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रूया की क्षमताओं के स्तर

 

नंबर १: प्रकटज्ञान(कश्फ़) अलजू

नंबर २: प्रकटज्ञान(कश्फ़) अल-अहक़ा

नंबर ३: प्रकटज्ञान(कश्फ़) अल-मनाम

नंबर ४: प्रकटज्ञान(कश्फ़) अल-मुल्कूत

नंबर ५: प्रकटज्ञान(कश्फ़) अल-कुलियात

नंबर ६: प्रकटज्ञान(कश्फ़) अल-वुजूब

प्रकटज्ञान(कश्फ़) अलजू  वह क्षमता है जिसके माध्यम से प्रत्येक आदमी वह्दत के सापेक्ष परिचित होता है। ईश्वर की आज्ञा की रचना का नाम ब्रह्मांड है। इसी आदेश के माध्यम से ईश्वर की आवरण करने वाली गुण संपूर्ण संग्रह (कुलियात) में स्थानांतरित हुई है।

संपूर्ण संग्रह (कुलियात) के सभी अंश एक-दूसरे का चेतना रखते हैं। भले ही व्यक्ति के ज्ञान में यह बात न हो, लेकिन व्यक्ति की स्थिति कुलियात में एक स्थान रखती है। यदि ऐसा न होता तो मनुष्य चाँद, तारों और अपनी पृथ्वी से अलग वातावरण से परिचित नहीं हो पाता। उसकी निगाह सभी आकाशीय पिंडों को देखती है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्रत्येक मनुष्य की इंद्रियाँ पृथ्वी से बाहर के वातावरण को भी पहचानती हैं। यही पहचान तसाव्वुफ़ की भाषा में ईश्वर की स्वभावों की प्रत्यक्षज्ञता (सिफ़ात--इलाही की मैरेफ़त) कहलाती है। अब हम इस प्रकार कहेंगे कि मानव चेतना की निगाह ब्रह्मांड के प्रकट रूप को देखती है और मानव के अवचेतन की निगाह ब्रह्मांड के अंतःस्वरूप को देखती है। अन्य शब्दों में, मनुष्य का अवचेतन अच्छी तरह जानता है कि ब्रह्मांड के प्रत्येक अंश का रूप और आकृति, गतियाँ और आंतरिक संवेदनाएँ क्या हैं। वह इन सभी गतियों को केवल इसलिए नहीं समझ सकता कि उसे अपने अवचेतन का अध्ययन करना नहीं आता। यह अध्ययन रूया की क्षमताएँ जागृत करने के बाद संभव है।

सबसे पहले हम रूया की उस क्षमता का उल्लेख करते हैं जिसे तसव्वुफ़ की भाषा में कश्फ़ अलजू कहा जाता है।

मिसाल के रूप में, यदि एक मुद्दा-लेखक की बात लें तो स्पष्ट है कि मुद्दा का सार्थक अर्थ पहले से कुलियात के चेतना में, अर्थात् मुद्दा-लेखक के अवचेतन में विद्यमान था। वहीं से यह स्थानांतरित होकर लेखक के ज़ेह्न तक पहुँचा। अब यदि कोई व्यक्ति इस मुद्दा का अवचेतन में अध्ययन करना चाहे तो रूया की इस क्षमता के माध्यम से, जिसे कश्फ़ अलजू कहा गया है, अध्ययन संभव है। चाहे यह मुद्दा दस हज़ार साल बाद लिखा जाना हो या दस हज़ार साल पहले लिखा जा चुका हो।

जिस समय ईश्वर ने शब्द " क़ुन" कहा, तो अनादि से अनंत तक जो कुछ भी किस प्रकार और किस क्रम में होना था, हो गया। अनादि से अनंत तक प्रत्येक अंश, उसकी सभी गतियाँ और स्थिरताएँ अस्तित्व में आ गईं। किसी भी समय में उसी गति का प्रदर्शन संभव है क्योंकि कोई अस्तित्वहीन, अस्तित्ववान नहीं हो सकता। अर्थात् ब्रह्मांड में कोई ऐसी वस्तु मौजूद नहीं हो सकती जो पहले से अस्तित्व में न हो।

मनुष्य जब किसी कोण को सही रूप से समझना चाहता है तो उसकी स्थिति निष्पक्ष या न्यायप्रिय होती है और वह न्याय के रूप में कभी पक्षधर नहीं होता। न्याय को वादी और प्रतिवादी के मामलों को सही रूप से समझने के लिए न्याय का ही विचारधारा इस्तेमाल करना होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि एक विचारधारा पक्ष की है और एक विचारधारा न्याय की है।

प्रत्येक व्यक्ति के पास विचारधारा के दो कोण होते हैं। एक कोण मामला जानने वाले के रूप में और दूसरा कोण निष्पक्ष के रूप में। जब मनुष्य निष्पक्ष के रूप में जिज्ञासा करता है तो उस पर तथ्य प्रकट हो जाते हैं। इस जिज्ञासा की क्षमता प्रत्येक व्यक्ति को अर्पित की गई है ताकि दुनिया का कोई वर्ग मामलों की समझ और सही निर्णय से वंचित न रहे।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai