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ब्रह्मांड की संरचना में नस्मा सूक्ष्म (नज़र न आने वाली रोशनी) की तरह हर वस्तु का आवरण
किए हुए है। आवरण करने से आशय है कि प्रत्येक सकारात्मक और नकारात्मक जीवन की
बिसात में नस्मा व्याप्त है। अर्थात्
प्रत्येक वस्तु के लघुतम और अचिह्न अंश अविभाज्य अंश की नींव दो प्रकारों पर
आधारित है—एक उसकी नकारात्मकता और दूसरी उसकी सकारात्मकता। इन्हीं दोनों क्षमताओं की
संयुक्तता का नाम नस्मा है।
हम सामान्य वार्ता में शब्द ‘प्यास’ का प्रयोग करते हैं, किन्तु इस शब्द के जो अर्थ समझे जाते हैं वे वास्तविक नहीं हैं। वास्तव में
प्यास और जल दोनों मिलकर एक अस्तित्व बनाते हैं। नकारात्मकता प्यास है, सकारात्मकता जल है। स्पष्ट रूप से
कहना चाहिए कि प्यास आत्मा है और जल शरीर है। प्यास एक पक्ष है और जल दूसरा पक्ष।
यद्यपि ये दोनों पक्ष परस्पर विरोधी हैं, तथापि ये एक ही अस्तित्व के दो अंश हैं। प्यास से जल को और जल से प्यास को अलग
नहीं किया जा सकता। जब तक संसार में प्यास विद्यमान है, जल भी विद्यमान है। अर्थात् प्यास
का होना जल के अस्तित्व का उज्ज्वल प्रमाण है और जल का होना प्यास के अस्तित्व का
उज्ज्वल प्रमाण है। आध्यात्मिक विज्ञान में ये दोनों मिलकर एक अस्तित्व हैं, परन्तु इनकी संबद्धता ऐसी नहीं है
जैसी एक पन्ने के दो पृष्ठों की होती है। एक पन्ने के दो पृष्ठ एक-दूसरे से अलग नहीं हो सकते, किन्तु प्यास और जल का अस्तित्व
ऐसा पन्ना है जिसमें केवल स्थानिक दूरी है, कालिक दूरी नहीं है। इसके विपरीत, कागज़ के पन्ने में केवल कालिक
दूरी है, स्थानिक दूरी नहीं है। वस्तुओं की संरचना में ईश्वर ने दो
पक्ष रखे हैं। किसी वस्तु के दो पक्षों में या तो स्थानिक दूरी प्रमुख होती है या
कालिक दूरी प्रमुख होती है।
एक मनुष्य पृथ्वी पर जन्म लेता है और प्रस्थान करता है—इन दोनों पक्षों के मध्य
कालिक दूरी होती है। इस कालिक दूरी के रेखाचित्र ही उसका जीवन हैं, जो वस्तुतः कालिकता है।