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अब हम
शब्द अल्लाह अर्थात् इस्म-ज़ात
के विषयों का तज़किरा करेंगे।
अल्लाह
का अलिफ़ अहदियत के समस्त मंडलों की तजल्लि का नाम है। अहदियत की तजल्लि से आशय सृष्टि की वह संरचना है जो तनज़ुल-ए-ज़ात
अर्थात् वाजिब के अनवार हैं। अस्तित्वमान
में ये अनवार नहर-ए-तस्वीद
के माध्यम से प्रसारित होते हैं। यही नहर-ए-तस्वीद
प्रत्येक सूक्ष्म तत्त्व-अख़फ़ा को सींचती है। इस प्रकार प्रत्येक सूक्ष्म तत्त्व-अख़फ़ा
एक-दूसरे से परिचित और अवगत है। ब्रह्मांड के वे सभी चेतन
प्राणी जिनमें सूक्ष्म तत्त्व-अख़फ़ा
मौजूद है,
सब के
सब नहर-ए-तस्वीद के माध्यम से इस अदृश्य संबंध में एक-दूसरे
से जुड़े हुए और परिचित हैं। यही वह आधार है जिसके द्वारा हम अस्तित्वगत तत्व की
प्रत्येक वस्तु को जानते हैं। नहर-ए-तस्वीद के सूक्ष्म रोशनी ही वे किरणें हैं जो मनुष्य, जिन्न
और चेतन प्राणियों की स्मृति (हाफ़िज़ा) का
कार्य करती हैं। इन्हीं किरणों में अस्तित्वमान का पूरा रिकार्ड सुरक्षित है। जब
हम किसी वस्तु को याद करना या जानना चाहते हैं तो यही किरणें गति करके अअयान से
होते हुए जवैया में प्रविष्ट होती हैं और हमारा चेतना निर्मित करती हैं। तब हम
किसी भूली हुई वस्तु को या जानी हुई वस्तु को अपने चेतना में अनुभव कर लेते हैं।
इस सत्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के सूक्ष्म तत्त्व-अख़फ़ा
में अनादि से अनन्त तक का समस्त ज्ञान-भंडार
सुरक्षित है। यदि वह इस भंडार से लाभ उठाने की साधना करे तो विभिन्न कालों के
विविध घटनाक्रम,
दुर्घटनाएँ
और जानकारियाँ अख़फ़ा की किरणों से प्राप्त कर सकता है।
अस्तित्वगत तत्व के
जीवन के सभी अवयव वही हैं जो ब्रह्मांड के अस्तित्व में आने से पहले ईश्वर के
ज्ञान में थे। यह समझना आवश्यक है कि अस्तित्वमान के सभी संयोजक अवयव वही हो सकते
थे जो पहले से ईश्वर के ज़ेह्न में विद्यमान थे। इन्हीं संयोजक अवयवों का एक नियम
के अंतर्गत क्रमबद्ध होना जीवन और अस्तित्व के रूप में प्रकट हुआ। इस भाव को और
अधिक स्पष्ट करने हेतु एक प्रश्न प्रस्तुत करते हैं। इस प्रश्न के उत्तर में नियम
की अनेक स्थितियाँ उद्घाटित हो जाएँगी।
प्रश्न: जीवन
क्या है?
उत्तर: जैसे
ईश्वर के चेतन में मनुष्य और उसकी आकृति-प्रकृति
उसी प्रकार विद्यमान थी जिस प्रकार मनुष्य वर्तमान स्थिति में उत्पन्न होकर
परिपक्व आकार लेकर एक आयु तक एक विशेष स्वरूप के रूप में जीवन व्यतीत करता है। इस
उदाहरण की व्याख्या इस प्रकार की जाती है कि मनुष्य का स्वरूप एक गति है। यह गति
ईश्वर के आदेश से आरम्भ होती है। इस गति के सहस्रों अवयव हैं और प्रत्येक अवयव एक
गति है। अर्थात् मनुष्य का स्वरूप असंख्य गतियों का समष्टि है। जब मनुष्य ने अपने
जीवन की प्रथम गति की तो उस गति की शुरुआत को अलग और अन्त को अलग स्वरूप बनने का
अवसर मिला। प्रारम्भ में जो गति घटित हुई, वह
सृजनता के गुण का प्रकट थी। वह गति आरम्भिक अवस्थाओं से गुज़रकर पूर्णता तक
पहुँची। पहला अवयव प्रारम्भिक गति और दूसरा अवयव पूर्णता। दोनों मिलकर मानव-जीवन
की एक तमसुल बने। उस गति के तुरन्त
पश्चात् जीवन की दूसरी गति प्रारम्भ हो गई। फिर उसकी भी पूर्णता हुई। ये दोनों
प्रतिमाएँ हुईं। पहली प्रतिमा एक रिकार्ड थी और दूसरी प्रतिमा भी एक पृथक रिकार्ड
के रूप में विद्यमान हुई। यदि पहली प्रतिमा का रिकार्ड सुरक्षित न रहता तो जीवन की
पहली गति,
जो
जीवन का एक अवयव है,
नष्ट
हो जाती। इसी प्रकार दूसरी प्रतिमा का रिकार्ड सुरक्षित न रहता तो दूसरी गति भी
नष्ट हो जाती। यदि नाश का यह क्रम चलता रहता तो जीवन की प्रत्येक गति घटते ही
लुप्त हो जाती। इस प्रकार किसी मनुष्य का समस्त जीवन निरर्थक हो जाता और तब किसी
प्रकार भी हम जीवन को जीवन नहीं कह सकते थे। इसलिए यह आवश्यक हुआ कि जीवन की
प्रत्येक गति संरक्षित रहे। जीवन की प्रत्येक गति ईश्वर के गुण सृजनता के अधीन
घटित हुई है अर्थात् सृजनता के गुण की सीमाओं में प्रकट हुई। उस गति का संरक्षित
रहना ईश्वर के ऐसे गुण में सम्भव था जो परिपूर्ण आवरण कर सके और संरक्षण की नहर-एरखता
हो। अतः यह आवश्यक हो गया कि गति, जो सृजनता के गुण के अधीन प्रारम्भ हुई थी, उसकी
पूर्णता नहर-एके गुण की सीमाओं में हो। अब प्रत्येक गति के लिए यह
अनिवार्य हो गया कि वह गुण सृजनता अर्थात् रहमत की सीमाओं में प्रारम्भ हो और गुण
स्वामित्व अर्थात् नहर-एकी सीमाओं में पूर्ण हो। इस सिद्धान्त से यह स्पष्ट हो
जाता है कि रहमत और नहर-एकी छाया में ही गति अस्तित्व में आ सकती थी। इन दोनों
गुणों का सहारा लिये बिना गति का अस्तित्व असम्भव है।
इस कथन
से यह सिद्ध हो जाता है कि जीवन रहमत और नहर-एका
समष्टि है। ईश्वर के जितने भी गुण हैं, उनमें से प्रत्येक गुण के साथ रहमत और नहर-एका
जुड़ना निश्चित है।
‘अलिफ़’ जिन
प्रकाश-तरंगों का नाम है उन्हें तसव्वुफ़ के अनुयायी की भाषा में "सिर्र" गुप्त
संकेत कहा जाता है। सिर्र वे अनवार हैं जो
अपनी सूक्ष्मता के कारण उच्चतम साक्षात्कार रखने वालों को दृष्टिगोचर होती हैं।
यही वे अनवार हैं जो
नहर-ए-तसवीद के माध्यम से अस्तित्वगत तत्व को सींचती हैं। इन्हीं अनवार के
द्वारा साधक ईश्वर की आत्मिक उद्भेदन प्राप्त करता है।
नहर-ए-तज्रीद, नहर-ए-तशहीद और नहर-ए-तज़हीर के अनवार स्वरूप-ज्ञान (मारिफ़त-ए-ज़ात) तक नहीं पहुँचा सकते। आत्मा-स्वरूप
की पहचान प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि साधक उन अनवार की
आत्मिक उद्भेदन प्राप्त करे जिनका नाम अलिफ़ है।
सुरक्षित
पट्टिका का नियम यह है कि जब कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से परिचित होता है तो अपनी
प्रकृति में उसका प्रभाव स्वीकार करता है। इस प्रकार दो व्यक्तियों में से एक
प्रभाव डालने वाला और दूसरा प्रभाव स्वीकार करने वाला होता है। परिभाषागत रूप से
हम इन दोनों में से एक का नाम "संवेदनशील"
और
दूसरे का नाम "संवेद्य" रखते
हैं। संवेदनशील,
संवेद्य
का प्रभाव स्वीकार करता है और पराजित की स्थिति रखता है। उदाहरण के लिए ज़ैद जब
महमूद को देखता है तो महमूद के सम्बन्ध में अपनी जानकारी के आधार पर कोई मत बनाता
है। यह मत महमूद का गुण है जिसे ज़ैद अपने भीतर एक अनुभव के रूप में स्वीकार करता
है। अर्थात मनुष्य दूसरे मनुष्य या किसी वस्तु के गुण से प्रभावित होकर और उस गुण
को स्वीकार करके अपनी हार और अधीनता का स्वीकार करता है। यहाँ आकर मनुष्य, पशु, वनस्पति
और जड़ पदार्थ सब एक ही पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं और मनुष्य की श्रेष्ठता
विलुप्त हो जाती है। अब यह समझना आवश्यक हो गया कि आखिर मनुष्य की वह कौन-सी
स्थिति है जो उसकी श्रेष्ठता को स्थिर रखती है और उस स्थिति को प्राप्त करना किस
प्रकार सम्भव हो सकता है।
नबियों
ने इस स्थिति को प्राप्त करने का प्रबंध इस प्रकार किया कि जब वे किसी वस्तु के
विषय में सोचते तो उस वस्तु और अपने बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध स्थापित नहीं करते
थे। सदैव उनकी विचारधारा यह होती थी कि ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं का और हमारा
स्वामी ईश्वर है। किसी वस्तु का संबंध हमसे प्रत्यक्ष नहीं है बल्कि हमसे प्रत्येक
वस्तु का संबंध ईश्वर की आत्मिक ज्ञान (मारिफ़त) से है।
धीरे-धीरे उनकी यह विचारधारा स्थिर हो जाती थी और उनका ज़ेह्न
ऐसे रुझान उत्पन्न कर लेता था कि जब वे किसी वस्तु की ओर संबोधित होते थे तो उस
वस्तु की ओर ध्यान जाने से पहले ईश्वर की ओर ध्यान जाता था। उन्हें किसी वस्तु की
ओर ध्यान देने से पूर्व यह अनुभूति स्वभावतः होती थी कि यह वस्तु हमसे प्रत्यक्ष
कोई संबंध नहीं रखती। उस वस्तु का और हमारा संबंध केवल ईश्वर के कारण है।
जब
उनकी विचारधारा यह होती थी तो उनके ज़ेह्न की प्रत्येक गति में ईश्वर का अनुभव
होता था। ईश्वर ही अनुभूत के रूप में उनका संबोधित और केंद्र बनता था और नियम की निगाह
से ईश्वर के गुण ही उनका अनुभव बनते थे। धीरे-धीरे
ईश्वर के गुण उनके ज़ेह्न में एक स्थायी स्थान प्राप्त कर लेते थे या यूँ कहें कि
उनका ज़ेह्न ईश्वर के गुणों का प्रतिनिधि बन जाता था। यह स्थान प्राप्त होने के
पश्चात उनके ज़ेह्न की प्रत्येक गति ईश्वर के गुणों की गति होती थी। और ईश्वर के
गुणों की कोई गति शक्ति और शासन के गुण से रिक्त नहीं होती थी। परिणामस्वरूप उनके
ज़ेह्न को यह नहर-एप्राप्त हो जाती थी कि वे अपने संकल्प के अनुसार
अस्तित्वगत तत्व के किसी कण, किसी व्यक्ति और किसी सत्ता को गति में ला सकते थे।
बिस्मिल्लाह
शरीफ़ की आंतरिक व्याख्या इसी मौलिक पाठ पर आधारित है। औलिया-ए-किराम
में अहल-ए-निज़ामत को ईश्वर की ओर से यही ज़ेह्न प्रदान किया जाता है
और क़ुर्ब-ए-नवाफ़िल वाले औलिया-ए-किराम
अपनी साधना और मुजाहिदों के माध्यम से इसी ज़ेह्न को प्राप्त करने का प्रयास करते
हैं।