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ईश्वर सर्वशक्तिमान का अरश पर स्थित होना और प्राण-नाड़ी से समीप होना… दोनों अरशादों में साझा अर्थ खोजना
पड़ेगा। वस्तुतः यह ‘अदराक’ ही के दो आकलन हैं। व्यापकता (पहनाई) में अदराक
करना तो मानवीय ‘कल्पना’ को अनन्तता (लातनाहित) के आयाम में
ले जाता है। उसी आयाम को ईश्वर सर्वशक्तिमान ने अरश कहा है। गहराई में अदराक करना
मानवीय चेतना के समीप पहुँचाता है। इसे ईश्वर सर्वशक्तिमान ने प्राण-नाड़ी से आसन्नता कहा है। यहाँ
यह बात उपेक्षित नहीं की जा सकती कि अनन्तता का आयाम और अनन्तता का समीप हमअर्थ और
पर्यायवाची अर्थ उत्पन्न करते हैं। ये दोनों स्थान वस्तुतः एक ही हैं। केवल अदराक
के आकलन अलग-अलग हैं। अदराक एक ओर व्यापकता में यात्रा कर अरश तक
पहुँचाता है, दूसरी ओर गहराई की दूरीयाँ तय कर प्राण-नाड़ी के आसन्नता में विलीन हो
जाता है। दोनों ही प्रकार अल्लाह तक पहुँचना है। पहला अदराक ‘तसविद’ और दूसरा
अदराक ‘तज़हीर’ है। अब दो
अदराक ‘तजरीद’ और ‘तशहीद’ शेष हैं।
तजरीद तसविद का दूसरा पक्ष है। प्रत्येक ऊँचाई की एक नीचाई होती है और प्रत्येक
नीचाई की एक ऊँचाई। इस प्रकार तसविद का नीचा पक्ष तजरीद है और तज़हीर का ऊँचा पक्ष
तशहीद है। ये दोनों पक्ष ब्रह्मांड की उन सीमाओं का वर्णन करते हैं जो पार-ब्रह्मांड (मावरा-ए-कायनात) से जा मिलती हैं। इस अर्थ की व्याख्या इन शब्दों में
की गई हैः
अल्लाह ऊँचाइयों और नीचाइयों का नूर है। जैसे एक ताक़, उसमें एक कन्दील और कन्दील के भीतर रखा हुआ दीपक। यह
पवित्र तेल का दीपक बिना किसी प्रकट रोशनी के प्रकाशमान है, जिसकी रोशनी ‘नूर अंदर नूर’ हर दिशा से मुक्त है।’’
जब आयाम की खोज की जाएगी तो ईश्वर की विशेषताएँ ‘नूर दर नूर’ मिलेंगी।
इन्हीं चार इद्राक के ज़रिए ईश्वर की स्वरूप-ज्ञान हासिल होती
है। सियाह बिंदु का ज़िक्र आ चुका है। इसी बिंदु से चारों इद्राक का स्रोत उबलता है। इस मुक़ाम पर यह सवाल हो सकता है
कि आख़िर इद्राक है क्या? इद्राक काल है। यही अद्राक सेकण्ड की न्यूनतम कणिका है। हम समझने के
लिये इसे खरबवाँ अंश कह सकते हैं अथवा उससे भी कोई सूक्ष्मतर अंश जो हमारे चिन्तन
में आ सकता हो। दूसरी ओर अति दीर्घ अवकाश, जिसे मानव जाति की मानसिक उड़ान गिन सकती हो। ये दोनों अद्राक हैं और श्याम
बिन्दु के गुण हैं। लघुतम से लघुतम तथा महत्तम से महत्तम अवकाशों की प्रत्यक्ष
दृष्टान्त हिरोशिमा और नागासाकी पर अणु-बम का घटना
है।