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स्वयं (आंतरिक अस्तित्व) के प्रति जागरूकता प्राप्त
करने तथा आध्यात्मिक क्षमताओं को जागृत करने हेतु नियमित मुराक़बा का अभ्यास किया जाता है।
मुराक़बा की प्रक्रिया के माध्यम से हमारी आंतरिक क्षमताएँ क्रमिक रूप से प्रकट
होती हैं, और हम क्रमबद्ध तरीके से आत्मबोध की ओर अग्रसर होते हैं।
यह एक सामान्य सत्य है कि जब
हम किसी कौशल या कला को अर्जित करना चाहते हैं अथवा किसी विशिष्ट क्षमता को जागृत
करना हमारा उद्देश्य होता है, तो हम एक सुव्यवस्थित नियम या सिद्धांत के अंतर्गत उसका
अभ्यास करते हैं। नियमित और निरंतर अभ्यास के परिणामस्वरूप संबंधित क्षमता धीरे-धीरे सक्रिय हो जाती है, और अंततः हम उस कला में
विशेषज्ञता प्राप्त कर लेते हैं। उदाहरणस्वरूप, यदि हम चित्रकला में प्रवीणता
हासिल करना चाहते हैं, तो किसी कुशल गुरु के मार्गदर्शन में कागज पर रेखाएँ खींचने
का अभ्यास करते हैं। इन रेखाओं की क्रमबद्धता से धीरे-धीरे एक आकृति का निर्माण
होता है। प्रारंभ में पेंसिल हमारे मनोभाव और इरादे के अनुरूप नहीं चलती; रेखाओं की लंबाई, चौड़ाई और वक्र अपेक्षित
संतुलन में नहीं होते। किंतु निरंतर अभ्यास के परिणामस्वरूप, हम अपनी इच्छानुसार सुसंगत और
संतुलित रेखाएँ खींचने में सक्षम हो जाते हैं।
उदाहरण:
एक नवजात शिशु अपने आसपास के
परिवेश को उस समझ और ज्ञान के साथ नहीं समझ पाता, जैसा कि एक प्रौढ़ और
विवेकशील व्यक्ति समझता है। वह वस्तुओं को देखता तो है, परंतु उनके अर्थ और उपयोग से
पूर्णतः अपरिचित रहता है। धीरे-धीरे, बच्चे के सामने परिवेश के सत्य उद्घाटित होने लगते हैं और
उसे चेतन परिपक्वता प्राप्त करने में कई वर्ष लग जाते हैं। प्रारंभ में, वह अपनी नैसर्गिक क्षमताओं के
प्रयोग में कठिनाइयों का अनुभव करता है। जैसे, जब वह चलने का प्रयास करता है
तो पहले घुटनों के बल रेंगता है। पैरों पर खड़े होने का प्रयास करते समय उसे लंबे
समय तक संतुलन बनाए रखने में असफलता का सामना करना पड़ता है। अंततः, निरंतर अभ्यास और प्रयास के
बाद, वह पैरों पर खड़ा होकर चलने में सक्षम हो जाता है।
उसी प्रकार, भाषा सीखने की प्रक्रिया
खंडित और अपूर्ण शब्दों के उच्चारण से प्रारंभ होती है। फिर धीरे-धीरे वह अपूर्ण वाक्य बनाने
लगता है। इस अवस्था में, अधिकांश शब्दों के अर्थ उसके लिए अस्पष्ट या गड्डमड्ड रहते
हैं, परंतु समय के साथ वह अपनी भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लेता है। पूर्ण वाक्य
बोलने और अपने विचारों को प्रभावी ढंग से दूसरों तक पहुंचाने की क्षमता उसमें
विकसित हो जाती है।
यह सम्पूर्ण प्रक्रिया केवल
बच्चे के व्यक्तिगत प्रयास तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें शिक्षक की
मार्गदर्शन और अभिभावकों की शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कई वर्षों की
मेहनत और अनुशासनात्मक शिक्षण के उपरांत, वह सही ढंग से पढ़ने और लिखने में दक्ष हो जाता है।
यह स्पष्ट करना उद्देश्य है
कि जब भी किसी व्यक्ति के भीतर कोई नई क्षमता जन्म लेती है, तो चेतना उसे क्रमबद्ध रूप से
आत्मसात करती है। जिस प्रकार एक शिशु अनेक चरणों से गुजरकर ज्ञान अर्जित करता है, उसी प्रकार एक प्रौढ़ और
विवेकशील व्यक्ति को भी किसी नई क्षमता के जागृत होने में कई चरणों से गुजरना
पड़ता है। कुछ-कुछ यही स्थिति तब होती है जब व्यक्ति के भीतर अंतर्निहित इंद्रियाँ सक्रिय
होती हैं। चूंकि चेतना के लिए यह आंतरिक इंद्रियों की क्रियावली एक नवीन अनुभव
होता है, इसलिए उन्हें समझने और उनका प्रभावी उपयोग करने में कठिनाइयाँ उत्पन्न होती
हैं।
ऐसा नहीं है कि मुराकबा के
लिये आँखें बन्द की जायें और एक दिन या कुछ दिनों में वे सब अनुभव और अवलोकन सामने
आ जायें जो मुराकबा का परिणाम हैं। लगातार अभ्यास और रुचि के माध्यम से कोई मनुष्य
क्रमशः मुराकबा की दुनिया में यात्रा करता है। प्रारम्भ में मानसिक केन्द्रितता
नहीं होती लेकिन अभ्यास के परिणामस्वरूप एकाग्रता प्राप्त हो जाती है। जैसे-जैसे मानसिक एकाग्रता में
वृद्धि होती है, आंतरिक इन्द्रियों में प्रेरणा जागृत होती रहती है। आदमी चेतना की शक्ति के
अनुपात से आत्मिक अनुभवों और आंतरिक अवलोकनों से गुजरता है। घटनाओं और स्थितियों
में समय के साथ-साथ विस्तार उत्पन्न होता है। मुराकबा में निपुणता उत्पन्न हो जाने के बाद
आत्मिक क्षमताओं का संकल्प के साथ उसी प्रकार प्रयोग किया जा सकता है, जिस प्रकार अन्य क्षमताएँ
प्रयोग की जाती हैं।
इन चरणों में छात्राओं और
छात्रों को ऐसे आत्मिक गुरु की आवश्यकता होती है जो उसे बच्चे की तरह उंगली पकड़कर
चलना सिखाए और शिष्य स्वयं अपनी क्षमताओं को प्रयोग करने में निपुणता प्राप्त कर
ले। प्रत्येक व्यक्ति की घटनाएँ और स्थितियाँ अलग-अलग होती हैं और उनका सम्बन्ध
उसकी आत्मिक और चेतना की अवस्था से होता है। अतः व्यक्तिगत रूप से आत्मिक अवलोकनों
का पूर्ण विश्लेषण केवल एक अनुभवी गुरु ही कर सकता है। लेकिन चेतना की शक्ति के
अनुसार मुराकबा का विद्यार्थी जिन स्तरों से गुजरता है, वे प्रत्येक व्यक्ति में कम
या अधिक एक जैसे होते हैं। शक्ति और क्षमता के इन स्तरों और मंज़िलों का विवरण इस
प्रकार है।
अर्धनिद्रा ध्यान (मोराकबा) का प्रारंभिक स्तर है। जब कोई व्यक्ति मुराक़बा आरंभ करता
है, तो प्रायः उस पर झपकी या निद्रा जैसी स्थिति हावी हो जाती है। कुछ समय बीतने
के पश्चात, ज़ेह्न जिस अवस्था में पहुँचता है, उसे न तो पूर्णतः निद्रा कहा जा सकता है और न ही जाग्रति।
यह स्वप्न और जाग्रति के बीच की स्थिति होती है, किंतु इस अवधि में चेतना
पूर्णतः सजग नहीं रहती। यही कारण है कि मुराक़बा के पश्चात यह अनुभव होता है कि
कुछ देखा अवश्य था, किंतु क्या देखा, यह स्मरण नहीं रहता।
1- प्रातः 10 बजकर 17 मिनट पर मुराक़बा आरंभ किया।
शीघ्र ही एकाग्रता स्थापित हो गई। मैं बार-बार अर्धनिद्रा की अवस्था में प्रवेश करता रहा। ऐसा अनुभव
हुआ मानो मैं किसी के चरण प्रक्षालन कर रहा हूँ। फिर अर्धनिद्रा की स्थिति में
देखा कि मेरे शरीर से एक काला, अठोस साया निकलकर सामने की दीवार में विलीन हो गया।
(मोहम्मद अकमल, लाहौर)
2- मोराकबा के समय मैं हज़रत क़लंदर बाबा औलिया की कल्पना
करता हूँ। मुराक़बा के समय निरंतर मानसिक एकाग्रता बनी रहती है। ध्यान करते-करते अर्धनिद्रा की स्थिति
स्वयं ही उत्पन्न हो जाती है। हज़रत क़लंदर बाबा औलिया के कल्पना की एक हल्की सी
छवि ज़ेह्न में, नेत्रों के समक्ष उभरती है। मैं अपनी एकाग्रता उसी पर केंद्रित करता हूँ, और स्वतः अर्धनिद्रा की
अवस्था आ जाती है। लगभग आधे घंटे तक मुराक़बा करता हूँ, परंतु ध्यान की प्रारंभिक
अवस्था के अतिरिक्त कोई अन्य अनुभूति स्पष्ट रूप से स्मरण नहीं रहती। अल्लाह की
कृपा से अब ज़ेह्न में पूर्ण रूप से पवित्रता उत्पन्न हो चुकी है।
(सैयद ताहिर जलील)
3. अधिंद्रावस्था में ऐसा प्रतीत
हुआ मानो इस्तिग़फार (क्षमायाचना) की व्याख्या समझाई जा रही हो। एक बार मुराक़बा की गहन अवस्था में, अधिंद्रावस्था के दौरान अनुभव
हुआ कि जिन्नात से भेंट हुई। क्षणभर को भय उत्पन्न हुआ, किंतु उस संवाद का विस्तार
स्मरण में अंकित न रह सका। मैं निरंतर "या हय्यु, या क़य्यूम" का जप करती हूँ, जिससे यह अनुभूति होती है कि परमात्मा मेरे समक्ष साक्षात
उपस्थित हैं। प्रार्थना (नमाज़) करते समय भी यह भाव प्रबल रहता है कि ईश्वर मुझे देख रहे हैं। कभी-कभी इतनी भावुकता (रक्त) उमड़ आती है कि हृदय खोलकर
अश्रुपात करने की इच्छा होती है। एक दिन, अधिंद्रावस्था की यह स्थिति इतनी गहरी हो गई कि समस्त
सृष्टि के कण-कण में परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव हुआ, और उस क्षण ऐसा प्रतीत हुआ कि
मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है।
(नसरीन)
मुराक़बा प्रारंभ करने के कुछ
समय पश्चात साधक को सामान्यतः स्वप्न अधिक स्पष्ट दिखने लगते हैं। कभी-कभी यह प्रक्रिया निद्रा में
प्रवेश करते ही आरंभ हो जाती है और संपूर्ण रात्रि चलती रहती है। विभिन्न प्रकार
के दृश्य प्रकट होते हैं, जिनमें प्रमुख रूप से फलदार वृक्ष, पुष्प, हरित मैदान, पर्वत, हरी-भरी घाटियाँ, चारागाह, झरने, नदियाँ, विशाल भव्य भवन, मधुर स्वर में गान करने वाले
एवं मनमोहक रंगों वाले पक्षी सम्मिलित होते हैं। ऐसे स्वप्नों में गहराई तथा
विस्तार अधिक होता है, और जागने के पश्चात भी उनका प्रभाव मन-मस्तिष्क पर बना रहता है।
साधक रंगीन स्वप्न देखता है, जो साधारण स्वप्नों की तुलना
में अधिक सजीव एवं रंगों से भरपूर होते हैं। ऐसे स्वप्नों के पश्चात ज़ेह्न
आल्हादित, हल्का एवं उल्लसित हो उठता है। मुराक़बा के निरंतर अभ्यास से व्यक्ति का
अवचेतन से संबंध अधिक सुदृढ़ हो जाता है, जिससे उसके चित्त पर अवचेतन संकेतों का प्रभाव प्रबल होने
लगता है। जब स्वप्नों में और अधिक गहनता उत्पन्न होती है, तो सत्यस्वप्न (रूय्या-ए-सादिक़ा) प्रकट होने लगते हैं। साधक जो
कुछ स्वप्न में देखता है, वह कुछ समय पश्चात यथारूप साकार हो जाता है अथवा जाग्रत
अवस्था में उसकी पुष्टि हो जाती है। ये स्वप्न इतने स्पष्ट एवं प्रतीकात्मक होते
हैं कि उनके संकेतों को सही रूप में समझने में कोई व्यवधान नहीं होता, और साधक सहजता से उनके गूढ़
अर्थों को आत्मसात कर सकता है।
शिष्य जो स्वप्न देखता है, उन परिस्थितियों और घटनाओं को
ध्यान में रखते हुए गुरु उसकी शिक्षा और मार्गदर्शन करता है। अनेक गूढ़ ज्ञान एवं
विधाएँ स्वप्नों के माध्यम से ही शिष्य तक संप्रेषित कर दी जाती हैं।
१.गुरु अपनी आध्यात्मिक शक्ति
से शिष्य के ज़ेह्न की शुद्धि करते हैं। घनत्व को धोकर सूक्ष्मता का संचार करते
हैं।
२.और यह सूक्ष्मता का भंडार
धीरे-धीरे निद्रा से जागृति की ओर प्रवाहित होता रहता है।
३.आध्यात्मिक गुरु स्वप्न के
माध्यम से शिष्य को अदृश्य लोक की यात्रा कराते हैं।
४. आत्माओं के संसार में शिष्य
को पैग़म्बरों, संतों, और पवित्र आत्माओं के दर्शन प्राप्त होते हैं।
५. ऐसे अनुभव साक्षात् प्रतीत
होते हैं कि जागने के पश्चात् भी शिष्य उन्हें स्मरण रखने को बाध्य हो जाता है।
६.सत्य स्वप्न के प्रभाव इतने
गहरे होते हैं कि ज़ेह्न उन्हें बारंबार पुनरावृत्त करता है।
इस प्रकार चित्त को अलौकिक
अनुभूतियों को संभालने की क्षमता प्राप्त होती है, और सूक्ष्म चिंतन (फिक्र-ए-लतीफ़) शिष्य के भीतर अधिक समय तक
सक्रिय रहता है। स्वप्न-जगत के बार-बार दर्शन से शिष्य की रुचि आध्यात्मिक और पारलौकिक ज्ञान की ओर अधिक बढ़ने
लगती है।
शिष्य ऐसे स्वप्न देखने लगता
है, जिनमें स्पष्ट संकेत होते हैं, जिन्हें समझकर वह अनेक मानसिक चिंताओं और शारीरिक रोगों से
सुरक्षित रह सकता है।
मुझे आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान के अध्ययन में गहन
रुचि है। प्रत्येक उपलब्ध अवसर पर, मैं मोराकबा का अभ्यास करती हूँ।
स्वप्न: मैंने स्वप्न में देखा कि
चारों ओर विस्तृत मैदान फैला हुआ है। उस मैदान के मध्य में एक गड्ढा है, जो आकार में किसी समाधि के
समान प्रतीत हो रहा है। चारों ओर हरियाली छाई हुई है, किंतु उस गड्ढे के भीतर कोई
लाल रंग का द्रव दृष्टिगोचर हो रहा है। सहसा वह द्रव प्रज्वलित अग्नि की लपटों में
परिवर्तित हो गया।
स्वप्न की व्याख्या: स्वप्न में उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) के संकेत प्रकट हुए हैं। अतः
किसी योग्य महिला चिकित्सक की देखरेख में नियमित रूप से रक्तचाप की निगरानी करना
तथा उसे सामान्य बनाए रखने के उपाय करना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा, ईश्वर न करे, गर्भ में स्थित शिशु के
स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। परमात्मा आपको अपने संरक्षण में रखें।
स्वप्न: जीवन की विविध व्यस्तताओं के
बीच से समय निकालकर मैं प्रतिदिन लगभग दस से पंद्रह मिनट मुराक़बा करता हूँ। इस
दौरान मुझे प्रायः एक विचित्र स्वप्न दिखाई देता है,
मैं देखता हूँ कि एक बकरी को
भूमि पर निष्प्राण की भाँति लिटाकर उसकी त्वचा उतारी जा रही है, जबकि उसे वध नहीं किया गया
है। आश्चर्यजनक रूप से, वह किसी प्रकार की पीड़ा अनुभव नहीं कर रही होती, न ही उसमें कोई छटपटाहट होती
है, किंतु उसकी आँखों में एक गहन करुणा और असहायता स्पष्ट परिलक्षित होती है।
यही दृश्य कभी-कभी मुझे एक गाय के साथ भी
दिखाई देता है। वह भी कष्टहीन प्रतीत होती है, किंतु उसके नेत्रों में वही
करुणाजनक अभिव्यक्ति दृष्टिगोचर होती है।
इस अमानवीय दृश्य का स्वप्न
में ही मुझ पर इतना तीव्र प्रभाव पड़ता है कि मैं व्याकुल होकर वहाँ से पलायन कर
जाता हूँ। अब मेरी मनोदशा यह हो गई है कि किसी भी अवसर पर किसी प्राणी का वध होते
हुए देखना मेरे लिए असहनीय हो गया है।
व्याख्या: जब मनुष्य की आशाएँ कुचलती
हुई प्रतीत होती हैं और यह क्रम निरंतर चलता रहता है, तथा आशा की कोई किरण कहीं भी
दिखाई नहीं देती, तब गहरी निद्रा में अचेतन ज़ेह्न ऐसे प्रतीक दिखाने लगता है। निराशा और हताशा
इन प्रतीकों को मजबूर और असहाय छवियों का रूप दे देती है। ये सभी वे अभिलाषाएँ
होती हैं जो समाप्त हो चुकी हैं, और हृदय में इतनी शक्ति नहीं होती कि नई अभिलाषाएँ उनका
स्थान ले सकें। आपके इस स्वप्न से मानसिक दुर्बलता का पता चलता है।
सुझाव: प्रातःकाल शीतल वायु में
भ्रमण करना, धीमे कदमों से नहीं बल्कि तीव्र गति से, कम से कम आधा घंटा, मानसिक दुर्बलता को दूर करने के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।
स्वप्न: मैं मुराक़बा करने के पश्चात
निद्रावस्था में चला गया। स्वप्न में मैंने देखा कि अचानक मेरे मुख से मोटी-मोटी सेवइयों का एक गुच्छा
निकल आया, जिससे मेरा संपूर्ण मुख भर गया। मैंने शीघ्रता से सिर झुका लिया। मेरे समक्ष
कुछ सेवइयाँ पहले से ही पकाई हुई रखी थीं। मैंने उनमें से कुछ उठाकर अपने मुख से
निकले सेवइयों के गुच्छे पर डाल दीं और उन पर शर्करा (चीनी) छिड़क दी। इसके उपरांत, मैंने उस सेवइयों के गुच्छे
को पुनः मुख में डाल लिया और उँगलियों की सहायता से उसे गले के भीतर प्रविष्ट करा
दिया। इसके पश्चात, मैंने स्वयं को एक पर्वत शिखर पर स्थित पाया, और उसी क्षण वर्षा प्रारंभ हो
गई।
टिप्पणी: मैं यह स्वप्न दो बार देख
चुका हूँ। प्रातः जागने के पश्चात शरीर में अस्वस्थता अनुभव होती है। किसी भी
प्रकार के आहार के प्रति कोई रुचि नहीं रह जाती। संपूर्ण दिवस इस स्वप्न का विचार
ज़ेह्न में बना रहता है।
स्वप्न का अर्थ: स्वप्न में आंतों से संबंधित
एक रोग की ओर संकेत किया गया है। स्वप्न के अंतिम भाग में यह इंगित किया गया है कि
अनुचित आहार सेवन के कारण आंतों की संवेदनशीलता असामान्य हो गई है। इस स्वप्न का
पुनः देखना इस बात का संकेत है कि यह रोग केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि अभी भी सक्रिय अवस्था
में है। अतः चिकित्सक की सलाह के अनुसार या स्वयं आहार में संतुलन बनाए रखने से
स्वास्थ्य में सुधार संभव है। यदि उपचार और परहेज़ सही ढंग से न किया गया, तो इस रोग के परिणामस्वरूप
अन्य शारीरिक समस्याएँ उत्पन्न होने की संभावना है।
स्वप्न: मोराकबा करके मैं लेट गया। लेटते ही निद्रा ने आकर मुझे
आवृत कर लिया और स्वप्नलोक में मैंने यह दृश्य देखा:
घरवालों ने एक दीगची कलई कराने
के लिए दी। मैंने कलई करने वाले से कहा, "मैं अपने खलेरे भाई को लेकर अभी आता हूँ।" घर गया तो माता ने मुझे आम
प्रदान किए और आदेश दिया, "जाकर अपनी भाभी को ले आओ।" मैं भाभी के मायके गया तो यह देखकर हृदय विषाद से भर गया कि
भाभी अत्यंत दुर्बल और रुग्ण हैं। मैंने भाभी को आम दिए और उनसे घर चलने का निवेदन
किया। भाभी मेरे साथ चल पड़ीं। तत्पश्चात मैंने देखा कि मैं एक हांडी लिए कहीं जा
रहा हूँ और मेरे वस्त्रों पर काले दाग उभर आए हैं।
स्वप्न का अर्थ: मधुर पदार्थों के अत्यधिक
सेवन से सोदावी विकार (अर्थात शरीर में सोदा की प्रबलता) उत्पन्न हुई है। इसका सम्पूर्ण उपचार नहीं कराया गया, जिसके फलस्वरूप कभी यह रोग
प्रबल हो जाता है और कभी मंद पड़ जाता है। भविष्य में जब यह विकार पुनः प्रकट हो, तो सावधानीपूर्वक इसका
सम्पूर्ण उपचार कराना आवश्यक है, ताकि इस रोग से सदैव के लिए मुक्ति प्राप्त हो सके
परामर्श: मैं एक सेवानिवृत्त सरकारी
अधिकारी हूँ, मेरी आयु 65 वर्ष है। प्रत्येक रात्रि शयन से पूर्व पंद्रह मिनट तक मुराक़बा करता हूँ।
स्वप्न में मैंने देखा कि मेरे पुत्र का विवाह, उसकी वर्तमान पत्नी की
उपस्थिति में, किसी अन्य स्थान पर संपन्न हो रहा है। आश्चर्यजनक रूप से, पुत्र की पत्नी भी इस द्वितीय
विवाह समारोह में सम्मिलित है और सहज रूप से सहभागिता कर रही है।
व्याख्या: आपने कोई वचन दिया था, किंतु उसे पूर्ण नहीं किया।
वचन देने के पश्चात् उससे विमुख होना आपके अंतःकरण में अशांति उत्पन्न कर सकता है।
आपको चाहिए कि अपने संकल्प को पूरा करें एवं अपने अंतःकरण की आवाज़ को सुनें, अन्यथा मानसिक तनाव एवं
द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
स्वप्न: रात्रि में मुराक़बा करने के
उपरांत जब मैं निद्रासन में गया, तो मैंने स्वप्न में देखा कि हमारे घर से सटे हुए पड़ोसी के
घर में तीव्र अग्नि प्रज्वलित हो उठी है। वह आग फैलते हुए हमारे घर तक आ पहुँची और
हमारे गृह का एक भाग उसकी लपटों की चपेट में आ गया। किंतु मैं उस अग्नि को शमन
करने के बजाए उसे और प्रबल करने का प्रयास कर रहा हूँ। उसी क्षण, पिताजी ने मुझे सचेत करते हुए
कहा, "अग्नि को और अधिक भड़काओ मत, अन्यथा छत गिर जाएगी और उसके ऊपर रखा बहुमूल्य सामान भस्म
हो जाएगा। यह हमारे लिए अत्यंत घातक एवं अपूरणीय क्षति सिद्ध होगा।
स्वप्न का अर्थ: यह स्वप्न एक चेतावनी के रूप
में लिया जा सकता है। इसका तात्पर्य यह है कि स्वप्नद्रष्टा को अपने पूर्व व्यवहार
पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, विशेष रूप से यदि वह व्यवसाय से संबद्ध है और किसी अनुचित
विचारधारा या निर्णय पर अडिग बना हुआ है।
स्वप्न का संदेश यह है कि उसे
अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन लाना चाहिए तथा उन त्रुटियों को स्वीकार करना चाहिए, जो उसके व्यवसायिक निर्णयों
या आचरण में सम्मिलित हो सकती हैं। अन्यथा, यह हठधर्मिता और अनुचित कार्यप्रणाली भविष्य में अधिक हानि
या अवरोध उत्पन्न कर सकती है।
स्वप्न: मैं अक्सर मोराकबा करके सोती हूँ। एक रात मैंने स्वप्न में देखा
कि मेरी चार वर्ष की बच्ची है। मेरी भाभी कह रही हैं कि इसे मारो, यह सुंदर नहीं है। मैं अपनी
बच्ची के हाथ पकड़ लेती हूँ, लेकिन भाभी उसके हाथ काट देती हैं और फिर उसके बाजू भी काट
देती हैं।
थोड़ी देर बाद मैं देखती हूँ
कि उसके बाजू ठीक हैं, लेकिन एक हाथ कटा हुआ है और दूसरे हाथ में केवल तीसरी उंगली
और अंगूठा बचा है। मुझे भय महसूस होता है और मैं रोने लगती हूँ। मैं दुखी होकर
कहती हूँ कि मुझसे कितनी बड़ी भूल हो गई, मैं खुद पास बैठकर अपनी बच्ची के हाथ कटवाने की गवाह बनी।
व्याख्या: स्वप्न में चुगली (परनिंदा) और हर छोटी बात पर क्रोध करने
की प्रवृत्ति के चिह्न प्रकट किए गए हैं। अचेतन ज़ेह्न ने इस पर तीव्र विरोध
व्यक्त किया है। यदि अचेतन ज़ेह्न की इस चेतावनी को अनदेखा किया गया, तो आगे चलकर गंभीर मानसिक
अशांति और विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है।
स्वप्न: पिछले सप्ताह से मैंने
प्रतिदिन प्रातःकाल (फज्र) के समय मोराकबा आरंभ कर दिया है।
परसों रात्रि मैंने स्वप्न में देखा कि मैं कराची जा रहा हूँ। मार्ग में कुछ लोग
मिलते हैं, जो मेरे शरीर पर अनेक छुरियाँ चलाते हैं। मैं रक्तरंजित हो जाता हूँ। इसके
पश्चात वे मुझे किसी स्थान पर बंद कर देते हैं। जब उन्होंने मुझ पर छुरियाँ चलाईं, तो मैंने अत्यधिक चीख-पुकार की, अत्यंत रोया, किंतु मेरे आँसू नहीं गिरे।
जिस स्थान पर मैं छिपा हुआ था, वहाँ एक अन्य व्यक्ति भी
उपस्थित था, जो इस हमले से बच गया था। उस व्यक्ति ने एक खच्चर का वध किया और उसके मांस के
टुकड़े मेरे हाथों में देता रहा। इसके पश्चात मैंने देखा कि एक विशाल जंगल है, जिसमें भालू, सिंह, चीते तथा कुत्ते हैं, जो मेरे पीछे दौड़ रहे हैं, किंतु मैं तीव्र गति से भागता
हूँ और अंततः उड़ने लगता हूँ। जब मैं पुनः धरती पर आता हूँ, तो यह देखकर विस्मित हो जाता
हूँ कि मेरे पीछे कोई पशु नहीं है।
मैं एक काँटेदार वृक्ष पर
चढ़ता हूँ, तभी एक विशाल भालू वहाँ आ जाता है और प्रतीक्षा करता है कि मैं नीचे उतरूँ। जब
मैं वृक्ष की चोटी तक पहुँचता हूँ, तो वहाँ मुझे एक हाथी दिखाई देता है। मैं पुनः पृथ्वी पर
देखता हूँ, तो एक व्यक्ति को आता हुआ पाता हूँ। उस व्यक्ति को देखते ही हाथी भयभीत होकर
भाग जाता है, किंतु भालू वहीं खड़ा रहता है।
मैं नीचे उतरकर एक तीक्ष्ण
धारवाली लोहे की छुरी उठाता हूँ और भालू पर प्रहार करता हूँ, जिससे वह भाग जाता है। इसके
पश्चात, मैं पुनः मुल्तान लौट आता हूँ।
व्याख्या: स्वप्न में प्रदर्शित समस्त
दृश्य मानसिक अस्थिरता, असुरक्षा की भावना, असंख्य उलझनों एवं स्वास्थ्य संबंधी विकारों को इंगित करते
हैं। ये समस्त असंतुलन इस कारण उत्पन्न हुए हैं कि स्वप्नद्रष्टा अत्यधिक भावुक
प्रवृत्ति के हैं। जीवन में संतुलन का अभाव परिलक्षित होता है। आहार-विहार में असावधानी के संकेत
स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होते हैं।
स्वप्न: मैं लगभग प्रतिदिन नियमित रूप
से मुराक़बा करती हूँ और यथासंभव इसे कभी नहीं छोड़ती। मैंने एक स्वप्न देखा है, जिसकी व्याख्या मैं आपसे
जानना चाहती हूँ। मैंने देखा कि रात्रि का समय है, आकाश हल्के नीले रंग का है।
जब मैं आकाश की ओर देखती हूँ, तो सफेद-सफेद तारों की झिलमिलाहट दृष्टिगोचर होती है। इन्हीं तारों
के मध्य एक अत्यंत विशाल चंद्रमा स्थित है। चंद्रमा के समीप एक छोटी-सी परी विद्यमान है, जो तारों से सुसज्जित वस्त्र
धारण किए हुए है। उसके सिर पर तारों से निर्मित एक दिव्य मुकुट सुशोभित है और उसके
हाथ में एक श्वेत छड़ी है, जिसके शीर्ष पर भी तारे जड़े हुए हैं। वह मेरी ओर देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रही है।
व्याख्या: बचपन से ही आपको अत्यधिक
सोचने की आदत रही है। इस प्रवृत्ति के कारण आपकी संवेदनशीलता असामान्य रूप से बढ़
गई है, जिसके परिणामस्वरूप आप अक्सर मानसिक असंतोष और उदासी का अनुभव करती हैं। जीवन
आपको कष्टों का भार प्रतीत होता है। जब मनोभाव अत्यधिक बोझिल हो गए और स्नायविक
तंत्र (नर्वस सिस्टम) थकावट महसूस करने लगा, तो ज़ेह्न ने इस थकान को दूर करने के लिए आपको यह स्वप्न
दिखाया, जिससे मानसिक भार कुछ हल्का हो सके और मनोवैज्ञानिक संतुलन पुनः स्थापित हो
जाए। स्वप्न में जिन प्रकार की अवचेतन प्रवृत्तियाँ (लाशौरी तहरीकात) विद्यमान हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि यह
स्वप्न आपने काफी समय पूर्व देखा था। स्वप्न में मुराक़बा से संबंधित कोई विशेष
अवस्था या अनुभूति परिलक्षित नहीं होती।
स्वप्न: जब से मैंने मोराकबा करना प्रारंभ किया है, मैं स्वप्न में निम्नलिखित
आकृतियाँ बार-बार देखता हूँ। जब भी ये आकृतियाँ प्रकट होती हैं, मुझ पर भय और आतंक हावी हो
जाता है। कभी-कभी ये आकृतियाँ वृक्ष का स्वरूप धारण कर लेती हैं।
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आकृति क्रमांक 1 
आकृति क्रमांक 2 
आकृति क्रमांक 3 
स्वप्नफल (ताबीर): तीनों आकृतियाँ उन निकट
मित्रों का प्रतीक हैं जो परस्पर घनिष्ठ संबंध रखते हैं। इनसे आपकी भेंट या तो
प्रतिदिन होती है या सप्ताह में कई बार। इन मित्रों की संख्या छह या सात है। इनमें
से तीन मित्र सज्जन, निष्ठावान और सौम्य स्वभाव के हैं, जबकि शेष तीन या चार मित्र
ऐसे हैं जो अनुचित परामर्श देते हैं, गलत मार्ग पर ले जाते हैं और आपको संकट में डाल सकते हैं।
परामर्श
गलत परामर्श देने वालों की
बातों को समझना और सतर्क रहना आवश्यक है। यदि ऐसा नहीं किया गया तो अनिष्ट होने की
संभावना है।
संकेत:
मुझे अलौकिक विधाओं को सीखने
का गहरा रुझान है। मैं लंबे समय से प्रतिदिन रात्रि में मोराकबा कर के विश्राम करती हूँ। मैंने कुछ स्वप्न देखे
हैं, जिनकी व्याख्या जानना चाहती हूँ।
स्वप्न: 1. मैं अपने घर के एक कक्ष में
खड़ी हूँ और हमारे कक्ष के नीचे स्थित भूतल कक्ष में हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ऊँचे स्वर में पवित्र क़ुरआन
का पाठ कर रहे हैं। मैं स्वयं से कहती हूँ कि हज़रत (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की वाणी कितनी मधुर और सुरीली
है।
स्वप्न 2. : मैंने देखा कि मैं अपने
विद्यालय में खड़ी हूँ। श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, मेरे निकट स्वयं श्रीमान
मुहम्मद रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) खड़े हैं। उनके दाएँ-बाएँ भी कोई व्यक्ति खड़ा है। समीप ही एक विशाल दीप
प्रज्वलित है। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कहते हैं, "मेरे प्रस्थान का समय निकट आ गया है और देवदूत स्वर्ग से
अवतरित हो रहे हैं।" मैं विलाप करते हुए कहती हूँ, "आप ऐसा न कहें।"
इसके पश्चात, मैं उनका भुजा पकड़ती हूँ और
उन्हें दूसरे कक्ष में ले जाती हूँ। उनके साथ वे दोनों व्यक्तित्व भी होते हैं, जो उनके दाएँ-बाएँ खड़े थे।
स्वप्न 3.: शाबान मास में मैंने देखा कि
मैं स्नान करके अपने घर की छत पर टहल रही हूँ। अचानक आकाश में एक बादल प्रकट होता
है, जो पूर्णतः धवल (श्वेत) होता है। उस बादल से एक दिव्य प्रकाश निकलता है और उत्तर दिशा में स्थित दीवार
पर पड़ता है। उस प्रकाश से दीवार पर अत्यंत विशाल अक्षरों में कलिमा तैय्यबा (पवित्र वचन) लिखा जाता है। मैं बारंबार ऊँचे स्वर में
कलिमा तैय्यबा का उच्चारण करती हूँ और तत्पश्चात अपनी माता एवं बहन को पुकारती
हूँ। किंतु जैसे ही वे दोनों वहाँ आती हैं, वह दिव्य प्रकाश विलुप्त हो जाता है।
स्वप्न 4. : कुछ दिनों पूर्व मैंने स्वप्न
में देखा कि रात्रि का समय है और आकाश में पूर्ण चंद्र प्रकाशित है। हम सभी
परिवारजन छत पर उपस्थित हैं। सभी कह रहे हैं कि चंद्रमा की चाँदनी अत्यंत मनोहर
प्रतीत हो रही है। मुझे भी चंद्र अत्यंत आकर्षक लगता है। जैसे ही मैं अपना हाथ चंद्रमा
की ओर बढ़ाती हूँ, वह मेरे हाथ में आ जाता है।
व्याख्या: आपके भीतर बचपन से ही
आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता जाग्रत है। परमात्मा आपकी इन आध्यात्मिक
क्षमताओं का उपयोग करके परम पूज्य श्री मुहम्मद रसूल अलैहिस्सलाम के दिव्य संदेश
के प्रसार हेतु आपको माध्यम बनाना चाहता है। इंशा अल्लाह, आप इस महान कार्य में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी। उचित होगा कि आप किसी अनुभवी आध्यात्मिक मार्गदर्शक को अपना
गुरु बनाएँ, जो अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों और मार्ग के उतार-चढ़ाव से भली-भाँति परिचित हो। मेरी
प्रार्थना है कि ईश्वर आपको अपनी सृष्टि की सेवा हेतु शांति और सुख का माध्यम
बनाए। आपके द्वारा संपूर्ण जगत में रसूल अलैहिस्सलाम का संदेश प्रसारित हो। (आमीन या रब्बल आलमीन) स्वप्न की यही व्याख्या है, जो प्रस्तुत कर दी गई है।
स्वप्न: ध्यान करने के पश्चात मैं सो
गई। स्वप्न में मैंने देखा कि मेरा पति, एक पुरुष और एक महिला—हम चारों कहीं जा रहे हैं। वह
महिला हमें लेकर एक रेगिस्तान में पहुँची और मेरा हाथ पकड़कर दौड़ने लगी। हम गोल-गोल चक्कर लगाते हुए दौड़ रहे
थे और जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे रेत में धँसते जा रहे थे। फिर मुझे अनुभव हुआ कि केवल
हम दो ही नहीं, बल्कि वहाँ हजारों स्त्री-पुरुष उपस्थित हैं। सभी ने एक-दूसरे का हाथ थामा हुआ है और
गर्दन तक रेत में धँसे होने के बावजूद भी दौड़ रहे हैं। इस दौड़ में मुझे असीम
आनंद और परमानंद का अनुभव हो रहा था, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती। अचानक मुझे आभास हुआ कि हम
काबा की परिक्रमा कर रहे हैं। चारों ओर अंधकार था, किंतु मुझे यह भली-भाँति ज्ञात था कि हमारे
परिवार के लोग भी वहाँ उपस्थित हैं। हालाँकि, कौन-कौन था, इसका स्पष्ट बोध नहीं था, केवल मेरी मासी (खाला) की उपस्थिति का आभास हो रहा
था। उसी क्षण एक सफेद कबूतर उड़ता हुआ आया और हर दिशा में शुभ्र ज्योति फैल गई।
गहरे अंधकार में केवल वही कबूतर उड़ता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा था। तभी मेरी मासी की
आवाज आई: "जो कबूतर तुम्हारे साथ था, क्या तुम्हें पता है वह कौन था?" मैंने प्रश्न किया, "कौन था?" तो उन्होंने उत्तर दिया: "वे पूज्य हजरत मौलाना मोहम्मद
ज़करिया (रहमतुल्लाह अलैह) थे।" बस, उसी क्षण मेरी नींद खुल गई। यह छः माह के भीतर दूसरी बार है जब मैंने उन्हें
स्वप्न में देखा है। इससे पहले उनके समाधि-स्थल (मज़ार) के दर्शन हुए थे।
व्याख्या: हजरत मौलाना ज़करिया (रहमतुल्लाह अलैह) एक उच्च कोटि के आध्यात्मिक
गुरु (क़ुत्ब-ए-इरशाद) थे। आपके स्वप्न में उनकी दिव्य आत्मा का दर्शन होना इस बात का संकेत है कि
आपको उनसे निश्चित रूप से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होगा। उचित होगा कि आप उनके
प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए पवित्र क़ुरआन का पाठ करके और भोजन बनाकर पुण्य
अर्पित करें (ईसाले सवाब करें)।
स्वप्न 1: मैंने रात्रि में सोने से
पूर्व और प्रातः कालीन फज्र के समय—दोनों अवसरों पर मुराक़बा करना प्रारंभ किया हुआ है। स्वप्न
में देखा कि मैं सीढ़ियाँ चढ़ रहा हूँ, जो ऊँचाई की ओर जा रही हैं। उस ऊँचाई पर किसी पहुँचे हुए
संत (बुज़ुर्ग) की समाधि (मज़ार) स्थित है। कुछ समय पश्चात् पुनः वैसा ही स्वप्न देखा, मैं सीढ़ियाँ चढ़ रहा हूँ। इस बार मैं समस्त सीढ़ियाँ पार
कर चुका हूँ। जब सीढ़ियाँ समाप्त हुईं, तो मेरे समक्ष किसी संत की समाधि थी। वहाँ का वातावरण
अत्यंत आध्यात्मिक और आत्मा को पुलकित करने वाला था। मैं उस दरगाह (दरबार) में प्रवेश करना चाहता था, किंतु उसी क्षण मेरी नींद खुल
गई।
२. इस स्वप्न से बहुत पहले, मैंने देखा था कि कुछ दिव्य
पुरुष (बुज़ुर्ग हस्तियाँ) एक जीप में आकाश से नीचे उतर रहे हैं। उनके मुखमंडल तेजस्वी
(नूरानी) थे। उन्होंने मेरी ओर दृष्टि डाली, फिर आगे बढ़ गए। कुछ समय पश्चात वे पुनः लौटे और उसी जीप
में आकाश की ओर वापस चले गए।
३. दो-तीन वर्ष पूर्व, जब मैं कराची में था, एक दिन प्रातः फज्र की नमाज़
अदा करके मस्जिद से घर लौटा और आते ही निद्रा में लीन हो गया। स्वप्न में देखा कि
एक विशाल सर्प फुँफकारते हुए मेरी ओर आ रहा है। मैंने शीघ्रता से उस पर एक बड़ा
टोकरा रख दिया। यह टोकरा शहतूत की टहनियों से निर्मित था। टोकरे के उलटते ही, उसके भीतर से तीव्र प्रकाश की
किरणें फूटने लगीं।
व्याख्या: आपकी रुचि पारलौकिक ज्ञान (आध्यात्मिकता) में है। आपकी आत्मा आपको
इंगित कर रही है कि यदि आप एकाग्रता और समर्पण के साथ प्रयास करें, तो शीघ्र ही सफलता प्राप्त कर
सकते हैं। जिस कालावधि में आपने "सर्प और टोकरी" संबंधी स्वप्न देखा था, उस समय आपके कंठ-मंडल में विकार विद्यमान था। यदि वर्तमान में भी गले में
संक्रमण अथवा शीत-जनित विकार बना हुआ है, तो इसे उपेक्षित न करें। उचित सावधानी तथा सम्यक् उपचार
कराना नितांत आवश्यक है। जब कंठ-मंडल (टॉन्सिल) बार-बार संक्रमणग्रस्त होते हैं, तो उनमें पीव संचित हो जाती है। यह पीव आहार के साथ उदर में
प्रविष्ट होकर पाचन तंत्र को बाधित करती है तथा रक्त की शुद्धता को प्रभावित करती
है। परिणामस्वरूप विविध प्रकार के रोग उत्पन्न हो सकते हैं। मेरे अनुभव के अनुसार, यदि कंठ-मंडल की यह समस्या दीर्घकाल
तक बनी रहे, तो यह अंततः पक्षाघात (पोलियो) जैसी गम्भीर अवस्था को जन्म दे सकती है।
"रंग एवं प्रकाश चिकित्सा" के अनुसार, पीली किरणों का तेल टॉन्सिल्स
के उपचार में अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।
स्वप्न: हर रात सोने से पहले मैं अपने
पीर और मार्गदर्शक (शेख) का मुराक़बा करती हूँ। एक रात स्वप्न में देखा कि श्रद्धेय गुरुजी (मुरशिद करीम) हमारे घर पधारे हैं। मैं
अत्यंत प्रसन्न होती हूँ और ज़ेह्न करता है कि पूरे नगर को यह शुभ समाचार दे दूँ
कि गुरुजी हमारे घर आए हैं। छत पर एक गमले में गुलाब का पौधा लगा हुआ है, जिसकी शाखाएँ आँगन में फैली
हुई हैं। हम बैठकर वार्तालाप करने लगते हैं। फिर मैं अपनी सभी सखियों को यह बताती
हूँ कि गुरुजी हमारे घर आए हैं, और वे सभी उनसे मिलने चली आती हैं। मेरी माता जी गुरुजी से कहती
हैं कि मैं इन सभी को कराची भेजूँगी। वे उत्तर देते हैं, "निश्चय ही आएँ, हमारे लोग स्टेशन पर उन्हें
लेने पहुँचेंगे।" उन व्यक्तियों की पहचान यह बताई जाती है कि वे जैतून का तेल लिए होंगे। इसके पश्चात, मैं, मेरे गुरुजी और मेरी छोटी बहन, हम तीनों एक संबंधी के घर
जाते हैं। वहाँ पहुँचकर मैं उत्साहपूर्वक कहती हूँ, "देखो, कौन आया है!" फिर वे सभी हमसे मिलते हैं। स्वप्न समाप्त होने पर, जब मेरी माता जी ने मुझे
जगाया, तो प्रातः की नमाज़ का समय हो चुका था। मैंने उठकर नमाज़ अदा की।
स्वप्न की व्याख्या: यह स्वप्न उसी रूप में सत्य
है, जैसा आपने देखा है। आपकी श्रद्धा और निष्ठा ने आपके आंतरिक चक्षु (आध्यात्मिक दृष्टि) को खोल दिया है। यह संकेत है
कि आप पर आध्यात्मिक कृपा हो रही है। यदि आप इसी पथ पर अग्रसर रहती हैं, तो आपको आध्यात्मिक उन्नति
प्राप्त होगी। ईश्वर आपको दिन दूनी, रात चौगुनी आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करें। आमीन!
मुराक़बा करने के पश्चात् मैं
गहरी निद्रा में चला गया। स्वप्न में मैंने देखा कि एक विशाल एवं ऊँचे वृक्ष की
शाखाओं पर दो सिंह गंभीर मुद्रा में बैठे हैं। यह दृश्य देखकर मैंने मामा जान से
आग्रह किया, "कृपया शीघ्र बंदूक ले आइए, वृक्ष पर दो सिंह विराजमान हैं!" मामा बंदूक की तलाश करने लगे, किंतु इससे पूर्व कि वे उसे
प्राप्त कर पाते, दोनों सिंह वृक्ष से उतरकर बाग़ की ओर प्रस्थान कर गए। उसी समय मेरी दो ममेरी बहनें
बाग़ में प्रवेश करने को तत्पर होती हैं। मैं उन्हें सावधान करते हुए कहता हूँ, "वहाँ मत जाओ, यह संकटपूर्ण हो सकता है!" किंतु वे मेरी चेतावनी को
उपेक्षित कर बाग़ में चली जाती हैं। तभी, एक सिंह अचानक छलांग लगाकर मेरी एक बहन पर आक्रमण करता है
और उसके चरण को अपने प्रचंड जबड़ों में पकड़ लेता है। इस भयावह दृश्य को देखकर अनेक
लोग एकत्र हो जाते हैं, किंतु कोई भी भयवश सिंह का सामना करने का साहस नहीं कर
पाता। परिस्थिति विकट हो रही थी, किंतु मैंने धैर्य नहीं खोया और साहसपूर्वक आगे बढ़कर अपनी
बहन को सिंह के चंगुल से मुक्त करा लिया। उसकी दृष्टि कृतज्ञता से भर उठी।
तत्पश्चात्, मैंने उसे अपनी गोद में उठाया और सुरक्षित रूप से मामी के गृह पहुँचाया।
स्वप्न व्याख्या: मनुष्य प्रकृति के विभिन्न
तत्वों का समायोजन है। इन तत्वों में एक विशिष्ट क्रम और संतुलन होता है, जिसे ईश्वर ने निर्धारित किया
है।
"الَّذِي خَلَقَ فَسَوَّىٰ، وَالَّذِي قَدَّرَ فَهَدَىٰ" (सूरह अल-आ'ला 87:2-3)
"जिसने सृष्टि की, फिर उसे संतुलित किया। और
जिसने उसे एक निश्चित व्यवस्था दी और फिर उसे मार्ग दिखाया।"
अर्थात, सृष्टि में पूर्ण संतुलन
स्थापित किया गया है और हर तत्व के लिए एक निश्चित मार्ग निर्धारित कर दिया गया
है। इसी संदर्भ में, प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ, जिनमें लैंगिक झुकाव भी
सम्मिलित हैं, ईश्वर का एक दिव्य वरदान हैं। किन्तु, इन प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति का एक उचित और निर्धारित
मार्ग होता है। समय से पहले इन पर अनावश्यक रूप से विचार करना या अत्यधिक ध्यान
देना न केवल व्यर्थ प्रयास है, बल्कि यह समय की बर्बादी और जीवन के लिए हानिकारक भी हो
सकता है। जो भी वस्तु उचित समय पर, अनुकूल परिस्थितियों में और निर्धारित मार्ग के अनुसार
प्रस्तुत हो, वही स्वीकार करने योग्य होती है। मनुष्य को इच्छाएँ रखने का अधिकार अवश्य है, परन्तु अपनी इच्छाओं को अन्य
व्यक्तियों पर थोपने का कोई अधिकार नहीं। यही कुरआन का मार्गदर्शन है, और इसी आधार पर नैतिक मूल्यों
का निर्धारण किया गया है। इन सिद्धांतों के प्रति पूर्ण समर्पण ही उचित मार्ग है। स्वप्न के समस्त प्रतीक
इन्हीं वास्तविकताओं की ओर संकेत करते हैं।
मुराक़बा करने के उपरांत मैं
शयन हेतु लेट गया। स्वप्न में देखा कि आकाश में "अल्लाह" और "मुहम्मद" के नाम प्रकाशित हो रहे हैं। इन दोनों पावन नामों के चारों ओर पुष्पों की
आकृतियाँ इस प्रकार उभर रही हैं, जैसे गतिशील मेघ विभिन्न आकारों में परिवर्तित होते हैं।
मेरे दाहिने ओर एक सम्माननीय
पुरुष खड़े थे। मैंने उनसे कहा कि यदि शासन या जनसामान्य की ओर से इस दृश्य की
पुष्टि की आवश्यकता पड़े, तो मैं साक्ष्य प्रदान करूँगा कि हाँ, मैंने आकाश में इन दिव्य
नामों को स्पष्ट रूप से देखा है।
टिप्पणी: मैं प्रायः अपने स्वप्नों में
स्वयं को नमाज़ अदा करते एवं वुज़ू (अभिषेक) करते हुए देखता हूँ।
स्वप्न व्याख्या एवं विश्लेषण: आकाश में अल्लाह एवं हज़रत
मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के पवित्र नामों का
दृष्टिगोचर होना, सच्चे एवं निष्कलंक आस्था का प्रतीक है। यह स्वप्न आत्मिक आनंद एवं मानसिक
संतोष को भी इंगित करता है, जो जीवन में सफलता तथा उज्ज्वल भविष्य की शुभ सूचना देता
है।
स्वप्न: मैं ग्यारहवीं कक्षा का छात्र
हूँ और लगभग तीन महीने से ध्यान (मोराक़बा) कर रहा हूँ। एक रात मैंने एक अद्भुत स्वप्न देखा, जिसकी व्याख्या जानना चाहता
हूँ।
स्वप्न में, मैं अपने आचार्य से शिक्षा
प्राप्त कर लौट रहा था। संध्या का समय था। मार्ग में मेरी दृष्टि उत्तर-पूर्वी आकाश की ओर गई, जहाँ मुझे अनेक रंग-बिरंगे चंद्रमा दिखाई दिए। उन
पर "فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ" (अर्थ: "तो तुम अपने प्रभु की कौन-कौन सी नेमतों को झुठलाओगे?")
लिखा हुआ था। यह दृश्य देखकर मेरा हृदय आनंद से भर गया। मैं तत्काल अपने
आचार्य को यह समाचार देने के लिए मुड़ा। जैसे ही मैंने पीछे देखा, दक्षिण-पूर्वी आकाश में मेरी दृष्टि
गई, जहाँ सुंदर नीले रंग के चंद्रमा प्रकाशित थे। उन पर "مَنْ غَشَّ فَلَيْسَ مِنَّا" (अर्थ: "जो छल-कपट करे, वह हममें से नहीं") लिखा था।
यह दृश्य देखते ही मैं
शीघ्रता से अपने आचार्य के निवास स्थान की ओर दौड़ा और सारा वृत्तांत सुनाया। वे
मेरे साथ बाहर आए, किंतु वे यह दृश्य देख नहीं सके। उसी क्षण मेरी नींद टूट गई। मेरा हृदय पुनः
इस दृश्य का अनुभव करने हेतु लालायित था, किंतु दुबारा निद्रा नहीं आई।
प्रातः मैं अपने आचार्य के
पास गया और उन्हें यह स्वप्न सुनाया। उन्होंने इसे उज्ज्वल भविष्य की शुभसूचना
बताया।
व्याख्या: स्वप्न शास्त्र के अनुसार, जो व्याख्या सर्वप्रथम दी जाए, वही प्रभावी होती है, क्योंकि वह अवचेतन ज़ेह्न (अवचेतन मस्तिष्क) पर गहरी छाप छोड़ती है। अतः
इस स्वप्न की वही व्याख्या मान्य होगी, जो आचार्य ने दी है। पैगंबर मुहम्मद ﷺ का कथन है कि स्वप्न केवल उसी
व्यक्ति से साझा करना चाहिए, जो स्वप्न विज्ञान की गूढ़ताओं से परिचित हो। स्वप्न
विज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान का एक विशिष्ट भाग है, जो केवल अध्ययन से अर्जित
नहीं किया जा सकता, बल्कि यह पैगंबर मुहम्मद ﷺ की कृपा और आशीर्वाद से प्राप्त होने वाला दिव्य
उपहार (Gift) है।
स्वप्न: मुराक़बा करने के बाद मैं सो
गई। स्वप्न में मैंने देखा कि मैं अपनी नानी के घर में हूँ और आकाश की ओर देख रही
हूँ। आकाश असंख्य जगमगाते तारों से भरा हुआ है। उनमें से एक तारा, जो गहरे लाल रंग का और अत्यंत
चमकदार है, मेरी दृष्टि को आकर्षित करता है। मैं उसे बड़े ध्यान से देख रही होती हूँ कि
अचानक वह टूटकर मेरे चरणों में आ गिरता है। यह दृश्य देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह
जाते हैं। इसके पश्चात, वह तारा धीरे-धीरे रूपांतरित होकर एक धूसर रंग के पवित्र और प्राचीन
पात्र (कटोरा) में परिवर्तित हो जाता है, जिससे एक अलौकिक आभा प्रकट होती है।
स्वप्न की व्याख्या: यह स्वप्न भविष्य से संबंधित
है और संकेत करता है कि वैवाहिक जीवन सुखमय रहेगा। इसके अतिरिक्त, मातृकुल (ननिहाल) से संबंधित कोई आत्मा भौतिक
स्वरूप में प्रकट होकर पारिवारिक प्रतिष्ठा और गौरव का कारण बनेगी। ईश्वर करे कि
यह स्वप्न साकार हो तथा पारिवारिक मतभेद इस शुभ संकेत के मार्ग में बाधा न बनें।
स्वप्न: पिछले एक माह से मैं शयन से
पूर्व मुराक़बा कर रहा हूँ। इस अवधि में
मैंने अनेक स्वप्न देखे।
प्रथम स्वप्न में, मैंने देखा कि मेरे पिता के
पास एक व्यक्ति आया, जो पूर्णतः श्वेत वसन धारण किए हुए था। वह निःशब्दता से
हमारी अलमारी से अनेकों दस्तावेज़ (कागज़ के टुकड़े) निकाले और उन्हें अपने वस्त्र में रखकर चला गया। विस्मय की
बात यह थी कि मेरे पिता ने भी उस आगंतुक से कोई प्रश्न नहीं किया। ठीक उसी क्षण
उनकी निद्रा भंग हो गई।
द्वितीय स्वप्न में, मैंने देखा कि सांगढ़ नगर में
नवाबशाह मार्ग पर एक विशाल वाणिज्यिक संकुल (व्यापार केंद्र) पूर्ण रूप से निर्मित हो चुका
है। मैं उस भव्य संरचना को देखकर चकित था। मेरी तीव्र अभिलाषा थी कि मैं उसके भीतर
प्रवेश करूँ और ऊर्ध्वगमन कर उसका अवलोकन करूँ, किंतु इसी विचारमंथन में मेरी
निद्रा भंग हो गई। प्रातः जब मैं उस मार्ग पर गया, तो यह देखने की उत्कंठा थी कि कहीं रात्रि में यह भव्य
इमारत निर्मित तो नहीं हो गई, परंतु वहाँ कोई ऐसी संरचना नहीं थी।
स्वप्न का अर्थ एवं विश्लेषण: प्रथम स्वप्न में कागज़ के
टुकड़े आय के प्रतीक हैं, जो अप्रत्याशित रूप से प्राप्त होगी और आर्थिक रूप से
महत्वपूर्ण होगी। द्वितीय स्वप्न भी इसी तथ्य की पुनरावृत्ति करता है, जिसका तात्पर्य है कि ऐसे
अवसर प्राप्त होंगे जो वित्तीय लाभ का कारण बनेंगे।
स्वप्न: मैं प्रत्येक रात नियमित रूप
से मुराक़बा करता हूँ। पिछली रात मुराक़बा के उपरांत सो गया और स्वप्न में देखा कि
हम चार मित्र एक जलयान (जहाज़) में यात्रा कर रहे हैं, और मैं उसका कप्तान हूँ। अचानक समुद्र सूख गया और हमारा
जहाज़ एक द्वीपनुमा टीले पर ठहर गया। हम सभी आश्चर्यचकित थे कि जल कहाँ चला गया और
अब जहाज़ कैसे आगे बढ़ेगा? एक मित्र ने कहा, "वर्षा होगी, जल पुनः एकत्र होगा और तब जहाज़ चल सकेगा।" कुछ समय पश्चात, आकाश में बादल घिर आए, तेज़ वायु प्रवाहित होने लगी, बादलों के परस्पर टकराने से
विद्युत चमकी और फिर वर्षा होने लगी। जल इतनी अधिक मात्रा में बरसा कि शुष्क
समुद्र पुनः तरल हो गया और मैं सफलतापूर्वक जलयान को गंतव्य की ओर अग्रसर करने में
सक्षम हो गया।
स्वप्न की व्याख्या एवं
विश्लेषण: यह स्वप्न दर्शाता है कि ज़ेह्न में कई संकल्प विद्यमान हैं, क्योंकि चार मित्र वस्तुतः
विभिन्न संकल्पों के प्रतीक हैं। ये सभी संकल्प एक ही उद्देश्य से संबंधित हैं, क्योंकि सभी को एक ही जलयान
में सवार हैं। आगे ये भी पता चलता है कि लक्ष्य की प्राप्ति में गंभीर बाधाएँ आईं, और परिस्थितियाँ इतनी विषम हो
गईं कि निराशा की स्थिति उत्पन्न हो गई। किंतु तत्पश्चात दिव्य कृपा प्राप्त हुई
और धीरे-धीरे परिस्थितियाँ अनुकूल होने लगीं। स्वप्न में वर्षा "दैवीय सहायता" का प्रतीक है, जो समय-समय पर आती है और कठिनाइयों
को सरल बनाती है। अंततः, जब जलयान को पुनः गतिमान दिखाया गया, तो यह इंगित करता है कि विपत्तियों के उपरांत मार्ग प्रशस्त
होंगे और लक्ष्य प्राप्ति का अवसर अवश्य प्राप्त होगा।
ख्वाजा शम्सुद्दीन अजीमी
ग़ार-ए-हिरा के नाम
जहाँ अंतिम युग के संदेशता (ﷺ) ने (रेहाना)किया
और हज़रत जिब्राईल, क़ुरआन की प्रारंभिक
आयतों को लेकर पृथ्वी पर अवतरित हुए।