी कारणवश हमारा ज़ेह्न अक्रमानुगत
समय के घेरे से हट जाता है और मार्गदर्शन क्रमानुगत समय के हाथों में आ जाता है। फलस्वरूप पाँव भूल कर बैठते
हैं क्योंकि सीढ़ियों का माप क्रमानुगत समय में अंकित नहीं होता। क़ुरआन में अक्रमानुगत समय को इल्म-उल-अस्मा से अभिहित किया गया है। इल्म-उल-अस्मा वह चेतना है जिसका नाम हमने अपनी पारिभाषिक भाषा में अक्रमानुगत समय रखा है—अर्थात् यह
चेतना अक्रमानुगत समय की अतिरिक्त विशेषता है।
आत्मा की स्वाभाविक विशेषता कालातीत समय है। इसमें अनादि से अनन्त तक की सभी चित्रमय फिल्में
सुरक्षित हैं। क़ुरआन की भाषा में इसे सुरक्षित पट्टिका कहा गया है। यह समय स्वरूप-तजल्लि में
अंकित है। इसकी अपनी स्थिति गुण-तजल्लि की
है। ईश्वर का वचन है कि मैंने आदम की प्रतिमा में अपनी आत्मा फूँकी। यही आत्मा
कालातीत समय का चेतन है। इसी चेतन के सम्मुख स्वरूप-तजल्लि (ज्ञान-कलम) और गुण-तजल्लि (सुरक्षित पट्टिका) स्थित हैं।
ये दोनों लोक नूर के पदक्रम हैं। गुण-तजल्लि के
पदक्रम में असंवहित समय और संवहित समय दोनों के लेख सुरक्षित हैं। गुण-तजल्लि वही चेतन है जिससे असंवहित चेतन और संवहित
चेतन दोनों को जीवन प्राप्त होता है। क़ुरआन की भाषा में गुण-तजल्लि को आदेश का लोक और बाकी दो समयों को सृष्टि का
लोक कहा गया है।
सृष्टि के लोक के दो पदक्रम हैं। एक लोक प्रतिरूप का है जो असंवहित समय है, दूसरा लोक प्रकृति का है। यह संवहित समय है। इसी को स्थूल लोक या इतिहास का
लोक और प्रकट जगत कहा जाता है।
ईश्वर का वचन है:
“نَحْنُ اَقْرَبُ اِلَیْہِ مِنْ حَبْلِ الْوَرِیْد
हम तुम्हारी प्राण-नाड़ी से भी
अधिक निकट हैं।”
इस आयत में तीन पदक्रम बताए गए हैं। पहला पदक्रम ईश्वर की स्वरूप और गुण का
है। यह कालातीत समय अर्थात् ईश्वर के प्रत्यक्ष ज्ञान का चेतन है। दूसरा पदक्रम प्राण-नाड़ी का है जो मानवीय “अना” अर्थात् नामों का ज्ञान का चेतन है। तीसरा पदक्रम उसका है जो प्राण-नाड़ी की ओर संकेत किया गया है। यह मनुष्य वस्तु के रूप में
है जिसका दूसरा नाम संवहित समय है। संवहित समय व्यक्तियों का चेतन है। इस चेतन में
ब्रह्मांड का प्रत्येक कण अपनी विशिष्टता की सीमा में स्वयं को जानता है। असंवहित
समय ब्रह्मांडीय चेतन है। यह व्यक्तियों में अचेतन रूप से काम करता है।
कालातीत समय ईश्वर का ज्ञान (प्रत्यक्ष ज्ञान) है। यह वही चेतन है जो ब्रह्मांड के प्रत्येक कण में क्रियाशील है। जब यह चेतन ब्रह्मांड में काम करता है तो ब्रह्मांड इसे अपना स्वाभाविक चेतन मानता है और जब यह चेतन कण में काम करता है तो कण इसे अपना व्यक्तिगत चेतन समझता है। जब तक यह चेतन ब्रह्मांड से परे है तब तक यह कालातीत समय है। जब ब्रह्मांड में समा जाता है तो असंवहित समय कहलाता है और जब कण के भीतर गति करता है तो संवहित समय बन जाता है।
“-اللّٰہ نور السموات والارضअल्लाह आकाशों और पृथ्वी का नूर है” में इसी चेतन को नूर कहा गया है।
मनुष्य की स्वरूप में इन्हीं तीन चेतनों के चरण काम
करते हैं। وَالَّذِیْنَ جَاھَدُوْ افِیْنَالَنَھْدِ یَنَّھُمْ سُبُلَنَاوَاِنَّ اللّٰہَ لَمَعَ الْمُحْسِنِیْنَ لْمُحْسِنِیْنَ
(सूरा 29, आयत 69)
अनुवाद: और जिन्होंने
परिश्रम किया हमारी राह में, तो निश्चय हम
दिखाएँगे उनको अपनी राह और निस्संदेह अल्लाह उनके साथ है जो उपकार करने वाले हैं।
ईश्वर ने इस आयत में कालातीत समय और असंवहित समय दोनों की ओर
संकेत किया है। जो लोग ईश्वर की खोज करते हैं उन पर ये दोनों समय अनावृत हो जाते
हैं। उनकी स्वरूप में वह जागरूकता उत्पन्न हो जाती है जो संवहित समय में इन दोनों
समयों को समझती और अनुभव करती है। अनेक अवसरों पर उन पर वे वस्तुएँ अनावृत हो जाती
हैं जो कालातीत समय से असंवहित और असंवहित से संवहित में कभी स्थानांतरित हुई थीं
या आगे कभी स्थानांतरित होंगी। उनकी दृष्टि, उनकी समझ और उनके अनुभव कभी-कभी अतीत, वर्तमान और
भविष्य के आकृतियाँ एक साथ देख
लेते हैं। फिर उनकी समझ अतीत, वर्तमान और
भविष्य की गतिविधियों को एक-दूसरे से अलग
जान लेती है। संवहित समय का संबंध अपने हर छोर पर असंवहित समय से जुड़ा हुआ है और
असंवहित समय का संबंध अपने हर छोर पर कालातीत समय से सम्बद्ध है।
कोई भी वस्तु जो इस समय विद्यमान है, संवहित समय की एक इकाई (Unit) है। यह अस्तित्व में आने से पहले जीवन के मंडल से
बाहर नहीं हो सकती, क्योंकि जो
वस्तु जीवन के मंडल से बाहर है वह जीवन के मंडल में प्रवेश करने की क्षमता नहीं
रखती। एक वृक्ष जो पूर्ण रूप से विकसित होकर हमारे सामने आ चुका है, अपने पूर्वजों के भीतरी रूप में विद्यमान था। दूसरे
शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि वृक्ष के पूर्वजों का भीतरी रूप ही प्रकट की
आकृति ग्रहण कर वृक्ष बना है। वृक्ष के पूर्वजों का भीतरी रूप असंवहित समय है।
क़ुरआन में ईश्वर ने ब्रह्मांड की संरचना का उल्लेख निम्नलिखित शब्दों में किया है:
اَلَّذِیْ خَلَقَ فَسَوّٰی وَالَّذِیْ قَدَّرَ فَھَدٰی
वह जिसने उत्पन्न किया, फिर सम्यक् अनुपात दिया, और जिसने
नियति बनाई, फिर मार्गदर्शन किया।
व्याख्या: किसी वस्तु का अस्तित्व वस्तुतः उन निहित तत्त्व-आवश्यकताओं का समष्टि है जो उसकी प्रकृति-संरचना में अंतःस्थापित हैं। अर्थात् वस्तु केवल एक आवरण (खोल) है जिसके भीतर वे तत्त्व-आवश्यकताएँ संचित रहती हैं। इसे हम मानक-पात्र (पैमाना) से उपमेय कर सकते हैं। यही सृष्टि-विधान का प्रथम चरण है।
द्वितीय चरण है संवेदी-संयोजन (हस्से
मुश्तरक)। यह उस मानक-पात्र के प्रयोजन-नियम का विवेचन है—अर्थात् उन
आवश्यकताओं का किस प्रकार उपयोग-नियज़ेह्न किया
जाए।
तृतीय चरण है प्रयोग-फलन का नियम
। उदाहरणतः अग्नि का स्वभाव है दग्धन। यदि कोई द्रव्य अग्नि में समर्पित किया जाए
तो उसका दहन होगा। जल का स्वभाव है शोषण। यदि कोई पदार्थ जल में निमज्जित हो तो वह
आर्द्र हो जाएगा। यह सब प्रयोग-फलन-नियम के अंतर्गत है।
चतुर्थ चरण है प्राप्ति अथवा उपलम्भ । यदि कोई द्रव्य किसी कल्याणकारी प्रयोजन से दग्ध किया जाए तो वह कर्म शुभ कहलाएगा, और यदि व्यर्थ अथवा विध्वंसकारी प्रयोजन से हो तो वह
कर्म अशुभ अथवा अप्रयोज्य माना जाएगा। दोनों ही कर्मों के फल-परिणाम होते हैं। यही फल हितकारी अथवा अनिष्टकारी कहलाते हैं। इस ही चरण का नाम है अनुग्रह अथवा मार्गदर्शन ।
जब मनुष्य अपनी अंतःस्थित आवश्यकताओं का युक्तिपूर्ण और सुसंयमित प्रयोग करता है और उससे संपूर्ण मानव-जाति के लिए कल्याण-फलन उत्पन्न होते हैं तो उसकी प्रकृति से निष्कलुष भाव-स्रोत फूट पड़ता है। यही स्रोत उसकी चिन्तन-शक्ति को पोषण देकर ऐसे स्तर तक ले जाता है जहाँ उसकी चिन्ता संपूर्ण मानवता के
सामूहिक आवश्यकताओं का अवलोकन एवं संवेदन करने लगती है। इसके आगे यह चिन्ता ऐसे विशाल आयामों में प्रवेश करती है जहाँ उस पर समस्त ब्रह्माण्डीय तत्त्व-आवश्यकताएँ उद्घाटित हो जाती हैं। इसके पश्चात
भी एक और चरण है—उस पर मनुष्य की चिन्ता अतीन्द्रिय-ब्रह्माण्ड (मावराये
कायनात) से प्रत्यक्षानुभूत हो जाती है। यही साक्षात्कार सत्य-जागरूकता (हकीकत-आगही) और दैवीय-अनुभूति (इलाही-मारिफ़त) है। यहाँ पहुँचकर मनुष्य असतत्-काल (ज़मान ग़ैर मुतवातर) और नित्य-काल (ज़मान हक़ीक़ी) दोनों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
समष्टि-आवश्यकताओं
का यह उद्घाटन मनुष्य में असतत्-कालिक चेतना को उद्बुद्ध करता है। इस दशा को सूफ़ी परिभाषा में जम‘ (संग्रह-स्थिति) कहा जाता है, और जब मानव-चिन्ता का केन्द्रीयकरण अतीन्द्रिय-ब्रह्माण्ड में होता है तो इसे जम‘-अल-जम‘ (संग्रह का संग्रह) कहा जाता है। यह केन्द्रिता नित्य-कालिक चेतना को जागृत करती है।
संदिग्ध: इस विमर्श पर विचार करने वाले को यह भ्रम (वहम) हो सकता है कि ब्रह्माण्ड और व्यक्ति-ब्रह्माण्ड परस्पर पृथक हैं। परन्तु यह केवल आभासी-संदेह है। वास्तव में ब्रह्माण्ड अपने प्रत्येक व्यक्ति-अस्तित्व के सिद्ध (इस्बात्) और निषेध (नफ़ी) का योग है।
जब हमारे समक्ष केवल गुलाब है, तो उस क्षण—क्षण से अभिप्राय है क्षण का अत्यन्त सूक्ष्मांश (जैसे क्षण का करोड़वाँ अंश)—उस क्षण में गुलाब के अतिरिक्त और कोई सत्ता नहीं है।
हमारे अन्तःचेतन में केवल गुलाब का होना और गुलाब का न होना विद्यमान है। इस स्थिति में हमारी चिन्ता का सम्पूर्ण
केन्द्र केवल गुलाब पर ही अवस्थित है। हम उस विशेष
क्षण में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक ही एकक (Unit) मानते हैं—जिसका नाम है
गुलाब। जब तक हम उस एकक को त्याग न दें और अपने चिन्तन-केन्द्र को उससे न हटाएँ, तब तक दूसरे एकक-अस्तित्व से सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकते। सतत्-काल (ज़मान मुतवातर) में जब हम अपनी चिन्ता का विश्लेषण करते हैं तो हम एक समय में केवल एक ही
व्यक्ति-ब्रह्माण्ड से परिचित हो सकते हैं। इस प्रकार हम उसी
एकक को संपूर्ण ब्रह्माण्ड का नाम देते हैं। जब तक अन्य सभी व्यक्तियों का निषेध न हो जाए, तब तक हम उस विशेष व्यक्ति का अनुभव या प्रत्यक्षीकरण नहीं कर सकते। यहीं से इन्द्रिय-अवगाहन (इद्राक बि-ल-हवास) का नियम स्पष्ट हो जाता है कि हम एक ही क्षण में केवल एक सत्ता का अनुभव कर सकते हैं और इसके लिए अन्य सभी सत्ताओं का निषेध अनिवार्य है।
यदि इस सिद्धान्त को और विस्तृत रूप में कहें तो यह
प्रत्यक्ष होता है कि हमारे ज़ेह्न की केवल एक ही दिशा है, और वही दिशा हमारे स्वभावगत तत्त्व-आवश्यकताओं की गति-प्रवाहिनी है। हम न दाएँ, न बाएँ, न आगे, न पीछे, न ऊपर, न नीचे—कहीं भी नहीं
देख सकते। ये छ दिशाएँ केवल कल्पित अनुमिति की उपज हैं। वस्तुतः दिशा वही है जिस ओर हमारे मानसिक तत्त्व-आवश्यकताएँ गज़ेह्न कर रही हैं। उसी दिशा का नाम है समन्वित काल (Serial Time)। हम अपने दैनिक अनुभवों में इसी काल का साक्षात्कार इन्द्रिय-अवगाहन (इद्राक बि-ल-हवास) के नाम से करते हैं। यह समझा जाता है कि काल प्रवाहित होता रहता है, जबकि वास्तविकता यह है कि काल प्रवाहित नहीं होता, वह अभिलेखित (रिकार्ड) होता है। अर्थात् हम काल में उन्हीं घटनाओं (हवादिस/अश्या) को पाते हैं जिनका अर्थ-भार (म‘नवियत) सम्पूर्ण गहनता के साथ हमारे चेतन-मंडल में पहले से विद्यमान है। क़ुरआन मजीद में ईश्वर ने इसी काल को किताब-ए-मरक़ूम (पंजीकृत ग्रंथ) कहा है। यही है ‘इल्म-उल-अस्मा (ज्ञान-नामावलि)। हमें किसी
अर्थ-भावना को नाम देने का पूरा अधिकार है। परन्तु नाम
देने से पूर्व हम उसका अनुभव या तो दृश्य (मरई) रूप में करते हैं या अदृश्य (ग़ैर मरई) रूप में। चाहे यह रूप ख़याल के रूप में प्रकट हो या प्रत्यक्षानुभूति (शुहूद) की अवस्था में, हर दशा में यह रूप अंकित (नक़्श) होता है और यही अंकन इन्द्रिय-अवगाहन की छवि है। अतः जिन
मूल्यों का अधिकारी प्रत्यक्षानुभव (मशाहदा) है, उन्हीं मूल्यों का अधिकारी ख़याल भी है। यही कल्पना अन्तःचेतन-स्तर से यात्रा करके बहिःचेतन-स्तर पर प्रकट होकर प्रपंच (मज़ाहिर) के रूप में दीप्त हो जाती है।