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ज्ञान-बोध (तफ़हीम) की पद्धति

 

ज्ञान-बोध की पद्धति दिन-रात के चौबीस घंटों में एक घंटा, दो घंटे या अधिकतम ढाई घंटे सोने और शेष समय जागृत रहने की आदत डालकर प्राप्त की जा सकती है।

ज्ञान-बोध की पद्धति को सूफ़ी साधक "सैर- गमन" और "फ़तह- विजय" के नाम से भी व्यक्त करते हैं। तफ़हीम का मुराकबा आधी रात बीतने के बाद करना चाहिए।

मनुष्य की आदत है जागने के बाद सोना और सोने के बाद जागना, वह दिन लगभग जागकर और रात सोकर गुज़ारता है। यही तरीका प्रकृति का आवेदन बन जाता है। ज़ेह्न का कार्य देखना है। यह कार्य वह निगाह के माध्यम से करने का अभ्यस्त है। वास्तव में निगाह ज़ेह्न के अतिरिक्त कुछ नहीं है। जागृत अवस्था में ज़ेह्न अपने परिवेश की हर वस्तु को देखता, सुनता और समझता है। सोने की अवस्था में भी यह क्रिया जारी रहती है, केवल उसके आकृतियाँ गहरी या हल्की होती हैं। जब आकृतियाँ गहरी होती हैं तो जागने के बाद स्मृति उन्हें दोहरा सकती है। हल्की आकृतियों को स्मृति भुला देती है। इसीलिए हम उस सम्पूर्ण वातावरण से परिचित नहीं होते जो नींद की अवस्था में हमारे सामने होता है।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai