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मुराक़बा करने से मनुष्य के
भीतर ऐसी ऊर्जाएँ और प्रकाश तरंगें संचित होने लगती हैं, जो गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव
को निष्प्रभावी कर देती हैं। इन प्रकाश तरंगों के प्रभाव से साधक उन अनुभूतियों से
गुज़रता है, जिनमें भौतिक भार का कोई अनुभव नहीं होता। उदाहरण के लिए, मुराक़बा के दौरान, चलते-फिरते, बैठते या लेटते समय भारहीनता
का अनुभव होता है। कभी-कभी व्यक्ति स्वयं को प्रकाश से निर्मित अनुभव करता है। मुराक़बा की अवस्था
में शरीर भारहीन हो जाता है और एक प्रकार की शून्यता में लहराने लगता है। साधक
स्वयं को अंतरिक्ष में उड़ते हुए देख सकता है। खुली या बंद आँखों से विभिन्न रंगों
की प्रकाश किरणें दृष्टिगोचर होती हैं। मस्तिष्क में बिजली की चमक जैसी अनुभूति
होती है। शरीर में सिहरन उत्पन्न होती है और विद्युत प्रवाह जैसी अनुभूति होती है। प्रकाश की तीव्रता और अत्यधिक
संकेन्द्रण से कभी-कभी शरीर झटकों का अनुभव करता है। ज़ेह्न में शांति और संतोष की अनुभूति गहरी
हो जाती है। चिंतन और समस्या-समाधान की क्षमता बढ़ जाती है। ये सभी अनुभूतियाँ तथा इसी
प्रकार की अन्य आध्यात्मिक स्थितियाँ चेतना के प्रकाशमय तंत्र को विकसित करने और
आध्यात्मिक ऊर्जा को प्रबल करने की ओर संकेत करती हैं।
जब मैं मुराक़बा हेतु नेत्र
बंद करता हूँ, तो नेत्रों के कोरों में दूधिया प्रकाश की आभा बिखर जाती है। इस विशिष्ट
अवस्था में विचार आते हैं और बिना कोई प्रभाव छोड़े विलीन हो जाते हैं। कभी चेतना
एक गहन निद्रा-सदृश स्थिति में प्रविष्ट हो जाती है, तो कभी समस्त अस्तित्व केवल "अल्लाह" के ध्यान में समाहित हो जाता है। ध्यान के मुराक़बा विभिन्न
रंगों की ज्योतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं—नील, रक्तवर्ण, हरित एवं अन्य वर्ण-छटाएँ। यदि विचारों की प्रबलता अधिक हो जाए, तो मैं अंतर्मन में "या हय्यु, या क़य्यूम" का जप करता हूँ, जिससे मानसिक तरंगें स्थिर हो
जाती हैं। ध्यानोपरांत अनेक विलक्षण अवस्थाएँ जन्म लेती हैं। कभी शरीर अत्यंत गुरुत्वशील
प्रतीत होता है, तो कभी नितांत हल्का, मानो भारहीन हो गया हो। कभी यह अनुभूति होती है कि शरीर का
भौतिक अस्तित्व विलुप्त हो चुका है। कभी प्रतीत होता है कि मेरा शरीर आकाश की ओर
आरोहित हो रहा है। मस्तिष्क में सूक्ष्म स्पंदन एवं कंपन का अनुभव होता है, और चेतना विभिन्न अलौकिक
अनुभूतियों का स्पर्श करती है। मुराक़बा के मध्य मस्तिष्क पर एक दिव्य सम्मोहन छा
जाता है, जिससे चित्त पूर्णतः तल्लीन हो जाता है और एक विश्रांति-युक्त निद्रा का आगमन होता
है। कभी-कभी मुराक़बा की गहनता में स्वप्न-सदृश दृश्य प्रकट होते हैं। एक बार ऐसा अनुभव हुआ कि मैं
स्वयं को आकाश में उड़ते हुए देख रहा था, समस्त भौतिक सीमाएँ विलुप्त हो चुकी थीं, और बाह्य जगत से पूर्णतः
विमुक्ति प्राप्त हो गई थी। मुराक़बा की इस अवस्था में मेरी तन्मयता इतनी तीव्र हो
जाती है कि श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया भी व्यर्थ प्रतीत होती है। इस अवस्था में कभी-कभी गुरु का दिव्य स्वरूप भी
चेतना में उदित होता है। कई बार मुराक़बा की स्थिति में ही मैं सुप्तावस्था में चला जाता हूँ, और विभिन्न स्थानों की परा-जागतिक यात्रा करता हूँ। ये
दृश्य इतने अनुपम, इतने सूक्ष्म एवं दिव्य होते हैं कि उन्हें शब्दों में अभिव्यक्त करना अत्यंत
कठिन प्रतीत होता है। अतः, मुराक़बा की इस अलौकिक यात्रा में विविध आध्यात्मिक एवं रहस्यात्मक अनुभूतियाँ
निरंतर प्रकट होती रहती हैं, जो चेतना को एक नवीन आयाम प्रदान करती हैं।
(हारून हामिद, लाहौर)
मोराकबा के प्रारंभ में हल्की पीली-हरी आभा का एक बिंदु प्रकट
हुआ। फिर ऐसा अनुभव हुआ जैसे खाट और मैं स्वयं हिल रहे हों। कुछ क्षणों के लिए
दायीं आँख की ओर प्रकाश का एक गोल, नेत्र जैसा आकार दृष्टिगोचर हुआ। मुराक़बा आरंभ होते ही सिर
भारी लगने लगा और कंधों में हल्की जड़ता अनुभव हुई। शरीर में ऊपर की ओर खिंचाव सा
महसूस हुआ, वहीं नेत्रों के सम्मुख अंधकारमय छायाएँ दिखाई दीं। एक पल के लिए हल्का लाल
रंग भी झलका। रीढ़ में एक स्पंदन अनुभूत हुआ, जो सिर के पश्च भाग तक
पहुँचा। समूचे शरीर में एक सुखद परिवर्तन का आभास हुआ, मानो किसी आकर्षण में सहज ही
खिंचता जा रहा हूँ। (मिस्बाहुद्दीन)
मुराक़बा लगभग 15 मिनट तक चला, और कल्पना तुरंत साकार हो गई।
ऐसा अनुभव हुआ जैसे पूरे शरीर पर वर्षा की बूंदें गिर रही हों। विशेष रूप से सिर
पर ऐसा लगा मानो तेज़ बारिश के कारण गड्ढे बन रहे हों। मैं इस अनुभूति में इतनी
तल्लीन हो गई कि शरीर स्थिर और शून्य सा प्रतीत होने लगा। देखा कि उत्तर दिशा में
एक विशाल द्वार खुला है, जिससे उज्ज्वल श्वेत प्रकाश प्रवाहित हो रहा है और मेरे
शरीर पर पड़ रहा है। फिर आकाश से प्रकाश की वर्षा होने लगी, जो मेरे शरीर के दाहिने भाग
पर स्पर्श कर रही थी। अचानक इस प्रकाश वर्षा की तीव्रता बढ़ गई, और इतनी तीव्र रोशनी मुझ पर
गिरी कि शरीर में एक झटका सा अनुभव हुआ।
फज्र की नमाज़ के उपरांत
ध्यान किया। अनुभव हुआ कि मैं स्वयं प्रकाश का एक विग्रह हूँ, और मेरे चारों ओर स्वतः ही
प्रकाश के प्रभामंडल निर्मित होने लगे, जिससे तेजस्वी आभा विकीर्ण होने लगी। ऐसा प्रतीत हुआ कि
मेरे दो अस्तित्व हैं—एक मैं स्वयं, जो समस्त घटनाओं का साक्षी हूँ, और दूसरा मेरा एक तेजोमय स्वरूप। इसके अतिरिक्त, मैंने अपने अंतःकरण में कुछ
विशेष परिवर्तन अनुभव किए। प्रथम यह कि यदि कोई व्यक्ति मुझसे संवाद स्थापित करना
चाहता है, तो उसका आभास मुझे पूर्व में ही हो जाता है, साथ ही यह भी स्पष्ट हो जाता
है कि वह क्या अभिव्यक्त करने वाला है। द्वितीय यह कि यदि मैं संकल्प करूँ कि किसी
विशिष्ट व्यक्ति से भेंट हो अथवा वह मुझसे मिले, तो वह बिना किसी प्रयास के
स्वाभाविक रूप से मार्ग में अथवा किसी कार्यवश मिल जाता है। तृतीय यह कि यदि कोई
महत्त्वपूर्ण घटना घटित होने वाली हो, तो मुझे पूर्वाभास स्वरूप एक विशिष्ट प्रकार की व्याकुलता
अनुभव होने लगती है। (मोहम्मद असलम गोहर, मंगला डैम)
मुराक़बा की निरंतर साधना से
तंद्रा की स्थिति धीरे-धीरे कम होने लगती है। तंद्रा छाने का कारण यह है कि मुराक़बा के दौरान प्रकट
होने वाले प्रकाश को चेतना सहन नहीं कर पाती और उस पर अचेतनता हावी हो जाती है। जब
चेतना निद्राजनित अवस्थाओं से प्रभावित नहीं होती और ज़ेह्न एकाग्र बना रहता है, तब आंतरिक सूचनाएँ स्वतः
प्राप्त होने लगती हैं।
एक आध्यात्मिक विद्यार्थी
आध्यात्मिक अनुभूतियों और अवस्थाओं को बोध की स्तर पर अनुभव करता है। बोध ऐसा
विचार है जो सूक्ष्म होते हुए भी रूप-रेखाएँ रखता है। ज़ेह्न की उड़ान इन रूप-रेखाओं को स्पर्श कर लेती है।
उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति सेब का नाम लेता है, तो ज़ेह्न में सेब की छवि अवश्य उभरती है। यह छवि इतनी
सूक्ष्म होती है कि आँखें उसे नहीं देख पातीं, लेकिन संवेदनाएँ उसे ग्रहण कर
लेती हैं। कभी-कभी गुप्त सूचनाएँ ध्वनि के रूप में प्राप्त होती हैं। यह ध्वनि अत्यधिक तीव्र
नहीं होती, फिर भी किसी हद तक सूचना या दृश्य की व्याख्या कर देती है।
मुराक़बा करते ही चित्त
एकाग्रता की दशा में प्रविष्ट हो गया। श्रवणेंद्रियों में विचार-तरंगों का संवाहन प्रत्यक्ष
अनुभव हुआ। जैसे ही कोई कल्पना मनःपटल पर उभरती, उसकी ध्वनि भी स्पष्ट रूप से
श्रवणगोचर होती। (मोहम्मद सलीम)
मुराक़बा की अवस्था में ऐसा
कोलाहल सुनाई देता है, मानो समुद्र की प्रचंड तरंगें तट से टकराकर गर्जना कर रही
हों। कुछ दिनों के पश्चात, मुराक़बा के समय किसी के वार्तालाप करने की ध्वनि स्पष्ट
सुनाई देने लगी। किंतु ये शब्द वैसे श्रवणगम्य नहीं थे, जैसे भौतिक कानों से
सामान्यतः सुने जाते हैं, बल्कि ये स्वरों की अनुभूति मस्तिष्क के अंतरस्थल में हुई। एक दिन मुराक़बा में किसी ने
मुझे पुकारा। तुरंत में ने नेत्र खोल दिए, परंतु वहां कोई उपस्थित न था। तब यह अनुभूति हुई कि वह
ध्वनि बाह्य जगत से नहीं, अपितु मेरे आंतरिक अस्तित्व (Inner Self) में प्रतिध्वनित हुई थी।
आज मुराक़बा में इतनी गहराई
तक निमग्न था कि सहसा ऐसा प्रतीत हुआ मानो किसी ने मेरे दक्षिण स्कंध (दाहिने कंधे) पर कर-स्पर्श किया हो। मैं चकित
होकर तत्क्षण नेत्र खोलकर चारों ओर दृष्टिपात किया, किन्तु वहाँ कोई भी उपस्थित न
था। पुनः मुराक़बा में प्रविष्ट हो गया। इसके पश्चात, जब भी शरीर का स्मरण होता, प्रतीत होता कि मेरा शरीर
मृदु कंपन के साथ स्पंदित हो रहा है। एक अन्य विलक्षण परिवर्तन यह अनुभव हुआ कि जब भी मैं जल का
पान करता हूँ, उसका स्वाद तनिक मधुर प्रतीत होता है। ऐसा आभास होता है कि मेरी रसना (स्वादेंद्रिय) में कोई सूक्ष्म परिवर्तन
घटित हो रहा है। इसके अतिरिक्त, यदा-कदा श्रवणेंद्रिय में अदृश्य शृंग (सीटी) की ध्वनि प्रतिध्वनित होती है।
मुराक़बा के पश्चात फज्र की
नमाज़ स्थापित की। नमाज़ में अत्यधिक एकाग्रता बनी रही। एक क्षण ऐसा आया कि यह
विचार प्रबल हो गया कि अल्लाह मियां सामने विद्यमान हैं। इस एहसास से मेरे
रोमांचित हो उठे। काफी समय तक यह भावना प्रबल रही। मुराक़बा की अवस्था में ऐसा
प्रतीत हुआ मानो "या हय्यू या क़य्यूम" के शब्द आत्मा की सूक्ष्म अनुभूति (लतीफ़-ए-नफ़्सी) से प्रकट हो रहे हों।
मुराक़बा में पूरी तरह एकाग्र
हो गया। फिर ऐसा अनुभव हुआ कि मैं खाली आकाश में ऊपर उठता जा रहा हूं और अत्यधिक
ऊंचाई पर पहुंच गया हूं। उस समय मेरे ज़ेह्न में "अल्लाहु अकबर" की ज़ोरदार गूंज थी, इतनी ऊंची और तीव्र कि उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस
आवाज़ से मेरे अंदर एक भय व्याप्त हो गया, डर और आतंक की मिली-जुली स्थिति में मुझे यरूशलम (बैतुल मुक़द्दस) दिखाई दिया, जहां लोग पूजा कर रहे थे। मैं
यरूशलम के गुंबद को देखने लगा। इसी दौरान किसी अदृश्य प्राणी ने मेरे कानों में
फुसफुसाया। मैं इस फुसफुसाहट से बेहोश हो गया। फुसफुसाहट में कहा गया, "यह कमाल नहीं है कि गुंबद पर
ध्यान दिया जाए। असली सच्चाई यह है कि पैगंबरों की पवित्र शख्सियत पर विचार किया
जाए कि उनके पास ईश्वर के दिए हुए ज्ञान के कौन-कौन से खज़ाने हैं। मानवता का
हर व्यक्ति इन खज़ानों से लाभ उठा सकता है।"
इस आवाज़ के साथ ही मैं बुरी
तरह बेचैन हो गया। दिल की धड़कन तेज हो गई और मैं मुराक़बा की अवस्था से बाहर आ
गया। उस समय मेरा शरीर पसीने से तरबतर था। (कमाल)
अनुभूति जब गहरा होकर दृष्टि
का रूप ले लेती है, तो आंतरिक सूचनाएँ चित्रात्मक रूप में दृष्टि के सामने प्रकट होने लगती हैं।
इस स्थिति को वुरूद कहा जाता है। वुरूद तब शुरू होता है जब मानसिक एकाग्रता के साथ-साथ तंद्रा (ऊंघ) की प्रबलता न्यूनतम हो जाती
है। मानसिक केंद्रितता स्थापित होते ही आंतरिक दृष्टि सक्रिय हो जाती है और अचानक
कोई दृश्य नेत्रों के सामने आ जाता है। चूँकि चेतना इस प्रकार देखने की आदी नहीं होती, इसलिए समय-समय पर मानसिक केंद्रितता
स्थापित होती है और फिर टूट जाती है। देखे गए दृश्यों में से कुछ याद रह जाते हैं, जबकि शेष विस्मरण के गर्त में
चले जाते हैं। धीरे-धीरे व्यक्ति वुरूद की स्थिति का आदी हो जाता है और मुराक़बा में अनुभूतियों
एवं अवलोकनों (मशाहिदा) की श्रृंखला निरंतर बनी रहती है। कभी-कभी ये अवलोकन इतने गहन हो जाते हैं कि व्यक्ति स्वयं को उन
अनुभूतियों का अभिन्न अंग समझने लगता है। धीरे-धीरे इन अनुभूतियों में एक क्रमबद्धता
आ जाती है और उनके निहित अर्थ एवं संकेत मानसिक स्तर पर प्रकट होने लगते हैं।
पिछले सप्ताह की तुलना में इस
सप्ताह मुराक़बा की अवस्थाएँ अधिक अनुकूल रहीं। कल्पना अधिक गहन हो गई और एकाग्रता
स्थिर रही। एक विशेष बात यह है कि उपासना में भी एकाग्रता उत्पन्न हो गई है। जब
आँखें एक स्थान पर केंद्रित होती हैं, तो दृष्टि स्थिर हो जाती है, कल्पना और अधिक गहरी हो जाती
है और आंतरिक दृष्टि सक्रिय हो जाती है। उपासना करते समय पवित्र स्थान सामने आ
जाते हैं। हीन भावना से मुक्ति प्राप्त हो गई है, आत्मविश्वास और विश्वास उत्पन्न
हो गया है। आज पूरा दिन ज़ेह्न पूरी तरह एकाग्र रहा, जिस ओर ध्यान जाता है, वह वस्तु या दृश्य आँखों के
सामने आ जाता है। ज़ेह्न ने अंतरिक्ष की सीमाओं को पार कर दिया है कि पूरी पृथ्वी
और हर देश, हर नगर कुछ ही कदमों की दूरी पर प्रतीत होते हैं। कराची, लाहौर आदि सभी आँखों के सामने
दिखाई देते हैं। ज़ेह्न में एक अद्भुत व्यापकता और तीव्रता उत्पन्न हो गई है। (एहसान उल्लाह, स्वात)
मुराक़बा के दौरान विभिन्न
प्रकार की आकृतियाँ और दृश्य प्रकट होते हैं, साथ ही शरीर में गर्मी का
अनुभव बढ़ जाता है। यह स्थिति धीरे-धीरे इतनी तीव्र हो जाती है कि सहन करना कठिन हो जाता है, जिससे मुराक़बा की अवधि को कम
करना पड़ता है। मोराकाबा के दौरान देखा कि मेरे शरीर से कुछ दूरी पर एक तेजस्वी प्रकाश से
निर्मित शरीर है। जैसे-जैसे ध्यान की गहराई बढ़ती गई, प्रकाशमय शरीर की दीप्ति भी बढ़ती गई। हृदय भी प्रकाश से
प्रदीप्त होता हुआ प्रतीत हुआ। मैं अनुभव करता रहा कि मेरे ललाट पर कोई दिव्य
नेत्र स्थित है। मुराक़बा के दौरान ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मेरे ललाट का नेत्र
प्रकाशित हो उठा है और मैं उसी नेत्र से देख रहा हूँ। जिस दिशा में भी दृष्टि डालता
हूँ, प्रत्येक वस्तु विविध रंगों के समूह में परिवर्तित हो जाती है। (वकार अहमद)
मुराक़बा के दौरान मानसिक
एकाग्रता बढ़ने से भौतिक शरीर का अनुभव समाप्त हो गया और सूक्ष्म शरीर स्पष्ट होने
लगा। ऐसा महसूस हुआ कि शरीर के अंदर सम्पूर्ण ब्रह्मांड विद्यमान है। और कमर की
जड़ से विद्युत प्रवाह निरंतर निकलकर शरीर में प्रवाहित हो रहा है। अचानक एक झटका
लगा और सूक्ष्म शरीर भौतिक शरीर से अलग हो गया। देखा कि सामने एक विशाल शून्य है
और सूक्ष्म शरीर दिव्य तरंगों के सहारे हवा में तैर रहा है। सूक्ष्म शरीर से एक
लहर किरण के रूप में निकल रही है, जिसकी रोशनी से उस शून्य में हर चीज़ स्पष्ट दिखाई दे रही
है। (मोहम्मद असलम)
कुछ लोगों की आंतरिक श्रवण
शक्ति, आंतरिक दृष्टि से पहले कार्य करने लगती है। श्रवण शक्ति के सक्रिय हो जाने से
व्यक्ति को पराभौतिक आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं। पहले-पहल विचार आवाज़ के रूप में
आते हैं। फिर वातावरण में रिकॉर्ड की गई विभिन्न आवाज़ें सुनाई देती हैं। अंततः
व्यक्ति के चेतना में इतनी शक्ति आ जाती है कि जिधर उसका ध्यान जाता है, उस दिशा के गुप्त मामले और
भविष्य की स्थितियाँ आवाज़ के माध्यम से श्रवण में प्रवेश कर जाते हैं। जब बार-बार यह प्रक्रिया होती है, तो आवाज़ के साथ-साथ दृष्टि भी कार्य करने
लगती है और चित्रात्मक रूपरेखाएँ दृष्टि के सामने आ जाती हैं। इस स्थिति को "कश्फ" (प्रत्यक्ष ज्ञान) कहते हैं।
प्रारंभिक चरण में कश्फ (प्रत्यक्ष ज्ञान) इच्छा के साथ नहीं होता।
अचानक विचार के माध्यम से आवाज़ के जरिए या चित्रात्मक दृश्य की जानकारी के रूप
में कोई बात ज़ेह्न में आ जाती है और फिर उसकी पुष्टि हो जाती है।
उदाहरण:
आप घर में बैठे हुए हैं।
अचानक ज़ेह्न में किसी मित्र का विचार आने लगता है और कुछ देर बाद वह मित्र आ जाता
है। दूसरी स्थिति यह है कि आवाज़ के माध्यम से यह सूचना ज़ेह्न में प्रवेश करती
है। तीसरी स्थिति यह है कि मित्र के आगमन का दृश्य आँखों के सामने आ जाता है। जब कश्फ़ (प्रत्यक्ष ज्ञान) की शक्ति विकास के चरणों को
पार करके "शहूद" (साक्षात्कार) की मंज़िल तक पहुँचती है, तो वह इच्छा के साथ सक्रिय हो
जाती है। इस अवस्था में मनुष्य किसी भी घटना या विषय को अपनी इच्छा और इरादे के
अनुसार जानने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
कश्फ़ की अवस्था में एक ऐसा
चरण आता है जब बाहरी और आंतरिक इंद्रियाँ एक साथ सक्रिय रहती हैं। साधक के ज़ेह्न
में इतनी शक्ति उत्पन्न हो जाती है कि वह एक साथ भौतिक और आध्यात्मिक दुनिया को
देख सकता है। इस अवस्था के आने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि साधक मुराक़बा किसी स्थान पर बैठकर आँखें बंद करे। हालाँकि, यह अवस्था स्वैच्छिक नहीं
होती। चलते-फिरते, उठते-बैठते, अचानक यह अवस्था आ जाती है और स्वयं ही समाप्त हो जाती है। यह स्थिति दिन में
कई बार भी आ सकती है और कई बार हफ्तों में एक बार भी नहीं आती। इस अवस्था का नाम "इलहाम" (प्रेरणा) है।
ये उन ग़ैब की ख़बरों में से
है, जिन्हें हम तुम्हारी ओर वह़्यी करते हैं। तुम उनके पास नहीं थे, जब वे अपने क़लमों से (कुरआ) के लिए क़ुरआ डाल रहे थे कि
उनमें से कौन मरयम का संरक्षक बनेगा और न ही तुम उनके पास थे, जब वे आपस में झगड़ रहे थे। (सूरा आल-इमरान नंबर 44)
उपर्युक्त आयत के अनुसार, वही (प्रकाशना) की परिभाषा यह है कि वही
अल्लाह की ओर से होती है। वही वह प्रकाश है जिसमें ग़ैब (अदृश्य) की ख़बरें होती हैं। ये
ख़बरें बीते हुए घटनाओं की भी हो सकती हैं और आने वाले घटनाओं के ख़ाके भी हो सकते
हैं। इस प्रकार, अल्लाह तआला ने पैगंबरों को बीते हुए घटनाओं और आने वाली स्थितियों दोनों से
अवगत कराया है। इसके अलावा, वही में किसी बंदे का चेतना या इच्छा काम नहीं करती। बल्कि, वही में केवल अल्लाह तआला का
विचार काम करता है।
सुरा आराफ आयत नंबर 203 में है।
और जब तुम उनके पास कोई
निशानी (चमत्कार) नहीं लाते, तो वे कहते हैं, 'तुमने इसे क्यों नहीं बना लिया?' कह दो, 'मैं तो केवल उसी का अनुसरण
करता हूँ, जो मेरे रब की ओर से मेरी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की जाती है। यह (क़ुरआन) तुम्हारे रब की ओर से स्पष्ट प्रमाण है, मार्गदर्शन है और ईमान लाने
वालों के लिए दयालुता है।
वही की और अधिक व्याख्या इस
आयत में की गई है:
सूरा अश-शूरा नंबर 51-52
"और किसी इंसान के लिए यह संभव
नहीं कि अल्लाह उससे सीधे बात करे, मगर (तीन तरीकों से) — या तो वह (प्रकाशना) द्वारा बात करे, या परदे के पीछे से, या फिर कोई रसूल (फ़रिश्ता) भेजे, जो उसके आदेश से जो कुछ वह चाहता है, वह्यी (प्रकाशना) करे। निस्संदेह, वह सर्वोच्च, अत्यंत बुद्धिमान है। और इसी प्रकार हमने तुम्हारी
ओर अपने आदेश से एक रुह (वह्यी) भेजी। तुम नहीं जानते थे कि किताब क्या होती है और न ही ईमान (का पूरा ज्ञान था), लेकिन हमने इसे एक नूर (प्रकाश) बना दिया, जिससे हम अपने बंदों में से
जिसे चाहते हैं, मार्गदर्शन देते हैं। और निश्चय ही तुम सीधे मार्ग की ओर मार्गदर्शन कर रहे
हो।"
इस आयत में वहि (प्रकाशना) के सभी रूपों का उल्लेख किया
गया है। वहि को अल्लाह तआला ने अपना कलाम (वचन) कहा है। अल्लाह का यह दिव्य वचन अपनी सृष्टि पर विभिन्न
माध्यमों से अवतरित होता है—कभी वहि के रूप में और कभी परोक्ष (गुप्त) रूप में। जैसे, हज़रत मूसा (अ.) पर तजल्ली (दिव्य प्रकाश) का अवतरण हुआ। कोह-ए-तूर (तूर पर्वत) पर अल्लाह तआला ने अपनी तजल्ली प्रकट की, और हज़रत मूसा (अ.) ने प्रभु से संवाद किया। यह वहि की वह विधि थी जिसे परोक्ष (हिजाब/आवरण) के माध्यम से कहा गया है।
स्वयं सर्वशक्तिमान और हज़रत मूसा (अ.) के बीच यह तजल्ली ही आवरण (हिजाब) बन गई, जिससे वे परमेश्वर को
प्रत्यक्ष न देख सके, बल्कि केवल उस आवरण को ही देखा और उसी के माध्यम से दिव्य वाणी सुनी। वहि का एक और माध्यम पैगंबरों
(रसूलों) के द्वारा भी रहा है, जिसमें हज़रत जिब्राईल (अ.) के द्वारा दिव्य संदेश उन तक पहुँचाया गया। किन्तु, पैगंबरों के युग के पश्चात यह
विधिवत वहि समाप्त हो चुकी है। तथापि, वहि के कुछ गौण रूप आज भी अस्तित्व में हैं, जैसे—कश्फ़ (दिव्य दृष्टि), इल्हाम (अंतःप्रेरणा) और इल्का (दिव्य प्रेरणा)। इस तथ्य की ओर आयत में
संकेत किया गया है कि किसी भी “बशर” (साधारण मनुष्य) की यह क्षमता नहीं कि वह प्रत्यक्ष वहि प्राप्त करे। यहाँ “बशर” शब्द प्रयुक्त हुआ है, न कि “रसूल” अथवा “नबी”। इसका तात्पर्य यह है कि एक
सामान्य व्यक्ति भी वहि के इन गौण रूपों द्वारा ईश्वरीय वाणी को ग्रहण कर सकता है।
इन्हीं गौण रूपों में दिव्य स्वप्न (सच्चे सपने) भी सम्मिलित हैं।
सूरह नहल में अल्लाह तआला ने
मधुमक्खी पर वहि किए जाने का उल्लेख किया है। यह भी वहि के गौण रूपों में से एक है, जो पैगंबरों पर अवतरित वहि से
भिन्न है। वहि के वह विशिष्ट स्वरूप, जिसके द्वारा पैगंबरों पर ईश्वरीय संदेश अवतरित होता था, अब पूर्णतः समाप्त हो चुका
है। किन्तु, पैगंबरों के बाद भी अल्लाह तआला का दिव्य वचन, उसकी आज्ञाएँ एवं आध्यात्मिक चिंतन उसकी सृष्टि में निरंतर
अवतरित होता रहेगा। यही वहि के गौण रूप हैं, जिनके माध्यम से ईश्वरीय चेतना आज भी जीवंत है।
अल्लाह तआला नूर (प्रकाश) हैं, और उनका कलाम भी नूर है।
यद्यपि अल्लाह तआला हमारी जीवन-धारा (रग-ए-जां) से भी निकट हैं, फिर भी हम अपनी चेतन इंद्रियों (शऊरी हवास) से उनका प्रत्यक्ष बोध नहीं कर सकते। इसका तात्पर्य यह है
कि वहि (ईश्वरीय प्रेरणा), जो अल्लाह तआला के कलाम का नूर है, उसे आत्मसात करने के लिए सर्वप्रथम चेतना में पर्याप्त
सामर्थ्य और शक्ति आवश्यक है। चेतन शक्ति की क्षमता के आधार पर ही वहि के विभिन्न
रूप अस्तित्व में आए हैं। पैगंबर (अ.) अल्लाह तआला के प्रत्यक्ष रूप से प्रशिक्षित (बराहे-रास्त तरबियत-याफ़्ता) व्यक्ति होते हैं। अतः उनकी
चेतना इतनी प्रबल होती है कि वे वहि के नूर को प्रत्यक्ष रूप से अपने “लतीफ़ा-ए-क़ल्बी” (हृदयगत सूक्ष्म केंद्र) में स्थानांतरित करने की
सामर्थ्य रखते हैं। आत्मा (रूह) के समस्त लतीफ (सूक्ष्म केंद्र) वे केंद्र हैं, जिनमें दिव्य प्रकाश संचित होता है। “लतीफ़ा-ए-क़ल्बी” एवं “लतीफ़ा-ए-नफ़सी” वे क्षेत्र हैं, जिनमें सांसारिक प्रकाश (भौतिक ऊर्जा) संचित रहती है। सामान्य अवस्था
में ये केंद्र भौतिक प्रकाश को धारण करते हैं, किन्तु विशिष्ट परिस्थितियों में ये केंद्र नूर (दिव्य प्रकाश) एवं तजल्ली (दैवीय प्रकाश का उच्चतम रूप) को आत्मसात करने की सामर्थ्य
भी रखते हैं। इस क्षमता को संकल्प (इरादा) के द्वारा विकसित किया जा सकता है। जब तक नूर को धारण करने
की योग्यता उत्पन्न नहीं होती, तब तक वहि के नूर का संचार संभव नहीं होता। जैसे किसी भरे
हुए पात्र में अतिरिक्त जल के लिए स्थान नहीं रहता, उसी प्रकार चेतना में भी उस समय तक नवीन नूर का समावेश नहीं
हो सकता, जब तक उसमें स्थान निर्मित न हो। चेतना में जो दिव्य प्रकाश संचारित होता है, वह अवचेतन (लाशऊर) से प्रवाहित होता है। अवचेतन
आत्मा का प्रत्यक्ष बोध है, और यह संपूर्ण रूप से नूर व तजल्ली में कार्य करता है। गोया मानव आत्मा के पास
दृष्टि (नज़र) के तीन अलग-अलग लेंस (Lens) होते हैं। पहली दृष्टि भौतिक संसार (माद्दी दुनिया) में कार्य करती है, दूसरी नूर (दिव्य प्रकाश) में और तीसरी तजल्ली (दैवीय प्रकाश की परम स्थिति) में।
इस ब्रह्मांड (कायनात) के इन तीनों मंडल (ज़ोन) में विशिष्ट लोक (आलमीन) विद्यमान हैं। प्रत्येक
क्षेत्र में अल्लाह तआला के पवित्र नामों (अस्मा-ए-इलाहिया) की विशिष्ट व्यवस्था क्रियाशील है। इन पवित्र नामों की तजल्ली (दिव्य प्रकाश की अभिव्यक्ति) की सुनिश्चित मात्राएँ
संपूर्ण ब्रह्मांडीय प्रणाली (कायनाती निज़ाम) को संतुलित रखे हुए हैं। प्रत्येक क्षेत्र में तजल्ली की
भिन्न-भिन्न मात्राएँ प्रभावी होती हैं। इन मात्राओं के निर्धारण से ही ब्रह्मांडीय
संरचना (कायनाती सिस्टम) स्थिर रहती है, और यह संरचना विशिष्ट सूत्रों (फॉर्मूलों) से गठित होती है।
तजल्ली की दृष्टि (लेंस) से इन सूत्रों को देखा जा
सकता है, नूर की दृष्टि से इन सूत्रों से निर्मित वस्तुओं के आंतरिक रूपों (बातिनी अशकाल) को देखा जा सकता है, और भौतिक दृष्टि से उनकी
बाहरी संरचना (माद्दी जिस्म) स्पष्ट हो जाती है। इस प्रकार, किसी भी वस्तु का अस्तित्व तजल्ली, नूर और भौतिकता (माद्दी) तीनों स्तरों पर पाया जाता
है। यही कारण है कि ब्रह्मांड तीन मंडल (ज़ोन) पर आधारित है—एक क्षेत्र सदैव हमारी दृष्टि
के समक्ष रहता है, जबकि शेष दो क्षेत्र सामान्य दृष्टि से ओझल रहते हैं।
जो क्षेत्र (ज़ोन) हमारी दृष्टि से ओझल रहते हैं, वही हमारा अवचेतन (लाशऊर) है। अवचेतन में आत्मा (रूह) की जो दृष्टि कार्यरत होती है
और आत्मा की परतों (परतों) में जो अनुभूतियाँ सक्रिय होती हैं, वे निरंतर चेतन ज़ेह्न (शऊर) को सूचित करती रहती हैं।
आत्मा की प्रत्येक परत अल्लाह तआला के आदेश पर गतिशील होती है। इस प्रकार, यह गति अवचेतन से चेतना तक
स्थानांतरित होती रहती है, जिसे ‘ग़ैब (अदृश्य) की खबरें’ कहा गया है। तजल्ली (दैवीय प्रकाश) के परत से जो ज्ञान (खबरें) चेतना में प्रवाहित होता है, वही वहि (ईश्वरीय प्रेरणा) कहलाता है। तजल्ली के दायरे में सीधा चिंतन (तफक्कुर) करके ब्रह्मांड (कायनात) के अवतरण (नुज़ूल) स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव
किया जा सकता है। अल्लाह तआला ने आत्मा (रूह) को सृजनात्मक (तख़्लीकी) ज्ञान प्रदान किए हैं। जब तजल्ली आत्मा के सूक्ष्म केंद्रों
(लतीफ़) से होकर प्रवाहित होती है, तब आत्मा का चिंतन इसे सृजनात्मक (तख़्लीकी) रूप में ढाल देता है। यह
प्रक्रिया पहले नूर (प्रकाश) और ऊर्जा के रूप में घटित होती है, फिर भौतिक स्वरूप (माद्दी जिस्म) धारण करके दृश्य रूप में प्रकट हो जाती है।
जब अवचेतन (लाशऊर) और चेतन ज़ेह्न (शऊर) दोनों की गति समान हो जाती है, अर्थात आत्मा के तीनों स्तर (दायरे) एक साथ सक्रिय हो जाते हैं, तब उनके मध्य की दूरी समाप्त
हो जाती है। इस स्थिति में तजल्ली का अवतरण (नुज़ूल) सीधे चेतना में होने लगता है।
इस अवस्था में तजल्ली की चेतना (शऊर) प्रभावी हो जाती है, अल्लाह का चिंतन (तफ़क्कुर) प्रमुख हो जाता है और व्यक्ति की स्वयं की चेतना (शऊर) गौण हो जाती है। पैगंबरों (अ.) के भीतर तजल्ली की अत्यंत
सूक्ष्मतम अनुभूति सक्रिय होती है। वे आत्मा (रूह) की अनुभूति के माध्यम से
अल्लाह के चिंतन (तफ़क्कुर) को प्रत्यक्ष रूप से समझ लेते हैं। उनके भीतर आत्मा के सूक्ष्म संवेदन (लतीफ हवास) प्रभावी हो जाते हैं और वे
भौतिक जगत में भी आत्मा की अनुभूतियों (रूह के हवास) के साथ जीवन व्यतीत करते हैं। तजल्ली वस्तुतः अल्लाह की
वास्तविक सत्ता (ज़ात) नहीं है, बल्कि उनकी सत्ता का प्रतिबिंब (अक्स) है। तजल्ली अल्लाह का परदा (हिजाब) है। इस परदे के बिना कोई भी
अल्लाह को नहीं देख सकता, न ही किसी मानव (बशर) की वहाँ तक पहुँच संभव है। ब्रह्मांड (कायनात) अल्लाह की सृष्टि (तख़्लीक़) है। आत्मा की दृष्टि प्रत्येक वस्तु को सृजनात्मक रूप (तख़्लीकी सूरत) में देखती और पहचानती है, क्योंकि जब तक कोई वस्तु
सृजनात्मक रूप धारण नहीं करती, तब तक उसका कोई नाम या पहचान नहीं हो सकती। आत्मा (रूह) अम्र-ए-रब्बी (ईश्वरीय आदेश) है। मानव की आत्मा अल्लाह के
आदेश (अम्र) को संपूर्ण जगत में फैलाने वाली है। सबसे पहले आत्मा स्वयं इस अम्र (आदेश) की तजल्ली (दैवीय प्रकाश) को आत्मसात करती है। जैसे
किसी कंप्यूटर में कोई प्रोग्राम (सूचना) फीड किया जाए, तो मशीन उस प्रोग्राम को सृजनात्मक रूप देकर स्क्रीन पर
प्रदर्शित कर देती है। कंप्यूटर में जो प्रोग्राम फीड किया जाता है, वह मात्र संख्याओं और शब्दों (फॉर्मूलों) के रूप में होता है। उस सूत्र
(फॉर्मूले) को कंप्यूटर का आंतरिक तंत्र (मशीन) सृजनात्मक रूप देता है और फिर यह रूप स्क्रीन पर दिखाई देने
लगता है। इस प्रकार, एक संपूर्ण वस्तु अपने पूर्ण रूप और पहचान के साथ अस्तित्व में आती है। अल्लाह की ओर से जो तजल्ली
आत्मा पर अवतरित होती है, उसे आत्मा के तजल्ली क्षेत्र (दायरा-ए-तजल्ली) अपने भीतर समाहित कर लेता है। ये तजल्ली अल्लाह के चिंतन (तफ़क्कुर) की निश्चित मात्राएँ (मुक़र्रर मक़दारे) हैं। ये मात्राएँ ही
ब्रह्मांडीय संरचना (कायनाती निज़ाम) के कोई न कोई सूत्र (फॉर्मूले) होती हैं। आत्मा (रूह) में इन सूत्रों (फॉर्मूलों) की वास्तविकता (माहियत) प्रकट हो जाती है। अर्थात सृष्टि (तख़्लीक़) का आंतरिक रहस्य (बातिन) प्रकट हो जाता है। इसमें
अल्लाह के पवित्र नामों (अस्मा-ए-इलाहिया) की रोशनियाँ (नूर), उनकी गति (हरकात) और संपूर्ण व्यवस्था (निज़ाम) की पूर्ण जानकारी होती है। इसके पश्चात नूर के क्षेत्र (दायरा-ए-नूर) में उस वस्तु का भौतिक शरीर (माद्दी जिस्म) निर्मित होता है। यह शरीर
अपने भीतर समाहित किए गए प्रोग्राम के अनुसार अपने कार्यों एवं क्रियाओं (हरकात व अफ़आल) को संपन्न करता है।
वह़ी (ईश्वरीय प्रेरणा) की वास्तविकता यह है कि चेतना
(शऊर) में सीधे वे तजल्ली (दैवीय प्रकाश) अवतरित होते हैं, जो अल्लाह की ओर से आत्मा (रूह) पर प्रकट होते हैं। आत्मा इन तजल्ली को उसी रूप में चेतना
तक पहुँचा देती है, और चेतना इन दिव्य प्रकाशों में चिंतन (तफ़क्कुर) के माध्यम से अर्थ जोड़ देती है। वह़ी के अवतरण (नुज़ूल) के समय चेतना और अवचेतन (लाशऊर) की गति समान हो जाती है। इस
कारण वह़ी के शब्दों में सांसारिक विचारों का प्रभाव सम्मिलित नहीं होता। यद्यपि
पैग़म्बरों (अ.) के पश्चात वह़ी का क्रम समाप्त हो चुका है, तथापि नबूवत (पैग़म्बरी) के ज्ञान (उलूम) के दिव्य प्रकाश (अनवार) संसार में अब भी विद्यमान हैं। अल्लाह का वचन (क़लाम)—आस्मानी ग्रंथ (आसमानी किताबें) हमारे बीच मौजूद हैं। जब भी कोई व्यक्ति पैग़म्बरों
की सुन्नत (जीवन-शैली) को अपनाता है और उनके आदर्श आचरण (उसवा-ए-हसना) पर अमल करता है, तो नबूवत के ज्ञान के दिव्य प्रकाश उसकी आत्मा में संचित हो जाते हैं। अल्लाह ने पैग़म्बरों पर वह़ी
अवतरित कर उनके चेतन ज़ेह्न (शऊर) को इस सीमा तक जाग्रत कर दिया कि वे अपनी आत्मा की गतियों (हरकात) को पहचान सके और अपनी आत्म-अंतर्दृष्टि (ज़ात) के माध्यम से अल्लाह की सत्ता
(ज़ात) और उसके गुणों (सिफ़ात) का बोध (इरफ़ान) प्राप्त कर सके। जो कोई भी पैग़म्बरों की सुन्नत (जीवन-शैली) को अपनाता है, उसके भीतर पैग़म्बरों का चिंतन (तफ़क्कुर) उत्पन्न हो जाता है। और
पैग़म्बरों के माध्यम से उसे अल्लाह का ज्ञान प्राप्त होता है तथा वह ब्रह्मांडीय
व्यवस्था (कायनाती निज़ाम) की वास्तविकता से अवगत हो जाता है।
मुराक़बा की अवस्था में जब
आँखें बंद कीं, तो प्रकाश की चमक (झलके) होने लगीं और विभिन्न दृश्य प्रकट होने लगे। मैंने कई निकट संबंधियों की
आवाज़ें सुनीं। ये आवाज़ें इतनी स्पष्ट थीं कि एक क्षण के लिए अनायास ही मेरी ज़ुबान
से उत्तर निकल गया। ध्यान के अंतिम चरण में, मैंने स्वयं को अपने भीतर से बाहर निकलते और छत की ओर उठते
देखा। घबराकर आँखें खोल दीं और छत की ओर देखने लगा। कुछ क्षणों के लिए, मैंने एक अस्पष्ट आकृति (हूला) को छत की ओर बढ़ते हुए देखा।
मुराक़बा की अवस्था में मैंने
रोज़ा-ए-अक़दस अलीहिस्सलातु वस्सलाम का दर्शन किया, फिर एक पर्वतीय शृंखला दृष्टिगोचर हुई। पहाड़ की गोद में एक
सुंदर बाग़ था, जो हरी-भरी वनस्पतियों से आच्छादित था। वह दृश्य अत्यंत मनोहर था। मुराक़बा में इतना लीन हो गया
कि बाहरी संसार से पूरी तरह अनभिज्ञ हो गया। एक क्षण के लिए जब ज़ेह्न भटका, तो अपने सीने की हल्की-हल्की गति, जो श्वास के कारण हो रही थी, भी असहज प्रतीत हुई। मुराक़बा के दौरान एक मित्र
का विचार आया, और ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वह मेरे सम्मुख खड़ा हो। मैं उसे स्पष्ट रूप से देख पा
रहा था। जब ज़ेह्न में संबंधियों का विचार आया, तो उनकी आवाज़ें स्पष्ट रूप से सुनाई देने लगीं। अगले दिन जब मैंने उन
संबंधियों से इसकी पुष्टि की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे बीती रात वास्तव में यही
बातें कर रहे थे।
ईशा की नमाज़ के लिए खड़ी हुई
तो अनुभव हुआ कि हुज़ूर पाक (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) इमामत कर रहे हैं। मैं आप (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) के बिल्कुल पीछे पंक्ति में
खड़ी थी। मेरे दाएँ ओर हुज़ूर क़लंदर बाबा औलिया और बाएँ ओर बाबा जी (हज़रत ख़्वाजा शम्सुद्दीन
अज़ीमी) थे। अन्य धर्मों के प्रतिष्ठित लोग भी पंक्तियों में मौजूद थे। पूरे समय यही
महसूस होता रहा कि आप (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) के पवित्र शरीर से प्रकाश की किरणें निकलकर मेरे अंदर
समाहित हो रही हैं। आपके नूर की प्रकाश में मुझे लगातार आपका चेहरा स्पष्ट दिखाई दे रहा था, जबकि आपकी पीठ मेरी ओर थी। आप
(अलैहिस्सलातु वस्सलाम) अरबी परिधान में थे। आपका तेजस्वी चेहरा अत्यंत उज्ज्वल और
दीप्तिमान प्रतीत हो रहा था और आपके चारों ओर प्रकाश का एक आभामंडल स्पष्ट दिख रहा
था। मैं बिल्कुल आपके पीछे थी, इसलिए आपकी प्रकाश सीधे मुझ पर पड़ रही थी। मेरी संपूर्ण
ध्यान आप (अलैहिस्सलातु वस्सलाम) पर केंद्रित था, जिसके कारण मैं आपके चारों ओर खड़े अन्य व्यक्तियों के
चेहरे नहीं देख सकी।
मैंने देखा कि मैं तजल्ली (दिव्य प्रकाश) से बनी हुई हूँ। मेरा शरीर
अत्यंत उज्ज्वल था और मैं ऐसी अवस्था में थी जहाँ चारों ओर केवल प्रकाश ही प्रकाश
था। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मैं इस नूरानी (प्रकाशमय) वातावरण में पूरी तरह से मुराक़बा की स्थिति में बैठी हूँ।
मैं पूर्णतः स्थिर थी और मेरी खुली हुई दृष्टि सामने के वातावरण पर टिकी हुई थी।
मेरा ज़ेह्न एक कोरे कागज की भांति बिल्कुल खाली और स्थिर था। फिर ऐसा प्रतीत हुआ
कि मेरी दृष्टि के सामने से अत्यधिक तीव्र प्रकाश आया और वह मेरी पेशानी में
समाहित हो गया। (सईदा खातून)
यह रात के लगभग सवा आठ बजे की
बात है, जब मैं अपने फ्रंट रूम में बैठी थी। अचानक, मेरे सामने वाली दीवार पर एक दूधिया प्रकाश का लगभग डेढ़
फुट व्यास का एक घेरा प्रकट हुआ। यह प्रकाश एक किनारे से शुरू होकर दूसरे किनारे
तक चलता, फिर लौटकर वापस आता, और उसी स्थान से पुनः प्रकट होता, जहाँ से पहले शुरू हुआ था। कमरे में ट्यूब लाइट जल रही थी, लेकिन इस प्रकाश के घेरे की
चमक ट्यूब लाइट से भी अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली थी। यह सिलसिला लगभग दस मिनट तक
चलता रहा। अचानक, इस प्रकाश के ठीक बाद एक आकृति उभरी। यह आकृति पहले के प्रकाश से भी अधिक
तेजस्वी थी। यह लगभग पाँच से छह मिनट तक स्थिर रही। मैं टकटकी लगाए, पूरी तरह से स्थिर और स्तब्ध
होकर उस ज्योतिर्मय आकृति को देखती रही। मुझे संसार की किसी भी चीज़ का भान नहीं
था। जब यह प्रकाशित आकृति दृष्टि से ओझल हो गई, तो मेरे मस्तिष्क को एक झटका सा लगा और मेरे ज़ेह्न में
तुरंत विचार आया—“यह तो हज़रत क़लंदर बाबा औलिया थे!” उस तेजस्वी छवि की मुद्रा ठीक वैसी ही थी, जैसी हज़रत क़लंदर बाबा औलिया
की होती है। अचानक, मेरी आँखों से आँसू बहने लगे और मेरी स्थिति ऐसी हो गई कि मैं उसे शब्दों में
व्यक्त नहीं कर सकती। मेरा हृदय इतनी तेज़ी से धड़कने लगा कि ऐसा प्रतीत हुआ जैसे
वह सीने से बाहर निकल आएगा। (रेहाना)
अचानक, मैंने महसूस किया कि मेरे
भौतिक शरीर के अंदर से एक और शरीर निकल रहा है। वह शरीर खिड़की से होता हुआ आकाश
की ऊँचाइयों की ओर बढ़ने लगा। इस शरीर ने एक सफ़ेद ज्योतिर्मय वस्त्र धारण किया
हुआ था, और पूरी आकाशीय सीमा एक सफ़ेद धुंधली आभा से भरी हुई थी। यह प्रकाशित शरीर सात
रास्तों को पार करता चला गया। जैसे-जैसे यह ऊपर जाता गया, दृश्य और अधिक मनमोहक होते गए। हर दिशा में केवल प्रकाश ही
प्रकाश था। वह शरीर कुछ असमंजस में प्रतीत हुआ, तभी उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया और एक आवाज़ सुनाई दी—“अल्लाह तुम्हारी सहायता
करेगा।“ जब मेरे आध्यात्मिक शरीर ने यह आवाज़ सुनी, तो मेरे भौतिक शरीर पर एक अजीब कंपकंपी छा गई और मेरा हृदय
तीव्र गति से धड़कने लगा। फिर “अल्लाहु अकबर” की पुकार गूँजी और मैं झुक गया। इसके बाद मैंने सज्दा किया और दिल किया कि
सदैव इसी स्थिति में बना रहूँ। मैंने देखा कि बहुत से फ़रिश्ते बड़े अदब और
श्रद्धा के साथ दो कतारों में खड़े हैं। वे एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े थे, और उनके बीच पाँच से छह फुट
का अंतर था। मेरा आध्यात्मिक शरीर उन दोनों कतारों के बीच आ गया। जैसे ही मेरी
दृष्टि आगे उठी, तो मेरे अंदर एक कंपन-सी दौड़ गई।
मुराक़बा में जब मैंने अपनी
आँखें बंद कीं, तो कुछ क्षण बाद मुझे अनुभव हुआ कि मैं अपने भौतिक शरीर से बाहर आ गया हूँ और
सीधे हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि
वसल्लम के रौज़े (पवित्र दरगाह) पर हाज़िर हूँ। जैसे ही यह अनुभूति हुई, मैंने ज़ेह्न ही ज़ेह्न दुरूद शरीफ़ पढ़ना आरंभ कर दिया।
मेरे शरीर और आत्मा ने अनुभव किया कि जाली मुबारक (पवित्र जाली) के भीतर से एक शीतल आभा
निकलकर मुझ पर पड़ रही है। फिर मैंने स्वयं को काबा के समीप पाया। कुछ ही क्षणों
में मैंने आकाश की ओर उड़ान भर दी। इस मार्ग में मुझे कई लोग दिखाई दिए, जिनमें से कुछ को मैं जानता
था। धीरे-धीरे, मैं एक ऐसे स्थान पर पहुँचा, जहाँ से आगे जाने का कोई मार्ग नहीं था। वहाँ मुझे
फ़रिश्तों की लंबी कतारें दिखाई दीं। इस स्थिति को मैं अधिक देर तक सहन नहीं कर
सका। फिर मैंने देखा कि मैं अपने कमरे में हूँ। ऐसा अनुभव हुआ कि मेरा संपूर्ण
अस्तित्व पूरे कमरे में समाया हुआ है, और इसी स्थिति में मेरा मोराकबा समाप्त हो गया। पश्चिम से दक्षिण की ओर
प्रकाशों का यह अस्तित्व यात्रा कर रहा है। जब मैं घर के सामने आकर रुकता हूँ, तो ऐसा अनुभव होता है जैसे यह
मैं स्वयं ही हूँ। जब ध्यानपूर्वक देखता हूँ, तो जन्म से लेकर आज तक की सभी घटनाएँ चलचित्र (वीडियो फ़िल्म) की भांति नज़र आने लगती हैं, जिनमें कड़वी यादें, प्रसन्नता, अच्छाइयाँ और बुराइयाँ—सब सम्मिलित होती हैं। जब और
अधिक ध्यान केंद्रित करता हूँ, तो भविष्य की बातें भी दृष्टिगोचर होने लगती हैं। कुछ बातें
स्पष्ट रूप से समझ में आती हैं, जबकि कुछ पूरी तरह से स्पष्ट नहीं होतीं। मैं इस आदर्श रूप (प्रकाशमय अस्तित्व) को देखता हूँ कि वह
ज्योतिर्मय तारों से आकाश के बहुत ऊपर किसी अज्ञात शक्ति से बंधा हुआ है। किंतु उस
वस्तु को मैं अधिक समय तक देख नहीं पाता। इसके बाद मुराक़बा समाप्त कर देता हूँ। (अली असगर)
मैं देखती हूँ कि पूज्य गुरु
बाबा जी मेरे साथ हैं। वे कहते हैं, “आओ, तुम्हें आकाशों की सैर कराएँ।“ हम ऊपर उठते चले जाते हैं। हमारा शरीर बहुत हल्का हो जाता
है, जैसे कोई पक्षी। हम उड़ते हुए
आकाशों में प्रवेश कर जाते हैं। वहाँ हम तीव्र प्रकाशमान मेघों के बीच से गुजरते
हैं। फिर एक निर्मल आकाशीय विस्तार प्रकट होता है, जिसमें नीचे सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है। नीचे पृथ्वी पर
नगर बसे हुए हैं। लोग अधिकतर कृषि कार्य में संलग्न हैं। यह प्रदेश अत्यंत हरित और
समृद्ध है। विशाल, निर्मल नदियाँ प्रवाहित हो रही हैं। नदियों के तटों पर लोग खेती कर रहे हैं, फल-फूल और सब्जियाँ उगा रहे हैं।
एक दृष्टि में यह सब देखने के पश्चात् हम पुनः ऊर्ध्वगमन करते हैं। फिर हम प्रकाश
के मेघों से होकर गुजरते हैं और पुनः एक निर्मल आकाश में पहुँचते हैं, जहाँ दूर-दूर तक दृष्टि जाती है और सब
कुछ स्पष्ट दिखाई देता है। हर दिशा में बस्तियाँ और घाटियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। हम उन प्रकाश-मेघों को पार कर एक और अधिक
निर्मल आकाशीय विस्तार में प्रवेश करते हैं। जब-जब हम इन प्रकाश-पुंजों से होकर गुजरते, ऐसा प्रतीत होता कि यही आकाश
की सीमा है। मैंने पूज्य गुरु से कहा, “बाबा जी, मैंने तो सोचा था कि दो आकाशों के मध्य कोई कठोर अवरोध होगा, जैसे लोहा या इस्पात, जिसके बिना अनुमति कोई प्रवेश
नहीं कर सकेगा, न ही चोरी-छिपे इसे पार कर सकेगा। परंतु यहाँ तो केवल प्रकाश का प्रवाह है, जिसके मध्य से सरलता से जाया
जा सकता है। यह तो कोई बाधा प्रतीत नहीं होती।“ इस पर पूज्य गुरु बाबा जी ने कहा...
आकाश मानव की दृष्टि की सीमा
है। जब चेतना अचेतन के विस्तार में प्रवेश करती है, तो चेतना की दृष्टि क्रमशः विकसित होती जाती है, और मानव की आंतरिक दृष्टि
अचेतन अथवा परोक्ष लोकों का दर्शन करने लगती है। परोक्ष लोकों के अवलोकन में
परमात्मा की ओर से कोई बाधा नहीं है, किन्तु प्रत्येक आकाश की सीमाओं में जो लोक विद्यमान हैं, वहाँ परमात्मा के विभिन्न
गुणों की दिव्य ज्योतियाँ सक्रिय रहती हैं। चेतना की दृष्टि आकाश की सीमाओं को इसलिए पार नहीं कर सकती
क्योंकि चेतना ‘ईश्वरीय नामों’ (अस्मा-ए-इलाही) की ज्योतियों के नियमों से अपरिचित होती है। किन्तु जो साधक ईश्वरीय नामों के
ज्ञान और उनके दिव्य नियमों से परिचित हो जाता है, वह अपने संकल्प और चेतना के माध्यम से अचेतन के भीतर
प्रविष्ट हो सकता है। वह बिना किसी अवरोध के परोक्ष जगत का अवलोकन अपनी आंतरिक
दृष्टि से कर सकता है। प्रत्येक आकाश की संरचना ईश्वरीय नामों की उन्हीं दिव्य ज्योतियों से बनी होती
है, जिनकी प्रकाश-तरंगें उन लोकों में प्रविष्ट
होकर उनकी रचना करती हैं। आकाश की सतह पर ईश्वरीय नामों की ये ज्योतियाँ एकत्रित
होती हैं, जिससे साधारण दृष्टि उनके पार देखने में असमर्थ रहती है। किन्तु जब साधक
परमात्मा के स्वरूप और उसके गुणों में गहन चिंतन करता है, तो ये दिव्य ज्योतियाँ उसके
अंतःकरण में समाहित होने लगती हैं। ये ज्योतियाँ स्वयं साधक को अपना परिचय देने
लगती हैं। इस प्रकार चेतना इन ज्योतियों से परिचित हो जाती है, और चेतना का परिचित होना ही
उसका देखना है। इस संसार में जितना अधिक कोई व्यक्ति ईश्वरीय नामों के ज्ञान को आत्मसात करता
जाता है और अपने भीतर इन ज्योतियों को संचित करता जाता है, मृत्यु के उपरांत उसका
अस्तित्व उन्हीं सीमाओं के भीतर स्थापित हो जाता है। अर्थात्, मृत्यु के उपरांत व्यक्ति
अपने बाह्य इंद्रियों और प्रत्यक्ष दृष्टि के साथ उन्हीं लोकों में निवास करता है।
पूज्य गुरु बाबा जी के वचनों
को सुनकर मेरा अंतःकरण आनंद से भर गया। मैंने विनम्रता से प्रश्न किया:
गुरुदेव, क्या इन लोकों में प्रवेश
करने और उनका दर्शन करने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य इसी जीवन में उनके संबंध
में ज्ञान प्राप्त करे?”
बाबा जी ने उत्तर दिया:
केवल ज्ञान प्राप्त करना या
मात्र जानना ही पर्याप्त नहीं है। जब तक ईश्वरीय नामों (अस्मा-ए-इलाही) के गुण साधक के भीतर प्रकट
नहीं होते, तब तक वह इन लोकों में प्रविष्ट नहीं हो सकता। यही कारण है कि परमात्मा ने सात
आकाशों की रचना की, ताकि साधक प्रत्येक आकाश में कार्यरत दिव्य प्रकाशों के ज्ञान को क्रमशः
आत्मसात करता जाए और धीरे-धीरे उसकी चेतना उन ज्योतियों को क्रमिक रूप से अवशोषित
करती जाए। प्रत्येक आकाश चेतना के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाता है।
प्रत्येक आकाश चेतना की एक विशिष्ट गति का प्रतिनिधित्व करता है। जब चेतना के भीतर
स्थित इंद्रियाँ उसी गति से कार्य करने लगती हैं, जो आकाशों में स्थित लोकों और वहाँ निवास करने वाले
प्राणियों में सक्रिय होती है, तब साधक (या सेवक) उस आकाश में प्रवेश कर वहाँ के लोकों की यात्रा करता है और
वहाँ का ज्ञान प्राप्त करता है।
मृत्यु के पश्चात जिस लोक में
आत्माएँ स्थानांतरित की जाती हैं, उसे आलम-ए-अराफ़ कहा जाता है।
मोराकबा में यह देखती हूँ कि मेरे पूज्य गुरु बाबाजी का
हाथ मेरे सिर पर एक छत्र की भांति रखा हुआ है। उनकी उंगलियों से प्रकाश की किरणें
निकलकर मेरे मस्तिष्क में समाहित हो रही हैं, जिससे मेरा सम्पूर्ण मस्तिष्क भीतर और बाहर से प्रकाशमान हो
गया है। मैं पक्षी की भांति आकाश में उड़ने लगी, किंतु इस उड़ान के दौरान भी मैंने अपने सिर पर बाबाजी का
हाथ उसी प्रकार छत्रवत् देखा। उड़ते हुए मेरे हृदय में निरंतर परमेश्वर की स्तुति, स्मरण और ध्यान चलता रहा। साथ
ही मैंने नीचे झाँककर देखा कि मैं किन-किन स्थानों से होकर गुजर रही हूँ। नीचे दृष्टि गई तो "अ'राफ़" की भूमि दिखाई दी। मैंने सोचा, चलो इसकी परिक्रमा की जाए।
मैं धीरे-धीरे वहाँ अवतरण कर गई और उस नगर के पथों पर भ्रमण करने लगी। यह नगर अतीव
सुन्दर था—चारों ओर उपवन थे, जलधाराएँ प्रवाहित हो रही थीं और वातावरण अत्यंत सुखद एवं सुरभित था। मेरे
हृदय में निरंतर ईश्वर का ध्यान प्रवाहित हो रहा था। इसी बीच, मैंने एक ऐसी बस्ती देखी जहाँ
छोटे-छोटे घर थे। वहाँ का मौसम और प्राकृतिक छटा अत्यंत मनोहर थी, किंतु इन सब सौंदर्य एवं आभा
के होते हुए भी लोग अपने-अपने घरों में बंद थे। मैंने अपनी आंतरिक दृष्टि से देखा तो पाया कि सभी
व्यक्ति अपने-अपने कक्षों में सिर झुकाए विषादग्रस्त एवं निष्प्रभ बैठे हैं, मानो उनके भीतर इतनी भी शक्ति
नहीं बची कि वे अपना सिर उठाकर इस अद्भुत प्राकृतिक छवि का अवलोकन कर सकें, जिससे उनके हृदय उल्लसित हो
उठें। मुझे प्रतीत हुआ कि ये सभी लोग सांसारिक स्मृतियों में उलझे हुए हैं। मेरे
ज़ेह्न में विचार आया—परमेश्वर ने तो इन्हें कभी नहीं रोका कि वे इस रमणीय सृष्टि का आनंद न लें! किंतु इन्होंने स्वयं को अपनी
सीमाओं में बाँध लिया है। यदि ये दो कदम ही बाहर निकलें तो यह विस्तृत और मुक्त
वायुमंडल उनके समस्त दुःखों का नाश कर दे और उनके अंतर्मन में नवीन आनंद का संचार
कर दे। मैंने कुछ परिचित व्यक्तियों को देखा और उन्हें समझाने का प्रयास किया कि वे
अपने कक्षों से बाहर आएँ। जब वे सहमत हो गए, तब मैं वहाँ से आगे बढ़ी। अब मेरे समक्ष एक अत्याधुनिक नगर
का दृश्य प्रकट हुआ। यह नगर भव्य भवनों से सुसज्जित था। वहाँ विशाल महलों सदृश
भव्य गृह थे, इन महलों के डिज़ाइन ज्यामितीय डिज़ाइन पर आधारित थे। उन पर हल्के, किन्तु सुसंयोजित रंगों से चित्रांकन किया गया था, जो देखने में अत्यंत मोहक
प्रतीत हो रहे थे। इसी समय, एक परिचित व्यक्ति मुझे दृष्टिगोचर हुआ। उसका देहांत कुछ दिनों पूर्व हुआ था।
वह मुझे देखकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और बोला—
"आंटी! आप यहाँ कैसे?"
उसने बहुत ही सुरुचिपूर्ण
परिधान धारण किया हुआ था। उसे देखकर मुझे भी असीम हर्ष की अनुभूति हुई। मैंने
उत्तर दिया—
"मैं तो अ'राफ़ के एक ऐसे क्षेत्र में
जा पहुँची थी, जिसे देखकर आनंद के स्थान पर केवल विषाद ही उत्पन्न हुआ। अच्छा हुआ, तुम मिल गए।"
उसने प्रसन्नता से कहा—"आइए, आंटी! मैं आपको यहाँ का भ्रमण कराता
हूँ। पहले मैं आपको अपने घर ले चलता हूँ।"उसने मुझे एक वाहन में बैठाया और कहा कि यह वाहन उन्होंने
स्वयं निर्मित किया है। यह एक उड़न-तश्तरी के सदृश था—अत्यंत आकर्षक एवं आधुनिक! इसमें न तो पहिए थे, न स्टीयरिंग, न ही कोई गियर। केवल ऊपर-नीचे जाने के लिए कुछ बटन लगे
हुए थे। मैंने जिज्ञासा से पूछा—यह वाहन संचालित कैसे होगा?
आंटी! बस आपको जहाँ जाना है, उसका ध्यान रखिए। उस बटन के
आकार की जगह पर लाट जल जाएगी, और फिर यह गाड़ी स्वतः ही उस स्थान पर पहुँच जाएगी। और ठीक
ऐसा ही हुआ। उसने विचार किया, लाट जल गई और गाड़ी तीव्र गति से चल पड़ी। एक अत्यंत सुंदर
सफेद महल के सामने रुकी। उसका डिज़ाइन ज्यामिति के त्रिभुज, चतुर्भुज आदि प्रकार के कोणों
पर आधारित था, किंतु देखने में अत्यंत मनोहारी प्रतीत होता था। उसने मुझे घर का भ्रमण कराया, वहाँ की गाड़ियाँ दिखाईं।
वहाँ अत्याधुनिक वस्तुएँ थीं। उसने मुझे बताया कि यहाँ के लोगों का दिमाग बहुत
तीव्र है, और दुनिया के लोग उनकी तुलना में बहुत पीछे हैं। हालाँकि, यहाँ भी कुछ ऐसे प्राणी थे जो
प्रारंभिक अवस्था में जीवन यापन कर रहे थे। मुझे यह अनुभव हुआ कि जो लोग दुनिया
में अपने ऊपर अल्लाह के ज्ञान के द्वार बंद कर लेते हैं, वे यहाँ आकर और भी अधिक दयनीय
जीवन व्यतीत करते हैं। क्योंकि यहाँ की सामान्य गति हमारी दुनिया से कम से कम दस
हज़ार गुना अधिक है। मस्तिष्क की गति केवल ज्ञान से ही बढ़ सकती है, किसी अन्य चीज़ से नहीं। और
मस्तिष्क की गति जितनी अधिक होगी, कर्म की गति भी उसी अनुपात में होगी। फिर, ऐसी तीव्र गति वाले जीवन में
समाज के भीतर रहने के लिए मस्तिष्क का उसी अनुपात में विकसित होना आवश्यक है।
अन्यथा, मनुष्य अपनी एकांत की कोठरी में कैद हो जाता है, और उसकी दशा पर उसके अलावा कोई दया करने वाला नहीं होता। यह
सब देखकर मैंने अल्लाह का अत्यंत आभार व्यक्त किया कि उसने मुझे ऐसे ज्ञान को
सीखने का अवसर प्रदान किया। (बेगम अब्दुल हफ़ीज़ बट)
ख्वाजा शम्सुद्दीन अजीमी
ग़ार-ए-हिरा के नाम
जहाँ अंतिम युग के संदेशता (ﷺ) ने (रेहाना)किया
और हज़रत जिब्राईल, क़ुरआन की प्रारंभिक
आयतों को लेकर पृथ्वी पर अवतरित हुए।