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काला बिंदु को समझने के लिए उसका नाम समय(Time) रखना आवश्यक है। समय के दो पदक्रम हैं। एक पद में स्थान और
समय के अंतराल विद्यमान हैं। दूसरे पद में स्थान और समय के अंतराल विद्यमान नहीं हैं। एक पद
में द्रष्टा क्रमशः देखता
है। उसका देखने का ढंग कुछ इस प्रकार होता है कि वह एक क्षण के बाद दूसरे
क्षण, तीसरे क्षण और इसी प्रकार अनगिनत क्षणों के अनुक्रम
का अनुभव करता है। यही
अनुभव की पुनरावृत्ति है। अनुभव की
पुनरावृत्ति से साक्षात्कार की गहराइयाँ
उदाहरणार्थ दिन एक हब्ज़ (Space) है। रात एक स्पेस है, फूल एक स्पेस है, फ़ज़ा एक स्पेस है, मिट्टी एक स्पेस है, पानी एक स्पेस है, ख़याल एक स्पेस है, आग एक स्पेस है, हवा एक स्पेस है, चाँदी एक स्पेस है, सोना एक स्पेस है, हर शै का छोटे से छोटा ज़र्रा एक स्पेस है, ब्रह्मांड का बड़े से बड़ा गोला एक स्पेस है। यदि किसी छोटे से छोटे परमाणु (Atom) के खरब दर खरब टुकड़े किये जाएँ तो हर टुकड़ा एक स्पेस है। यदि एक सेकेंड को
संख दर संख हिस्सों में विभाजित किया जाए तो हर हिस्सा एक हब्ज़ (Space) है। काला बिंदु में अनादि से अनंत तक जितने हब्ज़ हो सकते हैं, वे सब तह दर तह मौजूद हैं।
काले बिंदु का दोहरा दृष्टिकोण पूर्ववर्णित दृष्टिकोण
से विपरीत है। इस दृष्टिकोण में काले बिंदु की गहराइयाँ उस स्तर की अनंतता रखती
हैं कि प्रथम दृष्टिकोण का बोध उसका परिग्रहण नहीं कर सकता। तथापि यह दृष्टिकोण
अपना पृथक् बोध रखता है। इस बोध को ईश्वर ٰ ने "लैलतुल क़द्र" कहा है।
गत पृष्ठों में तसुवीद, तजरीद, तशहीद और तज़हीर का उल्लेख हुआ है। ये चारों ही बोध हैं। और बोध को
समझने के लिए ब्रह्मांड की गहराई और चौड़ाई के विषय में जानना आवश्यक है।
ब्रह्मांड को चौड़ाई में देखना और गहराई में अनुभव करना अथवा हृदय की आँख से
ब्रह्मांड का अवलोकन करना बोध की प्रवृत्तियाँ हैं। प्रकट में
देखना चौड़ाई में देखना है। और गुप्त में देखना गहराई में देखना है। क़ुरआन पाक में इन दोनों प्रवृत्तियों का वर्णन किया गया है।
अल्लाह वही है जिसने धरती और आकाश को छह दिनों में रचा और फिर अर्श पर प्रतिष्ठित
हो गया। अन्य स्थान पर ईश्वर सर्वशक्तिमान ने कहा — "हम तुम्हारी रगِ जान से भी अधिक समीप हैं।" यह भी कहा गया है कि ईश्वर सर्वशक्तिमान धरती और आकाश
(ऊँचाइयों और गहराइयों) का नूरहै।