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धरती पर मौजूद हर चीज़ में
कोई न कोई रंग अवश्य पाया जाता है — कोई भी वस्तु बिना रंग के नहीं होती। रसायन विज्ञान हमें बताता है कि जब किसी
तत्व को तोड़ा-फोड़ा जाता है, तो उससे विशेष प्रकार के रंग
प्रकट होते हैं। यह रंगों की विशिष्ट व्यवस्था उस तत्व का एक मौलिक गुण होती है।
अतः हर तत्व में रंगों की व्यवस्था भिन्न होती है। यही नियम मानव जीवन में भी लागू
होता है। मनुष्य के भीतर भी रंगों और तरंगों का एक पूर्ण और सक्रिय तंत्र कार्य
करता है। जब यह रंग और तरंगें संतुलित रूप में क्रियाशील होती हैं, तो वह व्यक्ति स्वस्थ रहता है। किंतु यदि इस संतुलन
में परिवर्तन आ जाए, तो व्यक्ति की मानसिक और
शारीरिक स्थिति भी बदलने लगती है।
मानव के भावनात्मक अनुभवों
में रंगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यह आम अनुभव है कि किसी बुरी खबर
को सुनते ही चेहरे का रंग पीला पड़ जाता है। भय की स्थिति में चेहरे का रंग बदल
जाता है। क्रोध की दशा में आंखें और चेहरा लाल हो जाते हैं। यदि किसी कमरे की
दीवारों का रंग गहरा लाल हो, तो ज़ेह्न पर बोझ-सा महसूस होता है। वहीं यदि
वही दीवारें नीले रंग से रंग दी जाएं, तो शांति का अनुभव होने लगता है। हरे-भरे वृक्ष और रंग-बिरंगे फूल मानसिक और शारीरिक थकान को दूर कर देते हैं, लेकिन जब यही पेड़ पतझड़ में अपना हरा वस्त्र
त्यागकर पीले वस्त्र धारण करते हैं, तो देखने वाले के भाव भी परिवर्तित हो जाते हैं।
रंग और प्रकाश के सिद्धांत से
यह ज्ञात होता है कि केवल शरीर ही नहीं, इंद्रियों में भी रंगों की विशिष्ट मात्राएँ सक्रिय होती हैं। यदि किसी कारण
से इन रंगों के तंत्र में बदलाव आ जाए कोई
रंग कम हो जाए, कोई बढ़ जाए या अनुपात में
अंतर आ जाए तो व्यक्ति के अनुभव और भावनाएँ भी बदलने लगती हैं।
आध्यात्मिक विद्या में साधक
के भीतर रंगों और प्रकाशों का संतुलन इस प्रकार बदला जाता है कि उसका ज़ेह्न
अवचेतन इंद्रियों के निकट आ जाए। मुराक़बा की निरंतर साधना से प्रकाशों के तंत्र
में रंगों की मात्रा बढ़ने लगती है। यह आवश्यक है कि प्रकाशों और रंगों का यह
परिवर्तन किसी विशेष क्षमता को जागृत करने में प्रयुक्त हो। यदि यह ऊर्जा किसी
शक्ति, किसी इंद्रिय के निर्माण में
व्यय न हो, तो यह सामान्य इंद्रियों को
प्रभावित करने लगती है। एक सच्चा आध्यात्मिक गुरु
साधक के भीतर होने वाले इन परिवर्तनों का निरंतर निरीक्षण करता है और आवश्यकता
पड़ने पर उनमें परिवर्तन करता है, ताकि रंगों और प्रकाशों के
बदलाव के साथ-साथ चेतना की शक्तियाँ भी समरस रूप से कार्य करती रहें।
इसके विपरीत, जब कोई सामान्य व्यक्ति असंतुलित रंगों और प्रकाशों
के प्रभाव में आ जाता है, तो उसका स्वभाव इसे सहन नहीं
कर पाता और यह प्रभाव किसी शारीरिक या मानसिक विकृति के रूप में सामने आता है। हम
इनको बीमारी के रूप में जानते हैं — जैसे कि रक्तचाप (ब्लड प्रेशर), कैंसर, रक्तविकार, खून की कमी, दमा, तपेदिक, गठिया, अस्थि रोग, स्नायु-तंत्र की समस्याएँ तथा अन्य असामान्य अनुभूतियाँ और
भावनात्मक असंतुलन।
आध्यात्मिक विद्याओं के साधक
में किस प्रकार रंग और प्रकाश में परिवर्तन किया जाए, इसका निर्णय केवल एक कुशल आचार्य ही कर सकता है।
स्वभाव की प्रवृत्ति, मस्तिष्क की क्षमता, विचारधारा, शारीरिक संरचना और अन्य कई तत्वों को ध्यान में रखा जाता है।
मुराक़बा के माध्यम से रंग और
प्रकाश को आत्मसात करने की विधियाँ निम्नलिखित हैं:
विधि संख्या 1: सुखद आसन में बैठकर यह भावना करें कि रंग और प्रकाश
की तरंगें सम्पूर्ण शरीर में समाहित हो रही हैं।
विधि संख्या 2: मुराक़बा में यह कल्पना करें कि रंग अथवा प्रकाश की
तरंग आकाश से अवतरित होकर मस्तिष्क में समा रही है।
विधि संख्या 3: मुराक़बा में यह भावना की जाए कि चारों ओर का
संपूर्ण वातावरण प्रकाश से पूर्ण है।
विधि संख्या 4: यह भाव किया जाए कि मुराक़बा करने वाला साधक प्रकाश
की नदी में डूबा हुआ है।
चिकित्सकीय और शारीरिक
दृष्टिकोण से प्रत्येक रंग और प्रकाश के पृथक-पृथक गुण होते हैं। जब किसी
विशिष्ट प्रकाश का मुराक़बा किया जाता है, तो मस्तिष्क में रासायनिक परिवर्तन आरंभ हो जाते हैं और वांछित प्रकाश को
आत्मसात करने की शक्ति विकसित होने लगती है। चूंकि चिकित्सकीय और मानसिक रोग तथा
उनका उपचार इस ग्रंथ का विषय नहीं है, अतः इस विषय में विस्तार से वर्णन नहीं किया जाएगा। फिर भी, वे मानसिक विकार जो मस्तिष्कीय विघटन से उत्पन्न
होते हैं, उनके निवारण हेतु रंगों एवं
प्रकाशों के मुराक़बा प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
टिप्पणी: किसी भी रंग अथवा प्रकाश का
मुराक़बा करते समय आचार्य की मार्गदर्शना अत्यावश्यक है।
नीली प्रकाश किरणों से
मस्तिष्क संबंधी विकार, गर्दन और पीठ में पीड़ा, रीढ़ की हड्डी के कशेरुक दोष, अवसाद, हीन भावना और दुर्बल इच्छाशक्ति से मुक्ति मिलती है।
यह भावना करें कि मैं आकाश के
नीचे हूं और आकाश से प्रकाश उतरकर मेरे मस्तिष्क में संचित हो रहा है तथा पूरे
शरीर से प्रवाहित होकर चरणों के माध्यम से धरती में समाहित हो रहा है।
जमीलुद्दीन, गुजरांवाला से लिखते हैं: गर्दन और पीठ की पीड़ा के लिए
नीली प्रकाश का मुराक़बा निर्देशानुसार किया। पहले दिन प्रकाश की कल्पना अधिक गहन
नहीं थी, परंतु दूसरे दिन ऐसा प्रतीत
हुआ मानो नीली प्रकाश की एक विशाल किरण आकाश से उतरकर मेरे मस्तिष्क में प्रविष्ट
हो रही है। सम्पूर्ण मस्तिष्क नीली किरणों से भर गया। फिर ये किरणें हृदय में
प्रवेश करने लगीं और वहाँ से उतरकर आमाशय होते हुए पैरों के द्वारा पृथ्वी में
समाहित होने लगीं। मेरी दृष्टि पृथ्वी में समाहित होती हुई किरणों की ओर गई।
प्रतीत हुआ जैसे शरीर से बाहर निकलती किरणें भीतर प्रवेश करती किरणों की अपेक्षा
सघन हैं। विचार आया कि आने वाली प्रकाश तरंगों के प्रवाह ने रोग को अपने साथ बहाकर
शरीर से बाहर निकाल दिया है। पंद्रह मिनट की इस प्रक्रिया के पश्चात शरीर में
हलकापन अनुभव हुआ। मुराक़बा की समाप्ति पर पीड़ा में एक हद तक राहत मिली। एक माह
निरंतर इस प्रक्रिया को करने से अब मैं पूर्णतः आरोग्य प्राप्त कर चुका हूं।
रज़िया सुल्ताना, टंडो आदम से लिखती हैं: मैं पिछले तीन वर्षों से
अवसाद (डिप्रेशन) से ग्रस्त थी। समय-समय पर मुझ पर निराशा के दौरे पड़ते थे। यद्यपि स्पष्ट रूप से कोई कारण नज़र
नहीं आता था, फिर भी आनंद नामक अनुभूति से
जीवन वंचित था। नीली प्रकाश चिकित्सा ने मेरी दुनिया ही परिवर्तित कर दी है। छह
सप्ताह के मुराक़बा ने मेरी खोई हुई प्रसन्नता पुनः लौटा दी है। ऐसा प्रतीत होता
है कि नीली किरणों ने मेरे भीतर शोक की धाराओं की दिशा ही बदल दी है।
मोहम्मद हामिद, कराची से लिखते हैं:
मेरी आयु केवल बीस वर्ष है।
मैं महाविद्यालय में अध्ययन करता हूं। परंतु इच्छाशक्ति इतनी दुर्बल है कि किसी भी
कार्य के लिए केवल सोचता ही रह जाता हूं। महाविद्यालय में किसी से बात करने में
झिझक महसूस होती है। यत्न के बावजूद यह दुर्बलता दूर नहीं हो रही है। कृपया इसके
लिए कोई उपचार सुझाएं।
उनके लिए नीली प्रकाश का
मोराकबा सुझाया गया। एक माह बाद हामिद जी
ने अपनी अनुभूतियाँ इस प्रकार लिखीं:
क़िब्ला और काबा जनाब अज़ीमी
साहब!
आप निस्संदेह ईश्वर की सृष्टि
के शुभचिंतक हैं। आपके द्वारा सुझाए गए नीली प्रकाश के मुराक़बा ने मेरी पूरी जीवन
धारा ही परिवर्तित कर दी है। इस एक माह के अंतराल में मेरा व्यक्तित्व पूरी तरह से
बदल गया है। अब मैं एक सामान्य, प्रसन्नचित्त युवक हूं। हर
बात अत्यंत आत्मविश्वास के साथ करता हूं। नीली किरणों के मुराक़बा में मेरी
अनुभूतियाँ विविध रही हैं, जिनका संक्षिप्त विवरण दे रहा
हूं:
प्रथम दिवस प्रकाश की कल्पना
स्थापित ही नहीं हो सकी, अपितु मस्तिष्क में विचार
अत्यंत तीव्रता से आते-जाते रहे। आपकी हिदायत के अनुसार मैंने उन पर ध्यान नहीं दिया। फिर कल्पना में
आकाश स्पष्ट हुआ और नीले रंग की भावना स्थिर हो गई। तत्पश्चात कई दिनों तक यह
स्थिति बनी रही कि नीली किरणें आकाश से उतरकर मेरे मस्तिष्क और हृदय में समाहित हो
रही हैं। फिर उसके बाद कई दिनों तक मुझे अपना समूचा स्वरूप नीली किरणों से निर्मित
प्रतीत होने लगा। मुराक़बा के पश्चात मैं स्वयं को अत्यंत हल्का अनुभव करता था।
धीरे-धीरे यह विश्वास दृढ़ हो गया कि मैं भी सामान्य युवकों की भांति हर किसी से
संवाद कर सकता हूं। और आज एक माह के पश्चात ऐसा प्रतीत होता है मानो मेरे भीतर एक
नए ‘हामिद’ का जन्म हुआ है। मैं अब भी नीली किरणों का मुराक़बा
कर रहा हूं और इसे आगे भी निरंतर जारी रखने का संकल्प है।
पाचन तंत्र, वायु विकार, आंतों की तपेदिक, पेचिश, कब्ज़, बवासीर, आमाशय के अल्सर आदि के लिए यह
अत्यंत प्रभावशाली उपचार है।
सलमा चौधरी, मुल्तान से लिखती हैं: मैं दो वर्षों से आमाशय के
अल्सर की रोगिणी थी। आपने पीली प्रकाश किरणों के मुराक़बा का निर्देश दिया था। मैं
इस प्रकार कल्पना करती थी कि मैं आकाश के नीचे बैठी हूं और आकाश से पीली प्रकाश
किरणें निकलकर मेरे सिर से होती हुई आमाशय में संचित हो रही हैं। इस पीली प्रकाश
में मेरे आमाशय का अल्सर धीरे-धीरे घुलता जा रहा है। दो सप्ताह तक यही अनुभूति रही कि
अल्सर प्रकाश में विलीन होकर छोटा होता जा रहा है। दो सप्ताह बाद एक दिन मुराक़बा
में स्वतः यह भाव आया कि अब अल्सर आमाशय से पूर्णतः लुप्त हो चुका है और अब केवल
पीली, चमकीली, विस्तृत और कोमल प्रकाश तरंगें आमाशय में विद्यमान
हैं। उस दिन के बाद लगभग प्रतिदिन यही अनुभूतियाँ रहीं और आज एक माह हो गया है।
मैंने औषधियाँ पूरी तरह से त्याग दी हैं। केवल पीली प्रकाश का मुराक़बा कर रही
हूं। मैं किसी भी प्रकार से आपका आभार प्रकट नहीं कर सकती। आपने मुझे एक नया जीवन
प्रदान किया है।
काकड़ा टाउन से मंसूर अहमद
लिखते हैं: मुझे बहुत पुराना पेचिश का रोग था। हर स्थान से उपचार कराया पर किंचित भी राहत
नहीं मिली। हिम्मत हारकर मैं लगभग निराश होकर बैठ गया। एक दिन मेरे एक मित्र ने
मुझे अज़ीमी साहब का पता दिया कि तुम वहाँ जाकर उपचार कराओ। मेरी स्थिति सुनते ही
अज़ीमी साहब ने कहा: “आप पीली प्रकाश किरणों का
मुराक़बा करें, ईश्वर ने चाहा तो आराम
मिलेगा।” मैंने कुछ संदेह के साथ इस
प्रक्रिया को प्रारंभ किया, क्योंकि मैं बड़े से बड़े
चिकित्सक से उपचार करवा चुका था और इस रोग पर धन भी जल की तरह बहा चुका था। कई
वर्षों से निरंतर परहेज़ पर जीवन चल रहा था। अब विश्वास नहीं हो रहा था कि इतने
साधारण उपाय से रोग ठीक हो जाएगा। फिर भी मुराक़बा आरंभ किया, तो पहले दो दिन तक कल्पना स्थिर नहीं हुई, चिंता और अस्थिरता घेरे रहीं। फिर तीसरे दिन पीली
किरणों की भावना स्थिर हो गई और मुराक़बा में रुचि उत्पन्न होने लगी। इस प्रकार
पंद्रह दिनों के बाद स्पष्ट रूप से भावना स्थिर हो गई और मुझे अपने भीतर इन प्रकाश
किरणों की तरंगें महसूस होने लगीं। रोग का जो निरंतर दबाव था, वह धीरे-धीरे टूटता हुआ अनुभव हुआ। इस दौरान पेचिश में भी राहत
मिलने लगी। जो परहेज़ बताया गया था, उसका पालन भी किया। रोग में कमी आने पर स्वाभाविक रूप से भोजन में रुचि भी
उत्पन्न हुई।
एक अन्य सज्जन लाहौर से लिखते
हैं: मुझे आंतों की तपेदिक पिछले तीन वर्षों से थी। उपचार भी बहुत कराया। निरंतर
परहेज़ से ही जीवन चल रहा था। मुझे पीली प्रकाश का मुराक़बा बताया गया और इसके साथ
ही पीली किरणों से अभिसिंचित जल पीने के लिए भी कहा गया। नियमित साधना से आंतों की
सूजन और पीड़ा में पर्याप्त राहत मिली। चिकित्सक ने परीक्षण किया और मुझे यह
रिपोर्ट दी कि अब कोई रोग नहीं है। उस दिन मैं इस कदर आनंदित था मानो जीवन में
पहली बार सच्ची प्रसन्नता से साक्षात्कार हुआ हो। अब मैं जब भी किसी सभा में होता
हूं, अपने मित्रों और भाइयों से
मुराक़बा के माध्यम से उपचार की बात अवश्य करता हूं।
मेरे अनुसार कृतज्ञता प्रकट
करने का यह सर्वोत्तम उपाय है कि अधिक से अधिक लोग इस अनमोल उपचार का लाभ प्राप्त
करें।
वक्षस्थल के रोगों जैसे क्षय
रोग, पुरानी खाँसी, दमा आदि के लिए यह एक प्रभावी उपचार है।
एक व्यक्ति को क्षय रोग हो
गया था। दो वर्षों से उनके फेफड़े इतने अधिक प्रभावित हो चुके थे कि उन्हें बार-बार रक्तवमन की शिकायत रहने
लगी थी। उन्हें नीली प्रकाश की मुराक़बाके साथ नारंगी किरणों का तेल मालिश हेतु
सुझाया गया। दो माह के उपचार से उनकी स्थिति में यह परिवर्तन आया कि रक्तवमन पहले
की तुलना में अत्यंत कम हो गया। छह माह उपरांत, ईश्वर की कृपा से वे इस घातक रोग से पूर्णतः मुक्त हो गए।
अथर हुसैन, फलिया से लिखते हैं –
"गत बारह वर्षों से मुझे दमा
की गंभीर शिकायत रही है और अब तो आशा भी धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही थी।
अत्यंत आस्था और विश्वास के साथ मैं इस आशा पर यहाँ आया कि आज़मी जी कोई विशेष कृपा
करेंगे। मुझे नारंगी किरणों की मुराक़बा-साधना और जलोपचार बताया गया। ईश्वर की अनुकंपा से बारह वर्ष
पुराना रोग पूर्णतः समाप्त हो गया।“
उच्च रक्तचाप और रक्त में उष्णता
के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों, चर्मरोगों, खुजली, आतिशक, सूजाक, चिप्पी आदि के लिए यह एक उपकारी चिकित्सा है।
नसरुल्लाह बेग, मर्दान से लिखते हैं:
"मेरे पूरे शरीर पर तीव्र
खुजली थी। तीन वर्षों तक निरंतर उपचार चलता रहा, किंतु स्थिति यह थी कि खुजली के कारण घाव तक बन जाते थे। अत्यंत पीड़ादायक
अवस्था थी। अंततः हरित प्रकाश की मुराक़बा-साधना और हरित प्रकाश-संयुक्त जल के सेवन से पाँच
मास के भीतर मुझे इस कष्ट से संपूर्ण मुक्ति मिल गई।“
नाहिद फ़ातिमा, मियांवाली:
मैं उच्च रक्तचाप की गंभीर
पीड़ा से ग्रस्त थी। कभी-कभी स्थिति इतनी बिगड़ जाती कि घर का सामान्य कार्य भी संभालना कठिन हो जाता
था। यहाँ तक कि छोटे-छोटे बच्चे भी उपेक्षित हो रहे थे। प्रतिदिन प्रातः-सायं हरित प्रकाश की
मुराक़बातथा रात्रि में शयनकक्ष में हरित बल्ब के प्रयोग से बीस दिनों के भीतर
मेरी स्थिति में अत्यधिक सुधार हुआ।“
सुंदस बतूल, पेशावर:
“मेरे समस्त शरीर पर चिप्पी पड़ जाया करती थी, जिसके कारण मैं हीनभावना से ग्रस्त रहती थी। हरित
प्रकाश चिकित्सा से मेरी यह समस्या अब पूर्णतः समाप्त हो चुकी है। इस उपचार के साथ-साथ मैंने समुद्री सीप से
संबंधित उपचार भी अपनाया था।“
निम्न रक्तचाप, रक्ताल्पता (अनीमिया), गठिया, हृदय-संकुचन, हृदय का डूबना, ऊर्जा की कमी महसूस होना, कायरता, स्नायु-दुर्बलता (नर्वस ब्रेकडाउन), मस्तिष्क में निराशाजनक
विचारों का आना, मृत्यु का भय, तेज़ ध्वनि से मस्तिष्क पर आघात की अनुभूति इत्यादि
के लिए लाल प्रकाश का मुराक़बाउपचार अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।
डॉ. नियाज़ हुसैन लिखते हैं:
“विगत एक वर्ष से मेरी पत्नी स्नायु-दुर्बलता की शिकार थीं।
आधुनिक चिकित्सा में इस रोग हेतु प्रायः मादक औषधियों का प्रयोग कराया जाता है, जिससे मस्तिष्क की गति इस प्रकार मंद पड़ जाती है कि
रोगी को नींद आ जाती है। निद्रा के प्रभाव से तंत्रिकाओं पर पड़ा तनाव अस्थायी रूप
से दूर हो जाता है।
मैंने छह माह तक पत्नी को इन
औषधियों पर रखा, परंतु वे इनकी आदी होने लगीं
और जब औषधि का सेवन न होता तो स्नायु-दुर्बलता का आक्रमण पूर्व की अपेक्षा कहीं अधिक तीव्र हो
जाता। तब मैंने उन्हें लाल प्रकाश
की मुराक़बा करवाई। अब रोग के लक्षण चेहरे से पूर्णतः विलीन हो चुके हैं। निःसंदेह
मुराक़बा एक अत्यंत प्रभावशाली और निष्कलंक उपचार पद्धति है। अब मैं अक्सर अपने रोगियों को चिकित्सकीय उपचार के
साथ-साथ मुराक़बा की सलाह भी देता हूँ, जिससे मानव जाति इस दिव्य वरदान से अधिकाधिक लाभ प्राप्त कर सके।“
सिबग़तुल्लाह लिखते हैं:
“मेरा मस्तिष्क हर समय निराशाजनक विचारों का केंद्र
बना रहता था। इसका कोई विशेष कारण नहीं था, बस हृदय सदैव नकारात्मक सोच में डूबा रहता था।
लाल प्रकाश की मुराक़बाने
मेरी सोच में सकारात्मक परिवर्तन ला दिया है।“
पुरुषों के यौन विकारों तथा
स्त्रियों के गर्भाशय संबंधी रोगों का प्रभावी उपचार है।
प्रकरण: एक सज्जन डेरा इस्माइल ख़ान से लिखते हैं:
“यौन दुर्बलता के कारण मैं विवाह योग्य नहीं था। इस
कारण अत्यंत हीन भावना में डूबा रहता था।
जामुनी प्रकाश की और जामुनी
तेल की मालिश ने मेरी यह दुर्बलता काफ़ी हद तक समाप्त कर दी है।“
एक महिला, चीचा वाटनी से लिखती हैं:
“मेरी शादी को पाँच वर्ष बीत चुके थे, किंतु मैं संतान-सुख से वंचित थी। चिकित्सकों
ने गर्भाशय में सूजन की बात कही थी। बहुत उपचार कराया, परंतु लाभ न हुआ।
अंततः जामुनी प्रकाश की
मुराक़बाऔर जामुनी तेल की मालिश ने गर्भाशय की सूजन दूर कर दी है, और अब मैं गर्भवती हूँ।“
मिर्गी, मानसिक दौरे, स्मृति एवं मस्तिष्क की निर्बलता, भय व आशंका, असुरक्षा की भावना, जीवन के प्रति नकारात्मक सोच, और संसार से विरक्ति जैसे मानसिक कष्टों से मुक्ति
पाने हेतु यह एक अत्यंत प्रभावी उपचार है।
प्रकरण: सलमान अंसारी, ठठ्ठा से लिखते हैं:
“मैं दीर्घकाल से मिर्गी रोग से ग्रस्त था। इस रोग
में अनेक बार अत्यंत कष्ट झेले। कई बार चलते-चलते बाज़ार में दौरा पड़ा और
गिरकर घायल हो गया। एक बार स्नान करते समय दौरा पड़ने से एक घंटे तक कोई सुध लेने
वाला नहीं था। अंततः यह स्थिति हो गई कि मुझे अकेला छोड़ना असंभव हो गया और लोग
मेरी देखरेख हेतु साथ रहने लगे, जो मेरे लिए एक स्थायी मानसिक
बोझ बन गया था।
सौभाग्य से अज़ीमी साहब का
आशीर्वाद मिला, जिन्होंने ‘गुलाबी रोशनी’ के मुराक़बा का निर्देश दिया। इस मुराक़बा से मुझे आशा की किरण दिखाई दी है और
मैं दृढ़ विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यदि ईश्वर ने चाहा तो मैं पूर्णतः स्वस्थ
हो जाऊँगा।“
शीमा नाज़ली, हैदराबाद से लिखती हैं:
“लगातार भय और आशंका ने मेरी प्रवृत्ति को कायरता और
हीनभावना से भर दिया था। विवाहोपरांत जीवन मेरे लिए किसी परीक्षा से कम नहीं रहा।
हर समय पति, सास और ननदों का भय हृदय पर
इस प्रकार छाया रहता था कि समस्त कार्य पूर्ण रूप से करने के पश्चात भी ज़ेह्न की
आशंका समाप्त न होती थी। कोई कुछ कहे न कहे, मैं भीतर ही भीतर कांपती रहती थी।
इसके साथ ही ईश्वर का भय भी
मेरे स्वभाव का एक अभिन्न पार्ट बन चुका था। स्वयं की दृष्टि में मेरा प्रत्येक
कर्म पाप प्रतीत होता और मैं निरंतर ईश्वर से भयभीत रहकर क्षमा याचना करती रहती। इस मानसिक दबाव ने मेरे समस्त तंत्रिका तंत्र को
प्रभावित कर दिया था, और मैं सदैव थकी-मांदी रहने लगी थी। मेरे पति ने मुझे ‘गुलाबी रोशनी’ के मुराक़बा का सुझाव दिया।
दो माह के अभ्यास के पश्चात आज मैं स्वयं को संतुलित और शांत अनुभव कर रही हूँ, और मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं शीघ्र ही पूर्णतः
स्वस्थ हो जाऊँगी।
ख्वाजा शम्सुद्दीन अजीमी
ग़ार-ए-हिरा के नाम
जहाँ अंतिम युग के संदेशता (ﷺ) ने (रेहाना)किया
और हज़रत जिब्राईल, क़ुरआन की प्रारंभिक
आयतों को लेकर पृथ्वी पर अवतरित हुए।