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विराम


विराम या समय ऐसी स्थानिक अवस्था का नाम है जो दीर्घगामी यात्रा में परिभ्रमण करती है। उक्त चारों चेतनाएँ जब दीर्घगामी दिशा में परिभ्रमण करती हैं तो उस परिभ्रमण का नाम विराम या समय या काल (Time) है किन्तु जब ये चारों चेतनाएँ अपने केंद्रीय परिभ्रमण में संचरित होती हैं तो उस परिभ्रमण को स्थान (Space) से अभिव्यक्त किया जाता है। ये दोनों अवस्थाएँएक दीर्घगामी दिशा का परिभ्रमण, दूसरी धुरीय दिशा का परिभ्रमणएक साथ घटित होती हैं। ये दोनों परिभ्रमण मिलकर चेतना के भीतर सतत गति की सृष्टि करते रहते हैं। हम दीर्घगामी गति को अपने इन्द्रियों में सेकण्ड, मिनट, घण्टे, दिन, मास, वर्ष और शताब्दियों के रूप में पहचानते हैं और धुरीय गति को पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह-नक्षत्र और सौर-व्यवस्था की स्थिति में जानते हैं। ये दोनों अवस्थाएँ मिलकर विराम कहलाती हैं।

वास्तव में हमारे इन्द्रियों के भीतर एक परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन परे निर्बर्ण, निर्बर्ण, एकवर्ण और सर्ववर्ण का संयोग है। वह्मा से इस परिवर्तन का प्रारम्भ होता है। फिर यह परिवर्तन विचार और छवि की राहें तय करके संवेदनाओं का रूप ग्रहण कर लेता है। परिवर्तन फिर उसी सीढ़ी से लौट आता है अर्थात् उसे संवेदनाओं से छवि, विचार और वाह्म तक प्रत्यावर्तन करना पड़ता है। वह्मा ह्म, विचार और छवि ये तीनों अवस्थाएँ दीर्घगामी गति की एक ही दिशा में स्थित होती हैं और संवेदनात्मक अवस्था धुरीय गति की उसी दिशा में स्थित होती है जिस दिशा में दीर्घगामी गति घटित होती है। इस प्रकार संवेदनाओं में कालिक और स्थानिक दोनों परिवर्तन एक ही बिन्दु में घटित होते हैं। उसी बिन्दु का नाम विराम है। विराम की शृंखला अनादि से अनन्त तक प्रवाहित है। उक्त चार चेतनाओं की केंद्रित अवस्थाएँ पृथक-पृथक चार जीवन रखती हैं। संवेदनाओं की केंद्रितता लोक-नासूत कहलाती है। छवि की केंद्रितता अवरोह में स्वप्न-लोक, घटना-लोक या तम्साल-लोक और आरोह में आत्मा-लोक या बर्ज़ख-लोक (इल्लीइन और सिज्जीन) कहलाती है। विचार की केंद्रितता अवरोह में मुब्दा और आरोह में हश्र--नशर (स्वर्ग और नरक) कहलाती है।

चेतना का प्रथम विभाग जिसका नाम "राह" लिया गया है, "अनिवार्य अस्तित्व" कहलाता है। शेष तीन विभाग "अस्तित्व" कहलाते हैं। अनिवार्य अस्तित्व में परिवर्तन नहीं होता किन्तु अस्तित्व में दीर्घगामी और धुरीय परिभ्रमण मिलकर विराम या अस्तित्व कहलाते हैं। दोनों परिभ्रमणों में पहला परिभ्रमण ब्रह्माण्ड के कण-कण का आपसी सम्बन्ध है। इस परिभ्रमण में ब्रह्माण्ड का अस्तित्व और ब्रह्माण्डीय चेतना की अवस्थाओं का अस्तित्व विद्यमान है। धुरीय परिभ्रमण व्यक्ति का परिभ्रमण है। इस परिभ्रमण के भीतर व्यक्ति का अस्तित्व और उसकी अवस्थाओं का अस्तित्व है। किन्तु व्यक्ति की समस्त अवस्थाएँ ब्रह्माण्ड की सामूहिक अवस्थाओं का एक अंश होती हैं। यदि हम किसी कण के भीतर यात्रा करें तो सर्वप्रथम "संयुक्‍त नस्‍मा" की कालिकता (Space) प्राप्त होगी। यह कालिकता संवेदनाओं का जगत है। इस कालिकता की सीमाओं में व्यक्ति की चेतना "दर्शन" के इन्द्रियों में डूबी रहती है। अर्थात् "दर्शन" स्वयमेव इन्द्रियों का संयोग है। दर्शन की कालिकता के भीतर एक दूसरी कालिकता है जिसे "स्वप्न-लोक" कहते हैं। यह नस्मा--मुफ़रद का काल-स्थान व्यक्ति के स्वरूप का ऊपरी वस्त्रहै, अर्थात् रुइया एक ऐसा काल-स्थान है जिसे व्यक्ति का आंतरिक शरीर कहा जा सकता है। रुइया के काल-स्थान के भीतर भी एक और काल-स्थान विद्यमान है। यह काल-स्थान परिवर्तनीय दिव्य प्रकाश (नूर--मुतग़य्यिर) का शरीर है और फिर इस काल-स्थान के भीतर अपरिवर्तनीय दिव्य प्रकाश (ग़ैर मुतग़य्यिर नूर) निवास करता है। अपरिवर्तनीय दिव्य प्रकाश वाजिबुल-वुजूद अथवा ईश्वर के, या तजल्लि--स्वरूप, या लामकान है। इसकी व्यापकता पूरे ब्रह्मांड को अपने घेरे में लिए हुए है, किन्तु ईश्वर-स्वरूप  इससे परे है। तथापि, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, यह ईश्वर-स्वरूप का एक गुण है और क़ायिम-बिस्स्वरूप है।

संयुक्त नस्मा, एकल नस्मा, परिवर्तनीय नूर और अपरिवर्तनीय नूर के इन्द्रिय अलग-अलग हैं। लोक-नासूत में दर्शन के इन्द्रिय प्रबल और शेष इन्द्रिय दमन में रहते हैं। जिस समय व्यक्ति रुइया में रहता है तो उसकी ध्यान निगाह से हटकर रुइया में केंद्रित होती है। मानो रुइया के इन्द्रिय प्रबल और शेष विभागों के इन्द्रिय दमन में रहते हैं। अनादि से लोक-नासूत की उत्पत्ति तक रुइया के इन्द्रिय व्यक्ति के शेष सभी चेतनाओं पर प्रबल थे किन्तु लोक-नासूत में ये इन्द्रिय केवल निद्रा की अवस्था में पुनः लौटते हैं और जाग्रति के पश्चात रुइया के इन्द्रिय दमन हो जाते हैं। मृत्यु के पश्चात बर्ज़ख या आराफ़ में ये इन्द्रिय पुनः शेष सभी इन्द्रियों पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेंगे। विभाग--आत्मा के इन्द्रिय लोक--वाक़िआ में भी दमन में थे, लोक--दर्शन में भी दमन में हैं और लोक--बर्ज़ख में भी दमन में रहेंगे किन्तु क़ियामत के दिन विभाग--आत्मा के इन्द्रिय शेष सभी इन्द्रियों को दमन कर देंगे और फिर स्थायी रूप से यही इन्द्रिय प्रबल रहेंगे।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai