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जितना अधिक परिवेश शांत और सुखद होगा, उतनी ही गहरी तल्लीनता और एकाग्रता मुराक़बा में प्राप्त होगी। मुराक़बा ऐसे स्थान पर करना चाहिए जहाँ न अधिक उष्णता हो और न ही इतनी शीतलता कि ठंडक अनुभव होने लगे। आस-पास की वस्तुएँ जितनी न्यून होंगी, ज़ेह्न उतना ही शांत रहेगा। स्थान समुचित रूप से हवादार और दूषित वायु से मुक्त होना चाहिए। मुराक़बा करते समय अधिकतम अंधकार का प्रबंध करना उचित है। दीपक या विद्युत प्रकाश बुझा देना चाहिए, और यदि किसी खिड़की से प्रकाश आकर मुखमंडल पर पड़ रहा हो, तो उसे पट से आच्छादित कर देना चाहिए, किंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कक्ष में प्राणवायु (ऑक्सीजन) का अभाव न हो।
शय्या (बिस्तर) पर बैठकर मुराक़बा करने से ज़ेह्न
शिथिलता की ओर प्रवृत्त हो जाता है। अतः श्रेयस्कर यह होगा कि ध्या मुराक़बा न भूमि, आसन, तख्त अथवा किसी दृढ़ एवं संतुलित शय्या (चारपाई) पर किया जाए। मुराक़बा के समय वस्त्र ऐसे हों, जो शरीर को कष्ट न दें और पूर्णतः स्वच्छंदता बनाए रखें।
मुराक़बा के लिए चार उत्तम समय माने गए हैं:
1. प्रातः सूर्योदय से पूर्व।
2. मध्यान्ह में, जवाल (सूर्य के मध्य गमन) के पश्चात।
3. सायंकाल (अस्र) के पश्चात।
4. अर्धरात्रि के उपरांत।
इन समयों में प्रकृति पर गहन निःशब्दता छा जाती है और मनुष्य की इंद्रियों में भी स्थिरता उत्पन्न हो जाती है। अतः इन समयों में मुराक़बा करने के लाभ अधिक होते हैं। यद्यपि सभी समयों की अपनी विशेषताएँ होती हैं, फिर भी सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय के बीच का समय अधिक श्रेष्ठ माना गया है। उसके बाद संध्या का समय, जो सूर्यास्त के निकट होता है, विशेष रूप से उपयुक्त है। इसका कारण यह है कि रात्रिकाल में वे सूक्ष्म इंद्रियाँ सक्रिय हो जाती हैं जिनसे अलौकिक जगत का अनुभव होता है।
पृथ्वी दो प्रकार से गतिमान
है। एक घूर्णन मंडल है और दूसरी दीर्घ प्रवाह। दोपहर के बाद पृथ्वी की गति में धीरे-धीरे कमी आने लगती है और यह कमी क्रमशः बढ़ती जाती है। संध्या तक यह गति इतनी मंद हो जाती है कि इंद्रियों पर एक प्रकार का दबाव अनुभव होने लगता है। मनुष्य, पशु-पक्षी, सभी पर दिन के बजाय रात्रि की इंद्रियों का प्रभाव आरंभ हो जाता है। प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति अनुभव करता है कि संध्या के समय एक विशेष प्रकार की स्थिति उस पर छा जाती है, जिसे वह थकान या मानसिक शिथिलता का नाम देता है। यह स्थिति चेतन ज़ेह्न पर अवचेतन प्रवृत्तियों के प्रवेश की शुरुआत होती है।
मध्यरात्रि के बाद अवचेतन इंद्रियों का प्रभाव और भी प्रबल हो जाता है, और इस कारण यह समय मुराक़बा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
अवचेतन इंद्रियाँ प्रातः सूर्योदय से पूर्व तक प्रबल रहती हैं। अतः सूर्योदय से पहले मुराक़बा करना अधिक लाभकारी होता है। इस समय मुराक़बा करने का प्रमुख लाभ यह है कि रात्रि की नींद दिनभर की थकान और मानसिक क्लांति को दूर कर देती है, जिससे मुराक़बा के समय ज़ेह्न
एकाग्र बना रहता है। जागने के बाद भी कुछ समय तक अवचेतन प्रवृत्तियाँ प्रभावी रहती हैं, अतः ध्यान के प्रभाव ज़ेह्न
में गहराई तक उतर जाते हैं।
अधिकांश व्यक्तियों के लिए कार्य-विभाजन और आर्थिक व्यस्तताओं के कारण अर्धरात्रि के पश्चात मुराक़बा करना व्यावहारिक नहीं होता, क्योंकि दिनभर की थकान के चलते नींद हावी हो जाती है और मुराक़बा में व्यवधान उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्तियों के लिए सूर्योदय से पूर्व का समय सबसे उपयुक्त है। ध्या मुराक़बा न कितनी अवधि तक किया जाए, यह पूर्णतः व्यक्ति की मानसिक अवस्था और एकाग्रता पर निर्भर करता है। मुराक़बा का कालखंड दस-पंद्रह मिनट से लेकर कई घंटों तक हो सकता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि ध्यान के समय व्यक्ति को समय के बीतने का भान नहीं होता, और नेत्र खोलने पर ज्ञात होता है कि निर्धारित अवधि से अधिक समय बीत गया है। कभी-कभी मुराक़बा की अवधि पूर्ण होने से पूर्व ही नेत्र खुल जाते हैं और ज़ेह्न में मुराक़बा की प्रवृत्ति शेष नहीं रहती। किंतु सामान्यतः ध्यान की औसत अवधि बीस से पैंतालीस मिनट तक मानी जाती है।
मुराक़बा के लिए जो भी समय निर्धारित किया गया हो, उसका पूर्ण रूप से उपयोग किया जाए। अत्यंत शांति और संतोष के साथ मुराक़बा आरंभ कीजिए। स्वयं को मानसिक एकाग्रता के लिए पूर्णतः तैयार कीजिए। जिस प्रकार हम किसी पुस्तक के अध्ययन से अधिकतम लाभ उठाने के लिए पूर्ण एकाग्रता और मुराक़बा के साथ पढ़ते हैं तथा अध्ययन के लिए वातावरण को शांत और अनुकूल बनाते हैं, उसी प्रकार मुराक़बा के लिए भी मनोयोग, तन्मयता और मानसिक शांति का होना आवश्यक है।
मुराक़बा की बैठक में बैठने के बाद, सबसे पहले ज़ेह्न को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ दीजिए और स्वयं को अधिक से अधिक शांत अवस्था में ले आइए। इसके लिए शब्दों द्वारा प्रेरणा दी जा सकती है, जैसे—
"चारों ओर शांति और स्थिरता है, मेरे भीतर भी एकाग्रता और स्थिरता प्रविष्ट हो रही है।"
ऐसे वाक्य मन-ही-मन, धीरे-धीरे दोहराए जाएँ ताकि उनका प्रभाव चित्त की गहराई में उतर सके। जब शरीर, ज़ेह्न और श्वास में सामंजस्य स्थापित हो जाए, तब मुराक़बा प्रारंभ करें।
मुराक़बा का उद्देश्य अंतर्चक्षु की दृष्टि को सक्रिय करना है। यह उद्देश्य तभी सफल हो सकता है जब नेत्रगोलक की गति अधिक से अधिक स्थिर हो जाए अथवा उसे कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया जाए। नेत्रगोलक की स्थिरता जितनी अधिक होगी, अंतर्दृष्टि की सक्रियता उतनी ही अधिक बढ़ेगी। इस नियम को ध्यान में रखते हुए मुराक़बा करते समय आँखों पर मुलायम तौलिये या रेशेदार कपड़े की पट्टी बाँधी जाती है। यदि कपड़ा काले रंग का हो तो उत्तम है। यह कपड़ा तौलिए जैसा रेशेदार अथवा मुलायम होना चाहिए। पट्टी बाँधते समय यह ध्यान रखा जाए कि पलकें कपड़े की पकड़ में आ जाएँ— यह पकड़ न तो ढीली हो और न इतनी कसी हुई कि आँखों में पीड़ा उत्पन्न हो। उद्देश्य यह है कि पलकों पर हल्का सा दबाव बना रहे। इस प्रकार के उचित दबाव से नेत्रगोलक की गति काफी हद तक रुक जाती है। जब इस स्थिर अवस्था में दृष्टि के उपयोग का प्रयास किया जाता है, तो आँख की वे आंतरिक शक्तियाँ, जिन्हें आध्यात्मिक दृष्टि की क्षमता कहा जा सकता है, सक्रिय हो जाती हैं।
बाह्य ध्वनियों से श्रवणेंद्रिय को बचाने और आंतरिक ध्वनियों की ओर ध्यान केंद्रित करने हेतु हल्की-सी नम रुई में काली मिर्च का चूर्ण लपेट कर फाहा बनाया जाता है और मुराक़बा के समय उसे कानों में रखा जाता है। काली मिर्च की यह विशेषता होती है कि वह बाह्य ध्वनि-तरंगों को अवशोषित कर लेती है और आंतरिक ध्वनियों को श्रवण की सतह पर लाती है।
कानों में रुई के फाहे रखने और आँखों पर पट्टी बाँधने का अतिरिक्त लाभ यह होता है कि मुराक़बा के समय बाह्य वातावरण के प्रभाव न्यूनतम हो जाते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि हर बार मुराक़बा करते समय इन उपायों का प्रयोग किया जाए— इनके बिना भी मुराक़बा संभव है।
इन समस्त बातों को ध्यान में रखते हुए एक शांत और सुविधाजनक स्थिति में बैठ जाइए। नेत्र बंद कर लीजिए और कुछ क्षणों के लिए चित्त को स्वतंत्र छोड़ दीजिए। तत्पश्चात समस्त दिशाओं से मुराक़बा हटाकर अंतर्मन की ओर मुड़ जाइए और ध्यान आरंभ कीजिए।
ख्वाजा शम्सुद्दीन अजीमी
ग़ार-ए-हिरा के नाम
जहाँ अंतिम युग के संदेशता (ﷺ) ने (रेहाना)किया
और हज़रत जिब्राईल, क़ुरआन की प्रारंभिक
आयतों को लेकर पृथ्वी पर अवतरित हुए।