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आलम-ए-तम्साल

            बिंदु--स्वरूप से नस्मह (ज़ेह्न) की ओर और नस्मह से शरीर की दिशा में नूर की एक धारा बहती है। प्रत्यक्ष रूप (शरीर) से नस्मह की ओर और नस्मह (ज़ेह्न) से बिंदु--स्वरूप की दिशा में रोशनी की एक धारा बहती है। जो नूर की धारा बिंदु--स्वरूप से प्रत्यक्ष रूप की ओर बहती है, उसके भीतर उलूम--लदुन्नियः का भंडार होता है। किंतु जो रोशनी की धारा प्रत्यक्ष रूप (शरीर) से बिंदु--स्वरूप की ओर बहती है, वह सांसारिक ज्ञान होता है अर्थात् शारीरिक आवश्यकताओं और इच्छाओं का संग्रह। यदि बिंदु--स्वरूप से अवतरित होने वाले उलूम--लदुन्नियः चेतना के लिए आकर्षक और रुचिकर हैं, तो उनका रंग धीरे-धीरे प्रत्यक्ष आकृतियों पर चढ़ जाता है। अर्थात् मनुष्य का सूक्ष्म स्वरूप (लतीफ़ा--नफ़्सी) उन ज्ञानों की नूरानियत से भरकर सत्य का रंग ग्रहण कर लेता है। यह सत्य का रंग ऐसा नूर है जिसके भीतर से कोई भी गाढ़ा रोशनी अर्थात् अंधकार नहीं गुजर सकता, बल्कि शरीर की आवश्यकताएँ और सारी इच्छाएँ उस रंग से छनकर सूक्ष्म नूर की किरणों में परिवर्तित हो जाती हैं और गाढ़े रोशनी (अंधकार) के बजाय मज़हर की दिशा से यह छनी हुई सूक्ष्म नूर की किरणें बिंदु--स्वरूप की ओर बहने लगती हैं। बिंदु--स्वरूप से मज़हर की ओर बहने वाली धारा और मज़हर से बिंदु--स्वरूप की ओर बहने वाली धारा जब उपर्युक्त अवस्था तक पहुँच जाती है तो मानव ज़ेह्न में एक नूर उत्पन्न हो जाता है जिसे हज़ूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने नूर- फिरासत कहा है। यह नूर- फिरासत पहले आलम--अमर-आम के अनावरण का कारण बनता है, फिर आलम--अमर-ख़ास के अनावरण का। आलम--अमर से मज़हर की ओर अवतरण और मज़हर से आलम--अमर की ओर आरोहण की गति निरंतर होती रहती है। आलम--अमर से मज़हर की ओर जो दिव्य ज्ञान का भंडार (उलूम--लदुन्नियः) उतरता है उसका प्रतिबिंब चेतना पर पड़ता है। चेतना उस प्रतिबिंब को ज़मीर (अंतरात्मा) के नाम से व्यक्त करती है। चेतना मानव मस्तिष्क का ऐसा दर्पण है जिसमें उलूम-एलदुनिया के अनवार का प्रतिबिंब पड़ता है। ये उलूम-एलदुनिया आदि से अनादि तक की स्थितियों पर आधारित होते हैं। उन स्थितियों का चित्रात्मक प्रतिबिंब चेतना पर पड़ता है। स्थितियों के उस चित्रात्मक प्रतिबिंब को आलम--तम्साल कहते हैं। यदि किसी व्यक्ति की चेतना (ज़ेह्न) एक स्वच्छ दर्पण है तो बंद आँखों से या खुली आँखों से स्थितियों का चित्रात्मक प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यदि लतीफ़ा--नफ़्सी की ओर से गाढ़ा रोशनी अर्थात् अंधकार धारा बनकर बिंदु--स्वरूप की ओर बहता है तो चेतना का दर्पण स्वच्छ नहीं रहता और उलूम-एलदुनिया के सभी चित्रात्मक प्रतिबिंब निगाह से अदृश्य हो जाते हैं।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai