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अना या मानवीय ज़ेह्न की संरचना

 

जब हम किसी वस्तु की ओर देखते हैं तो चिकित्सा-विज्ञान की शोध के अनुसार उस वस्तु से निकलने वाली रोशनियाँ नेत्रों के द्वारा मस्तिष्क के सूचनात्मक भंडार तक पहुँचती हैं। हम इस प्रक्रिया को देखना कहते हैं। दूसरे शब्दों में यह हमारा आंतरिक ज्ञान है। इस आंतरिक ज्ञान के अनेक अवयव हैं जिन्हें बासिरा या बासिरा के अतिरिक्त अन्य इंद्रियों का नाम दिया जाता है और यही इंद्रियाँ अवलोकन का साधन बनती हैं। ये अवलोकन विचार से आरम्भ होकर देखना, सुनना, चखना, सूँघना और छूने पर पूर्ण होते हैं। अवलोकनों में किसी शारीरिक गति का हस्तक्षेप नहीं होता। ये केवल अना की प्रेरणाएँ हैं। अवलोकनों में भौतिक अंग निष्क्रिय रहते हैं। वस्तुतः जीवन अना की प्रेरणाओं का नाम है। अना के ही शरीर को रूपात्मक आत्मा (रूह--मिसाली) कहा जाता है। यही शरीर स्वप्न में चलता-फिरता और समस्त कार्य करता है। यह जिस्म--अना स्थूल (ख़ाक़ी) शरीर के साथ भी गति करता है और बिना स्थूल शरीर के भी।

कर्मों की दो प्रकारें हैं:

एक प्रकार उन कर्मों का है जो बिना स्थूल शरीर के संपन्न होते हैं जैसे स्वप्न के कर्म। दूसरे प्रकार के कर्म वे हैं जो हम जाग्रति में स्थूल शरीर के साथ संपन्न करते हैं। इन कर्मों का आरम्भ भी मानसिक प्रेरणाओं से होता है। बिना ज़ेह्न की दिशा-निर्देशना के स्थूल शरीर अत्यल्प भी गति नहीं कर सकता। अर्थात् आंतरिक प्रेरणाएँ ही जीवन के वास्तविक कर्म हैं।

अब हम अना की सक्रियता (फ़ा'इलियत) का विश्लेषण करते हैं।

ज़ैद ने महमूद को देखा। ज़ैद एक "अना" है। वह केवल अपनी अना की सीमा में देख सकता है। वह अपनी अना की सीमा से बाहर क़दम नहीं रख सकता। गोया उसने महमूद को अपनी ही अस्तित्व-सीमा में देखा है। अनुभवों की भाषा में यूँ कहा जाएगा कि ज़ैद की अना ने स्वयं को महमूद बनकर देखा है क्योंकि ज़ैद महमूद की सीमा में और महमूद ज़ैद की सीमा में क़दम नहीं रख सकता। यदि ज़ैद महमूद की सीमा में क़दम रख सकता तो उसका नाम ज़ैद न रहता बल्कि महमूद बन जाता और उसकी अपनी अना नष्ट हो जाती। देखने की क्रिया जिन सीमाओं में घटित हुई, वे सीमाएँ केवल ज़ैद की अना से जुड़ी हुई हैं। वस्तुतः हर अना में ब्रह्मांड की सभी अनाएँ मौजूद हैं और हर अना एक स्वतंत्र व्यष्टि-स्वरूप की हैसियत भी रखती है।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai