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इन्द्रिय

    

हमने ऊपर स्पष्ट किया है कि चेतना का एक कार्य अपरिवर्तनीय है। यह कार्य अपनी सीमा में एक ही रूप से देखता, सोचता, समझता और अनुभव करता है। इस कार्य में किसी ब्रह्माण्डीय कण या व्यक्ति के लिए कोई भेदभाव नहीं होता। यह चेतना प्रत्येक कण में एक ही निगाह रखती है। इसी "लामकानी चेतना" से दूसरी चेतना की उत्पत्ति होती है। हमने इसे किसी स्थान पर "सत्य--वारिदा" का नाम दिया है। इस चेतना की गति यद्यपि बहुत ठोस होती है तथापि इसकी यात्रा विचार से करोड़ों गुना अधिक तीव्र है। किन्तु जब यह चेतना उभरकर तृतीय चेतना की समतल पर प्रविष्ट होती है तो इसकी गति बहुत कम हो जाती है। यह गति फिर भी रोशनी की गति से लाखों गुना अधिक है। यह चेतना भी एक स्पष्ट समतल की ओर प्रयासरत होती है और उस स्पष्ट समतल में प्रवेश करने के पश्चात लोक-नासूत के तत्वों में रूपान्तरित हो जाती है। तत्वों का यह समूह व्यक्ति की चतुर्थ चेतना है जो पूर्णत: सतही कार्य रखती है। इसी कारण इसका ठहराव और ठोसपन अत्यन्त अल्प विराम पर आधारित है। यही चेतना इन्द्रियों की निगाह से सर्वाधिक अपूर्ण है। इस चेतना के इन्द्रिय यद्यपि ऐसे आवश्यकताओं का संग्रह हैं जो अधिक से अधिक सौंदर्य की ओर झुकाव रखते हैं किन्तु सौंदर्य के स्तरों से पूर्णतः परिचित नहीं। इसी कारण उनमें निरंतर और सतत अंतरालों पाये जाते हैं। साथ ही अंतरालों को भरने के लिए इन इन्द्रियों में ऐसी आवश्यकताएँ भी विद्यमान हैं जिन्हें "अंतरात्मा" कहा जाता है।

परम सत्ता ने इन्हीं अंतरालों को भरने के लिए नबियों के माध्यम से शरीअतें लागू की हैं। मानव-जाति की सृष्टि के दृष्टिकोण से सौंदर्य का अन्तिम बिन्दु केवल एक हो सकता है, उसी को "एकत्व परम सत्ता" (तौहीद--बारी-तआला) कहा गया है। नबियों पर यह अन्तिम सत्य वही के द्वारा उद्घाटित होता है। नबियों को न मानने वाले सम्प्रदाय तौहीद को सदैव अपने अनुमान में खोजते रहे। परिणामस्वरूप उनके अनुमान ने गलत मार्गदर्शन देकर उनके सम्मुख अतौहीदी विचारधाराएँ रख दीं और ये विचारधाराएँ कभी-कभी अन्य सम्प्रदायों की गलत विचारधाराओं से टकराती रही हैं। अनुमान से प्रस्तुत कोई विचार कुछ कदम तक दूसरे विचार का साथ देता है किन्तु फिर असफल हो जाता है। तौहीदी दृष्टिकोण के अतिरिक्त मानव-जाति को एक ही विचारधारा पर एकत्र करने का कोई और उपाय नहीं है। लोगों ने अपने अनुमान से जितने भी उपाय स्थापित किये, वे सभी किसी न किसी चरण में गलत सिद्ध होकर रह गये। तौहीद के अतिरिक्त अब तक जितने भी व्यवस्था--हिकमत बने, वे सभी या तो अपने अनुयायियों के साथ नष्ट हो गये या धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। वर्तमान युग में लगभग सभी प्राचीन व्यवस्था--फ़िक्र या तो समाप्त हो चुके हैं या परिवर्तन के साथ नये नामों का वस्त्र पहनकर विनाश के मार्ग पर तीव्र गति से अग्रसर हैं। यद्यपि उनके अनुयायी सहस्त्र प्रयत्न कर रहे हैं कि वे सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए रोशनी बन सकें, किन्तु उनके सभी प्रयत्न विफल होते जा रहे हैं।

आज की पीढ़ियाँ पूर्ववर्ती पीढ़ियों से कहीं अधिक निराश हैं और भावी पीढ़ियाँ और भी अधिक निराश होने पर विवश होंगी। फलस्वरूप मानव-जाति को किसी न किसी समय "एकत्व-बिन्दु" (नुक्ता--तौहीद) की ओर लौटना पड़ेगा, अन्यथा उस बिन्दु के अतिरिक्त मानव-जाति किसी एक केन्द्र पर कभी एकत्र न हो सकेगी। वर्तमान युग के चिन्तक को चाहिए कि वह वही की दृष्टि-विचार को समझे और मानव-जाति की गलत पथप्रदर्शन से हाथ खींच ले। स्पष्ट है कि विभिन्न राष्ट्रों और विभिन्न जातियों के शारीरिक कार्य-कलाप अलग-अलग हैं और यह सम्भव नहीं है कि सम्पूर्ण मानव-जाति का शारीरिक कार्य एक हो सके। अब केवल आध्यात्मिक कार्य शेष रह जाते हैं, जिनका स्रोत तौहीद और केवल तौहीद है। यदि संसार के चिन्तक प्रयत्न कर इन कार्यों की गलत व्याख्याओं को सही कर सकें तो वे विश्व की जातियों को आध्यात्मिक कार्य-कलाप के एक ही चक्र में एकत्र कर सकते हैं और वह आध्यात्मिक चक्र केवल क़ुरआन द्वारा प्रस्तुत तौहीद है। इस विषय में पूर्वग्रहों को किनारे रखना ही पड़ेगा। क्योंकि भविष्य के भयंकर संघर्षचाहे वे आर्थिक हों या वैचारिकमानव-जाति को विवश कर देंगे कि वह बड़ी से बड़ी कीमत चुकाकर अपनी अस्तित्व की खोज करे और अस्तित्व के साधन क़ुरआनी तौहीद के अतिरिक्त किसी व्यवस्था--हिकमत से प्राप्त नहीं हो सकते।

हमने यह उल्लेख "चेतना-चतुर्थ" के सन्दर्भ में आवश्यक समझकर किया है। वस्तुतः हमारा आशय यह है कि दर्शन के इन्द्रिय वही की पथप्रदर्शन के बिना सही कदम नहीं उठा सकते। यदि हम शेष तीन चेतनाओं को संक्षेप में समझ लें तो वही की केन्द्रीयता तक पहुँच सकते हैं। जब हम "ज्ञान--नुबुव्वत" के संक्षेप को जान लेंगे तो हमारी अपनी विचारणा ज्ञान--नुबुव्वत की तुलना में सभी अनुमानिक विद्याओं को अस्वीकार करने पर विवश हो जाएगी।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai