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इस महान नगर में
एक तंग और अंधेरी गली है।
गली के अंत में
खेत और वन फैले हुए हैं। वहीं एक झोपड़ी-सा घर खड़ा है — न कोई छत, न कोई दीवारें, बस एक झरझरी
बाड़।
घर की छत रबर-जैसे जाले से बनी
है, जो धूप और वर्षा से तनिक भी रक्षा नहीं कर
सकती।
इस झोपड़ी में
केवल महिलाएँ हैं।
छत इतनी नीची है
कि कोई व्यक्ति सीधे खड़े नहीं हो सकता।
वातावरण में घुटन
और बेचैनी है।
वहाँ एक महिला
पाँव फैलाकर बैठी है।
विलक्षण बात यह
है कि उसके शरीर का ऊपरी भाग सामान्य है, किंतु टाँगें दस
फुट लंबी हैं।
इस विचित्र दशा
को देखकर मैंने पूछा:
“माताश्री! यह कैसी
विचित्रता है?”
उत्तर मिला:
“पृथ्वी पर जब मैं
किसी के घर जाती थी, तो एक स्थान की बातें दूसरे स्थान पर तथा वहाँ
की बातें तीसरे स्थान पर चुगली और झूठे जाल में उलझाकर फैलाती थी।
धरतीवासी इसे ‘लगाई-बुझाई’ कहते हैं।
अब परिणाम यह है
कि चलने-फिरने में असमर्थ हूँ।
टाँगों में
अंगारे भरते हैं, जलती हूँ, तड़पती हूँ — पर कोई दया करने
वाला नहीं।“
चेहरे पर भय और
आतंक की छाया है।
यह पुरुष दबे
पाँव, हाथ में छुरी लिये चला जा रहा है।
हे प्रभो!
उसने सामने खड़े
व्यक्ति की पीठ में छुरी भोंक दी और बहते रक्त को कुत्ते की भाँति जीभ से चाटने
लगा।
गाढ़ा और गर्म
रक्त पीते ही उसे वमन हो गया,
रक्त का वमन।
कांपते स्वर में, जीवन से उकता कर
वह कराहते हुए कहता है:
“काश! पृथ्वी पर रहते
मुझे समझ में आ जाता कि पीठ-पीछे दोषारोपण (निंदा) का परिणाम यही
होता है।“
ख्वाजा शम्सुद्दीन अजीमी
ग़ार-ए-हिरा के नाम
जहाँ अंतिम युग के संदेशता (ﷺ) ने (रेहाना)किया
और हज़रत जिब्राईल, क़ुरआन की प्रारंभिक
आयतों को लेकर पृथ्वी पर अवतरित हुए।