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यह सम्पूर्ण
सृष्टि एक सामूहिक चेतना (इज्तेमाई शाऊर) से परिपूर्ण है। प्रत्येक कण, तारा, ग्रह, पशु-पक्षी, जीव-जंतु, मानव, जिन्नात और देवदूत सभी को जीवन की
प्रेरणाएँ एक ऐसे महासचेतन स्रोत से प्राप्त होती हैं, जो अपने भीतर
समस्त ब्रह्माण्डीय ज्ञान का पूर्ण भंडार संजोए हुए है। आधुनिक युग की
भाषा में इसे उस सुपर-कंप्यूटर के समान कहा जा सकता है जिसमें सृष्टि
से सम्बन्धित सम्पूर्ण अभिलेख (रिकॉर्ड) संचित है।
मुराक़बा के
माध्यम से इस महासचेतना से संपर्क स्थापित किया जा सकता है। इस संपर्क का एक
माध्यम "ध्वनि" है। इस दिव्य ध्वनि
को पारिभाषिक रूप में ग़ैबी आह्वान (हातिफ़-ए-ग़ैबी) कहा जाता है, जिसका अर्थ है "ग़ैब (अदृश्य जगत) से बुलाने वाला"। यह ध्वनि निरंतर
समस्त ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होती रहती है। ऐसा व्यक्ति, जो अपने चित्त को
एकाग्र करने में समर्थ है तथा आन्तरिक मलिनताओं से मुक्त है, इस ध्वनि की ओर
सजग होकर उसे सुन सकता है। यदि वह कोई
प्रश्न करता है तो उसे उत्तर भी प्राप्त हो सकता है।
संपूर्ण ब्रह्माण्ड
में सबसे पहले ध्वनि (नाद) का प्राकट्य होता
है। मानव इंद्रियों में भी सर्वप्रथम श्रवण (सुनने की क्षमता) ही सक्रिय होती
है। जब श्रवण
क्रियाशील होता है, तो उसके साथ ही दृष्टि (दर्शन) का एक
केंद्रबिंदु निश्चित होता है, और यही वह क्षण
होता है जब व्यक्ति ध्वनि में निहित ज्ञान को देखने लगता है। इसके उपरान्त
घ्राण (शामकेंद्रित सूंघने की शक्ति) तथा
स्पर्शेंद्रिय (लाघव-लाघव अनुभूतियाँ) क्रमशः गतिशील
होती हैं। इस स्तर पर अनुभूति का चक्र पूर्ण हो जाता है।
इस प्रकार, मानव जो कुछ
देखता, महसूस करता या अनुभव करता है, वह वस्तुतः
ध्वनि की विस्तारित रूपरेखाएँ और परिवर्धित व्याख्याएँ ही हैं। क़ुरआन मजीद के
अनुसार, सर्वप्रथम "कुन" (हो जा) की पुकार उठी, और संपूर्ण
ब्रह्माण्ड, अपने तमाम आयामों सहित, अस्तित्व में आ
गया। किन्तु उस क्षण तक मख़लूक़ (जीव–सृष्टियाँ) को इंद्रियाँ (ज्ञानेंद्रियाँ) प्राप्त नहीं हुई
थीं۔
ख़ालिक़ (सृष्टिकर्ता) ने जब सृष्टि से
कहा:
"क्या मैं
तुम्हारा रब (पालनहार) नहीं हूँ?"
उस दिव्य ध्वनि
ने सृष्टि को दृष्टि प्रदान की, और दृष्टि की
शक्ति सक्रिय हो गई। दृष्टि के साथ ही अन्य इंद्रियाँ भी जागृत हो उठीं, और सृष्टि ने
देखकर तथा समझकर स्वीकार किया कि निस्संदेह आप ही हमारे सृजनकर्ता हैं। सभी धर्मों
में ध्वनि को प्राथमिकता प्राप्त है। बाइबिल में अंकित है 'ईश्वर ने कहा: प्रकाश हो जाए, और प्रकाश प्रकट
हो गया।
हिन्दू धर्म में “ॐ” की ध्वनि को परम
पवित्र माना जाता है। हिंदू संत-महात्मा कहते हैं
कि आकाश, पृथ्वी और इनके मध्य जो कुछ भी विद्यमान है, वह सब “ॐ” की गूँज है। उनके मत में
समस्त सृष्टि में निरन्तर एक दिव्य ध्वनि प्रवाहित हो रही है जिसे वे आकाशवाणी (आकाशीय उद्घोष) कहते हैं।
सूफ़ी मत में भी
इसी दिव्य ध्वनि का उल्लेख मिलता है जिसे वे "सौते सर्मदी" (सनातन ध्वनि या
ईश्वरीय नाद) कहते हैं। यही वह नाद है
जिसके माध्यम से औलिया (ईश्वभक्त संत) पर इल्हाम (आध्यात्मिक
प्रेरणा) प्रकट होती है। ग़ैबी आह्वान (हातिफ़-ए-ग़ैबी) को सुनने की विधि
इस परकार है।
मोराकबा की स्थिति में बैठकर, दोनों कानों के
छिद्रों को रूई के फाहों से कोमलतापूर्वक बंद कर दिया जाए। इसके उपरान्त साधक को
अपने आंतरिक स्वरूप (आत्मिक अंतःकरण) की ओर उन्मुख
होकर, एक ऐसी दिव्य ध्वनि की कल्पना करनी चाहिए जो
निम्नलिखित ध्वनियों में से किसी एक से समानता रखती हो:
1. मधुर और कोमल
घंटियों की झंकार,
2. मधुमक्खियों की
गुंजन,
3. झरनों की कलकल
अर्थात जल की सतह पर गिरते जल या पत्थरों पर बहते जल की निनाद,
4. बाँसुरी की कोमल
स्वर-लहरी: जब साधक सतत् उस आभ्यंतर ध्वनि पर मुराक़बा
केन्द्रित करता है, तो कुछ काल बाद वह ध्वनि वास्तविक रूप में
श्रवण में आने लगती है। यह ध्वनि अनेक रूपों और रचनाओं में सुनाई देती
है। कालक्रम में, उस ध्वनि में
शब्द और वाक्य भी स्पष्ट होने लगते हैं, और इस अलौकिक
ध्वनि के माध्यम से साधक (साहिबे मोराकबा) पर रहस्य एवं
गुह्य तत्व प्रकट होने लगते हैं।
गूढ़ घटनाओं का
साक्षात्कार होता है और दिव्य लोकों से संपर्क स्थापित हो जाता है। जब साधक अभ्यास
में दक्ष हो जाता है, तो उसे गूढ़ ध्वनि (हातिफ़-ए-ग़ैबी) से संवाद करने का
अवसर प्राप्त होता है और वह उसी ध्वनि से प्रश्नोत्तर भी करने लगता है।
हातिफ़-ए-ग़ैबी से प्रश्न
करने की विधि इस प्रकार है:
जब कोई व्यक्ति
इस योग्य हो जाता है कि वह हातिफ़-ए-ग़ैबी को सुन सके, तो स्वतः ही उसके
भीतर यह सामर्थ्य उत्पन्न हो जाती है कि वह उस ध्वनि से प्रश्न कर सके और उत्तर
प्राप्त कर सके। तथापि व्यावहारिक रूप में इसका तरीका निम्नलिखित है:
जिस विषय में
प्रश्न करना हो, उसे ज़ेह्न ही ज़ेह्न एक-दो बार दोहराएँ।
फिर मुराक़बा की
अवस्था में बैठें और पूरी एकाग्रता के साथ हातिफ़-ए-ग़ैबी की ओर
चित्त को केंद्रित करें।
इस समय ज़ेह्न
में प्रश्न को न लाएँ; केवल अपनी चेतना उस गूढ़ ध्वनि पर स्थिर रखें।
मानसिक एकाग्रता
और मस्तिष्कीय शक्ति की तीव्रता के अनुसार, शीघ्र ही उसी
ध्वनि के माध्यम से उत्तर अंतर्मन में प्रकट हो जाता है।
अल्लाह तआला के
नाम अलीम को एक विशेषता प्राप्त है। अलीम का अर्थ है—ज्ञान रखने वाला।
अलीम की विशेषता के कारण मनुष्य को सभी प्रकार के ज्ञान प्राप्त होते हैं। समस्त
ज्ञान का आधार अस्मा-ए-इलाही (ईश्वरीय नाम / दिव्य नाम) का ज्ञान है।
किसी इस्म (नाम) का सबसे पहला
प्रकट होना तजल्ली (प्रकाश-प्रभा / दिव्य झलक) कहलाता है।
तजल्ली एक ऐसा चित्र (रूप) है जिसमें पूर्ण
अर्थवत्ता के साथ-साथ आकार (रूप-रेखा) और गति भी होती
है। सभी अस्मा (नाम / ईश्वरीय
विशेषताएँ) या सिफ़ात (गुण / विशेषताएँ) की तजल्लियाँ (प्रभाएँ) मनुष्य की आत्मा
के भीतर अंकित होती हैं। ये चिन्ह एक प्रकार का अभिलेख (रिकॉर्ड) होते हैं। जैसे
किसी माइक्रो फ़िल्म में समाहित होता है, वैसे ही मनुष्य
की आत्मा में अस्मा (दिव्य नामों) के सभी चिन्ह
मौजूद होते हैं।
यदि मनुष्य "अलीम" नाम से जुड़ी
चेतना (संबंध) को जगा ले, तो वह सभी
ईश्वरीय नामों की झलकियों का अनुभव कर सकता है। यह जुड़ाव एक तरह की स्मृति होती
है। यदि कोई व्यक्ति मुराक़बा के माध्यम से इस स्मृति को पढ़ने की कोशिश करे, तो वह इसे बोध, अंतःप्रेरणा या
प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में समझ सकता है।
पैग़ंबरों और
संतों ने इस स्मृति को जिस ढंग से पढ़ा, उसे "समझ की शैली" या "तर्ज़-ए-तफ़हीम" कहा जाता है। इसे
आत्मिक यात्रा (सैर) और आंतरिक विजय (फतह) भी कहा गया है। "तफ़हीम" का अर्थ है किसी
बात को गहराई से समझना या समझ पैदा करना। इसी मुराक़बा के मध्यम ईश्वरीय गुणों का
ज्ञान और वे सूत्र प्रकट होते हैं, जिनसे सृष्टि का
निर्माण हुआ।
तफ़हीम का
मोराकबा आधी रात के बाद किया जाता है।
व्यक्ति ज़ेह्न को शांत करके "अलीम" नाम की ओर एकाग्र होता है और कल्पना करता है कि उसे इस नाम
से गहरा संबंध है।
इस प्रक्रिया में
मोराकबा के साथ-साथ जागते रहने
का अभ्यास भी ज़रूरी होता है। चौबीस घंटे में सिर्फ एक-दो घंटे या
अधिकतम ढाई घंटे सोने की अनुमति होती है। जब व्यक्ति लगातार जागा रहता है, तो "अलीम" नाम की शक्ति
पूरी तरह सक्रिय हो जाती है। शुरू में मुराक़बा के दौरान बंद आँखों से दृश्य दिखते
हैं, जिसे "आभास" (वुरूद) कहते हैं। बाद
में जब वही अनुभव खुली आँखों से होने लगे, तो उसे "दर्शन" (शुहूद) कहा जाता है।
लगातार मुराक़बा
की गूढ़ और स्थिर अवस्था) और उस्ताद की तवज्जो व निगरानी (गुरु की कृपा और
सतत देखरेख) के परिणामस्वरूप शागिर्द (शिष्य) के भीतर प्रकाश
का संचय हो जाता है और चेतना का दर्पण स्वच्छ हो जाता है। उस समय शिष्य की
आध्यात्मिक सैर (रूहानी सैर) आरंभ हो जाती है, जो क्रमशः दो
मुख्य आध्यात्मिक स्तरों से होकर गुजरती है।
पहले स्तर (मर्तबा) में साधक समस्त
मुशाहिदात व इन्किशाफ़ात (आध्यात्मिक दृश्य
और रहस्योद्घाटन) को इस शऊर (चेतना) के साथ देखता है
कि वे दूरी में घटित हो रहे हैं। यहाँ तक कि वह अर्श (ईश्वर का
सर्वोच्च सिंहासन) तक पहुँच जाता है और वहाँ उसे तजल्ली-ए-सिफ़ात (ईश्वर के गुणों
की दिव्य आभा) की कृपा प्राप्त होती है। इस प्रकार के
मुशाहिदा (अध्यात्मिक दर्शन) को सैर-ए-आफ़ाक़ (बाह्य जगत की
आत्मिक यात्रा) कहा जाता है।
जब सैर-ए-आफ़ाक़ी (बाहरी सैर) पूरी हो जाती है
और साधक पर परमेश्वर की अनुकम्पा होती है, तो सैर-ए-अनफ़ुस (आंतरिक आत्मिक
यात्रा) आरंभ होती है। इस अवस्था में वारिदात व
मुशाहिदात (आध्यात्मिक अनुभव और दर्शन) की एक ऐसी शृंखला
आरंभ होती है, जिसमें साधक सम्पूर्ण जगत को अपने नुक्ता-ए-ज़ात (स्वरूप के केंद्र-बिंदु) का हिस्सा देखता
है और समस्त मौजूदात (सभी सृष्टियाँ और अस्तित्व) उसे अपनी ज़ात (अहं / आत्मतत्त्व) के भीतर दिखाई
देते हैं। अहले-अल्लाह (ईश्वर के ज्ञानी / संतजन) इस प्रकार के
इदराक (बोध) को सैर-ए-अनफ़ुस कहते हैं। सैर-ए-अनफ़ुस की
इन्तिहा (चरम अवस्था) पर आरिफ़-बिल्लाह (परमात्मा का
साक्षात ज्ञाता) ईश्वर को तजल्ली (दिव्य प्रकाश) के रूप में वराय-ए-अर्श (अर्श से परे / सभी सीमाओं के
पार) देखता है। क़ुरआन पाक की इन दो आयतों में सैर-ए-अनफ़ुस की ओर
संकेत किया गया है:
1. “वह तुम्हारे
नफ़्सों (आंतरिक आत्मा / चित्त) में है, क्या तुम देख
नहीं रहे?”
2. "हम बहुत जल्द
अपनी निशानियाँ दिखाएँगे, बाहरी जगत (आफ़ाक़) में भी और आत्म-जगत (अनफ़ुस) में भी — यहाँ तक कि सत्य
उनके लिए पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा।" (क़ुरआन, पारा 25, आयत 1)
जब कोई साधक इस
स्तर पर पहुँचता है कि उसकी आंतरिक दृष्टि जाग्रत हो जाए, तो उसे यह
मुराक़बा कराया जाता है कि पूरा ब्रह्मांड एक दर्पण (आइना) है, जिस पर ईश्वर के
प्रकाश (नूर / दिव्यता) की झलकें पड़ रही
हैं। इस धारणा के माध्यम से बाहरी जगत की यात्रा (सैर-ए-आफ़ाक़ी) शुरू होती है। इसके अगले चरण में साधक (साहिबे मोराकबा) यह कल्पना करता
है कि वह स्वयं एक दर्पण है, जिसमें ईश्वर के
गुण और प्रकाश प्रतिबिंबित हो रहे हैं। यही प्रक्रिया आंतरिक यात्रा (सैर-ए-अनफ़ुस / आत्म-संधान) की शुरुआत करती
है। इस यात्रा की
पराकाष्ठा पर साधक अपने भीतर मौजूद उस दर्पण (आइने) का भी निषेध कर
देता है, ताकि परमात्मा (ज़ात-ए-बारी तआला) की पूर्ण अनुभूति
संभव हो सके।
एक और तरीका यह
है कि साधक सबसे पहले यह कल्पना करता है कि उसका हृदय (क़ल्ब) ईश्वर के
सर्वोच्च सिंहासन (अरश) से जुड़ा हुआ है।
इस भावना से प्रेरित होकर साधक मुराक़बा में आरोहण करता है और ईश्वरीय सिंहासन तक
पहुँच जाता है।
इसके आगे के चरण
में, वह चलते-फिरते, मोराकबा में रहते हुए, इन कुरआनी आयतों
को अपने ऊपर ओढ़ लेता है:
1. "वह तुम्हारे साथ
है, तुम जहाँ कहीं भी हो।"
2. "वह तुम्हारी
धड़कती नस से भी अधिक समीप है।"
3. "वह तुम्हारे अपने
भीतर है—क्या तुम नहीं देखते?" (क़ुरआन)
आध्यात्मिक ज्ञान
के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही दिशा (आयाम) में केवल एक
बिंदु के समान है—अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि उस एक बिंदु के भीतर समाहित है। यह
स्थिति ऐसी है जैसे किसी माइक्रोफिल्म में अनेकों चित्र और दृश्य एक अत्यंत छोटे
स्थान में सीमित होते हैं। ठीक इसी प्रकार, ब्रह्मांडीय
बिंदु (कायनाती नुक़्ता) में भी समस्त
दृश्य जगत का सार छिपा होता है। जब यह बिंदु गति में आता है, तो वह फैलकर
सम्पूर्ण सृष्टि का प्रदर्शन करता है। इसका एक और सुंदर
उदाहरण बीज (बीजांकुर) से दी जा सकती
है। एक छोटा सा बीज, जो एक बिंदु से अधिक नहीं होता, अपने भीतर पूरे
वृक्ष का जीवन—पत्ते, फूल, फल, शाखाएँ और आने
वाली पीढ़ियों के वृक्ष—सबको संजोए होता है। यही बीज जब वृद्धि (गति/विकास) प्राप्त करता है, तो एक वृक्ष का
रूप ले लेता है। आध्यात्मिक विज्ञान में इस बिंदु को, जिसमें सम्पूर्ण
सृष्टि एकीकृत रूप में विद्यमान होती है, हृदय (क़ल्ब), अंतःकरण (फ़ु'आद) और एकात्म आत्मा (नफ़्स-ए-वाहिदा) के नामों से जाना
जाता है।
हृदय-मुराक़बा (मुराक़बा-ए-क़ल्ब) के माध्यम से इस
बिंदु की गहराई में उतरने की विधि यह है:
गुरु (मुर्शिद करीम) के निर्देशों का
पालन करते हुए साधक अपनी आँखें बंद करता है और अपने हृदय के भीतर झाँकता है। वह
ध्यानपूर्वक यह कल्पना करता है कि उसके दिल के अंदर एक काला बिंदु (श्याम बिंदु) है। कुछ समय के
अभ्यास के बाद यह कल्पना स्थिर हो जाती है और बिंदु की छवि स्पष्ट बनने लगती है।
इस अवस्था में साधक अपने ज़ेह्न को उस बिंदु की गहराई में प्रवेश कराता है।
धीरे-धीरे ज़ेह्न उस
बिंदु की गहराई में उतरने लगता है, और जैसे-जैसे यह प्रवेश
गहरा होता है, उस बिंदु के भीतर की दुनिया प्रकट
होने लगती है।
यदि ब्रह्मांड की किसी भी गति
का अध्ययन किया जाए, तो उसमें एक स्पष्ट नियम और अनुशासन (नियमितता) दिखाई देता है। इसी अनुशासन
के कारण हर क्रिया में क्रम और संतुलन मौजूद है। उदाहरण के लिए: एक शिशु एक निश्चित आकार और
स्वरूप में जन्म लेता है, और एक विशेष गति से बढ़ते हुए बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था और फिर वृद्धावस्था
में प्रवेश करता है। खनिज (निर्जीव वस्तुएँ) और वनस्पतियाँ भी विशिष्ट नियमों के अधीन जीवन जीती हैं।
ग्रहों और तारों की हर गति एक विशेष आकर्षण-शक्ति के नियम के अधीन बंधी हुई है। जितने ग्रह नष्ट होते
हैं, लगभग उतने ही फिर से उत्पन्न हो जाते हैं। सृष्टि की किसी भी जीवधारी के जन्म
से पहले और जन्म के बाद प्रकृति उसके लिए आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था कर देती है।
पानी वाष्प में बदलकर बादल बनता है, और बादल वर्षा बनकर धरती पर गिरते हैं। यह जल जीवन के पोषण
में सहायक होता है, फिर शेष पानी धरती में समा जाता है या नदियों और झीलों के रूप में समुद्र में
लौट जाता है।
ये सभी उदाहरण इस बात की ओर
संकेत करती हैं कि इस ब्रह्मांड के पीछे कोई नियंत्रण प्रणाली (नियंत्रण तंत्र) कार्य कर रही है। इसका असली
कारण यह है कि सृष्टि-व्यवस्था (निज़ाम-ए-आलम) के पीछे एक बुद्धि या एकत्व-चेतना (एक ज़ेह्न / एक इकाई) सक्रिय है। उसी चेतना के संकेत से सृष्टि के समस्त घटक गति
में आते हैं। इस सत्य को क्रिया-एकत्व (तौहीद-ए-अफआली) कहा जाता है—जिसका अर्थ है: समस्त क्रियाओं में एकता विद्यमान है।
जब किसी साधक पर यह ‘क्रिया-एकत्व’ प्रकट होता है, तो वह देखता है कि ज्योतिर्मय
संसार के पीछे एक अदृश्य यथार्थ विद्यमान है। उसी यथार्थ के संकेत पर अदृश्य लोक (आलम-ए-मख़्फ़ी) कार्य कर रहा है, और उस अदृश्य लोक की क्रियाएँ
ही इस सृष्टि में प्रतिबिंबित होती हैं। ऐसा साधक इस योग्य हो जाता है कि वह एक
क्रिया को दूसरी क्रिया से जोड़ सके—अर्थात् दो विभिन्न घटनाओं के बीच का संबंध उसके ऊपर प्रकट
हो जाता है। वह किसी भी क्रिया का संबंध उस महाबुद्धि (ब्रह्म-चेतना) से जोड़ सकता है, जो इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड को
चला रही है।
क्रिया-एकत्व के मुराक़बा में यह
भावना की जाती है कि इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में एक एकता (वहदत) है, और इस एकता का वास्तविक रूप
प्रकाश (नूर) है, जो सम्पूर्ण सृष्टि को अपने घेरे में लिए हुए है।
‘ना’ का अर्थ होता है, इंकार या निषेध (नकारात्मकता)। यह ‘ना’, परमेश्वर (अल्लाह) के एक गुणीय प्रकाश (गुण-प्रकाश) का नाम है। ऐसा गुण जिसका
विवेचन (विश्लेषण) हम मानव-सत्ता (मानव-स्वभाव) में कर सकते हैं। यही गुण मानव का अचेतन (अवचेतन / लाशऊर) कहलाता है। सामान्य धारणा में अवचेतन को
ऐसे कार्यों की नींव माना जाता है, जिनका स्पष्ट ज्ञान मानव बुद्धि को नहीं होता। जब हम पूरी
मानसिक एकाग्रता के साथ किसी ऐसे आधार की ओर मुराक़बा लगाते हैं जिसे हम या तो
नहीं समझते या उसका अर्थ हमारे लिये अस्पष्ट है, तो उस अवस्था का मानसिक स्वरूप
‘ना’ ही होता है, अर्थात हम उसे केवल निषेधात्मक रूप (इनकार) में अनुभव करते हैं।
प्रारंभ की सार्वभौमिक विधि
यही है कि जब हम किसी वस्तु की उत्पत्ति या किसी प्रक्रिया की शुरुआत को समझने की
चेष्टा करते हैं, तो हमारी चेतना की गहराइयों में सबसे पहले केवल ‘ना’ की भावना प्रकट होती है, यानी प्रथम सोपान पर हम केवल
निषेध से परिचित होते हैं।
जब हमें किसी वस्तु की
प्रामाणिक अनुभूति (मारिफ़त) हो जाती है, चाहे वह अज्ञान की ही अनुभूति क्यों न हो, तो वह फिर भी एक ‘अनुभव’ होती है। और हर अनुभव एक सत्य
होता है। इसलिए अंततः हमें यह स्वीकार करना ही पड़ता है कि अज्ञान की अनुभूति भी
एक ज्ञान ही है।
सूफ़ी संतों के अनुसार, अज्ञान का बोध भी ‘ना का ज्ञान’ है, और ज्ञान का बोध भी ‘ना का ही ज्ञान’ है।
‘ना’ के प्रकाश (अन्वार) परमेश्वर की वे दिव्य गुण-प्रवृत्तियाँ हैं जो एकत्व (वहदानियत) का परिचय कराती हैं। जब साधक
इस प्रकाश से अवगत हो जाता है, तो उसका चित्त एकत्व के तत्व (तौहीद) को गहराई से समझने लगता है। यही वह प्रथम बिंदु है जहाँ
से एक सूफ़ी या साधक परमेश्वर की मारिफ़त (गहराई से जानना) की ओर पहला कदम रखता है।
इस चरण में सबसे पहले साधक को
अपनी स्व-प्रकृति (स्वयं की सत्ता) से भेंट होती है, अर्थात वह जितनी भी खोज करता है, वह स्वयं को किसी भी स्वरूप
में नहीं पाता। और इसी “स्व-निषेध” की अनुभूति के माध्यम से वह ईश्वर के अद्वैत भाव को सच में अनुभव करने लगता
है। यही वह अवस्था है जिसे “विलीनता (फनाइयत)” कहा जाता है, जहाँ आत्मा का भान मिटने लगता है और केवल परम का अस्तित्व
शेष रह जाता है।
‘ना’ के मुराक़बा से, साधक की दृष्टि हज़रत ख़िज़्र
(अ.स.), रूहानी संरक्षक (अवलीया-ए-तक़वीन) और देवदूतों (मलाइका) पर केंद्रित होने लगती है, और समय के साथ इन दिव्य आत्माओं से वार्तालाप का अनुभव होने
लगता है। ‘ना’ की एक विशेषता यह होती है कि यह इन आत्मिक सत्ता के संकेतों और प्रतीकों (इशारों और किनायों) को साधक की भाषा में अनुवादित
कर उसके श्रवण में प्रवेश करा देती है। धीरे-धीरे यह संवादात्मक संबंध बन जाता है और गूढ़ दिव्य
व्यवस्थाओं के अनेक रहस्य खुलने लगते हैं।
‘ना’ के मुराक़बा में, आंखों को अधिक से अधिक बंद
रखने की सलाह दी जाती है। इसके लिए कोई मुलायम कपड़ा या रेशेदार रूमाल आंखों पर इस
तरह बाँधा जाता है कि पलकों पर हल्का-सा दबाव बना रहे। मुराक़बा के समय साधक अपने समस्त विचारों और कल्पनाओं को
त्यागकर अपने भीतर की गहराइयों पर मुराक़बा केंद्रित करता है ताकि उसमें एक तरह की
निर्विचारता उत्पन्न हो जाए। वह अपने भीतर अज्ञान की स्थिति को सजीव रूप में लाने का
प्रयत्न करता है जहाँ से दिव्यता का जन्म होता है।
“मुराक़बा अदम”, “ला के मुराक़बा” का एक विशेष रूप है। इस
मुराक़बा में साधक आँखें बंद करके ऐसी स्थिति की कल्पना करता है जो निरस्तित्व और
निषेध का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी चरम अवस्था में साधक एक ऐसे लोक की अनुभूति
करता है जहाँ कुछ भी अस्तित्वमान नहीं होता, न मनुष्य, न जिन्नात, न वृक्ष-पाषाण, न कोई ध्वनि या हलचल। यहाँ तक कि काल और स्थान का भी लोप हो
जाता है, और साधक स्वयं को भी वहां अनुपस्थित अनुभव करता है। प्रारंभिक अवस्था में इस
प्रकार की पूर्ण निषेध की कल्पना सहज नहीं होती, क्योंकि सामान्य जीवन में ऐसी
अनुभूति दुर्लभ होती है। इसी कारण “अदम मुराक़बा” को क्रमिक रूप में सिखाया जाता है, अर्थात ऐसे मुराक़बा जिनमें
सम्पूर्ण शून्यता के स्थान पर उसकी प्रतिछाया होती है। उदाहरण के रूप में:
1.
विद्यार्थी मरुस्थल या बीابान की छवि करता है, जहाँ पूर्ण निस्तब्धता का
राज्य है और प्रत्येक वस्तु निष्क्रिय है। अर्थात् चारों ओर हू का आलम छाया हुआ
है। इस मुराकबा का दूसरा नाम मुराकबा-ए-बरी है।
2.
साधक (साहिबे मोराकबा) एक व्यापक समुद्र का मुराक़बा
करता है, जिसका जल पूर्णतः शांत और स्थिर हो, और वह स्वयं उस सागर में डूबा हुआ अनुभव करे। इसे मुराक़िबा-ए-बह्र कहते हैं।
3.
साधक यह धारणा करता है कि “मैं अस्तित्व में नहीं हूँ, सिर्फ परम सत्य का अस्तित्व
है।“ इन सोपानों से गुज़रने के पश्चात ही “अदम ध्यान” की वास्तविक स्थिति को आत्मसात कराया जाता है। इस अवस्था
में साधक पर ऐसी चेतनातीत अनुभूतियाँ हावी होती हैं जो सामान्य बौद्धिक अनुभवों से
भिन्न होती हैं। जब चेतन अनुभव लुप्त हो जाते हैं, तब अवचेतन की यात्रा आरंभ
होती है। यह समझना आवश्यक है कि “अदम” से आशय किसी रिक्त, निर्जीव अथवा नकारात्मक लोक से नहीं है, बल्कि यह वह सूक्ष्म आयाम है
जहाँ अवचेतन की आध्यात्मिक तरंगें गतिशील होती हैं, (और यहीं से साधक की असली
रूहानी यात्रा शुरू होती है।)
जब कोई व्यक्ति
किसी लेख को लिखने बैठता है, तो सबसे पहले
उसके चित्त में एक शीर्षक (विषय) होता है। किंतु
उस शीर्षक की रचना और विस्तार उसकी अंतर्बुद्धि में पहले से स्पष्ट नहीं होते। जब
वह कलम और कागज़ लेकर अपने ज़ेह्न को क्रियाशील करता है, तो लेख का स्वरूप
क्रमशः आकार लेने लगता है। जो कुछ वह लिखता है, वह भाव और
तात्पर्य की दृष्टि से उसके अचेतन में पूर्व से ही विद्यमान होता है। इसी
अंतरगर्भित संग्रह से वह विचार सुस्पष्ट रूप ग्रहण कर शब्दों का आभरण धारण कर लेता
है। लेख में कोई भी ऐसी बात नहीं होती जो अर्थ और संकेत के रूप में लेखक की अचेतन
सत्ता में पहले से न हो। यदि वह उपस्थिति न हो, तो लेख शब्द रूप
नहीं ले सकता। इस प्रकार लेख के
तीन स्तर (स्थिति) होते हैं:
1. प्रथम वह स्थिति
जिसमें लेख विचार (भावार्थ) के रूप में
अस्तित्वमान होता है।
2. द्वितीय वह
स्थिति जहाँ वह शब्द-रूप में प्रकट होता है।
3. तृतीय वह स्थिति
जहाँ लेखनी उन शब्दों को कागज़ पर उतारकर उन्हें स्थूल (भौतिक) स्वरूप प्रदान
करती है।
जैसे लेख की ये
तीन अवस्थाएँ हैं और वह भौतिक रूप धारण करने से पूर्व तीन चरणों से होकर गुज़रता
है, वैसे ही समस्त प्रकट घटनाएँ त्रिस्तरीय सत्ता
में विद्यमान होती हैं। कोई भी सत्ता, गति या क्रिया, चाहे उसका संबंध
अतीत से हो, वर्तमान से हो या भविष्य से; इन तीन स्तरों से
परे नहीं हो सकती। इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट करने के लिए एक चित्रकार का
दृष्टांत प्रस्तुत किया जाता है। एक चित्रकार यदि कागज़ पर कबूतर की आकृति बनाता
है, और चाहे तो वह पुनः वैसी ही अथवा भिन्न आकृति
बना सकता है। कारण यह है कि उस चित्र का ज्ञान उसके अंतःकरण में संचित रहता है।
कागज़ पर तो मात्र उसकी प्रतिच्छाया अंकित होती है, मूल चित्र नहीं।
इस प्रकार वह जितनी चाहे उतनी आकृतियाँ बना सकता है, किंतु चित्र का
विज्ञान उससे पृथक नहीं होता। किसी भी ज्ञान, गति या दृश्य का
वह आयाम, जहाँ वह अर्थ और संकेतों के सूक्ष्म स्वरूप में
स्थित होता है, कल्पनात्मक लोक (आलम-ए-तम्सील) कहलाता है। इस
कल्पना लोक में प्रत्येक दृश्य या स्थिति के रूप-रेखाएँ (प्रतिरूप) होती हैं, जिन्हें आत्मा की
दृष्टि ग्रहण कर सकती है। यदि साधक मुराक़बा (विलयन-साधना/मोराकबा) के माध्यम से इन
रूप-रेखाओं को जानने का यत्न करे, तो उसकी चेतना उन
मानसिक छापों (मनःप्रतीतियों) को भलीभाँति
ग्रहण करने लगती है। इन रूपों में वे घटनाएँ भी सम्मिलित होती हैं जो भविष्य के
आदेशों के रूप में अंकित होती हैं, और और जिनका पालन
समय पर यथावत् प्रकट होता है।
कल्पना-लोक का अध्ययन
करने की साधना “विलयन ध्यान” है:
ध्यानारूढ़ साधक
अपनी आँखें मूँदकर यह भावना करता है कि उसके जीवन के समस्त चिह्न लय हो चुके हैं, और अब वह केवल एक
दिव्य प्रकाश-बिंदु के रूप में स्थित है। वह यह भाव स्थिर करता है कि
उसका संबंध अब स्वयं के भौतिक अस्तित्व से नहीं, अपितु उस विराट
सत्ता से है जिसमें आदिकाल से अंतकाल तक की समस्त लीलाएँ, क्रियाएँ और
विधियाँ अन्तर्निहित हैं। जैसे-जैसे साधक अभ्यास
करता है, वैसे-वैसे कल्पना-लोक की सूक्ष्म
प्रतिच्छवियाँ उसके अंतर्मन में स्पष्ट होने लगती हैं। क्रमशः वे प्रतीक उसके
चैतन्य में भावार्थ सहित संप्रेषित होने लगते हैं।
जब हम किसी वस्तु
का वर्णन करते हैं, तो उसकी विशेषताओं (गुणों) का उल्लेख करते
हैं। गुणों के बिना किसी अस्तित्व की व्याख्या संभव नहीं होती। किसी विशिष्ट गुणों
के समूह को ही वस्तु कहा जाता है। जब हम किसी वस्तु की भौतिक आकृति का वर्णन करते हैं, तो कहते हैं कि
अमुक वस्तु ठोस है, तरल है, वायु है; उसमें अमुक रंग
प्रमुख है, अमुक रासायनिक तत्व सक्रिय हैं; वस्तु गोलाकार है, चतुर्भुज है या
किसी विशेष रूप में है आदि। प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई नाम होता है, और नाम केवल एक
संकेत होता है, जो उस वस्तु की विशिष्ट गुणात्मकता का
प्रतिनिधित्व करता है। उदाहरण के लिए, जब हम "जल" शब्द उच्चारित
करते हैं, तो उसका आशय उस तरल से होता है जो प्यास बुझाने
में सहायक होता है। यह बात अलग है कि हम जल के कितने गुणों से परिचित हैं।
जब हम "जल" कहते हैं, तो श्रोता के
ज़ेह्न में जल की विशेषताएँ, उसका स्वाद, रंग, प्रवाहशीलता आदि, प्रकट होती हैं।
इसी प्रकार लेखन करने वाली वस्तु को "कलम" कहा गया है। अतः जब कोई व्यक्ति "कलम" शब्द कहता है, तो उससे अभिप्राय
उस उपकरण से होता है जिससे लेखन होता है।
तात्पर्य यह है
कि गुणों के समूह को एक संकेत या चिन्ह से व्यक्त किया जाता है। इस चिन्ह को नाम
भीं कहा जासकता है। आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार, सम्पूर्ण सृष्टि
गुणों (सिफात) का समुच्चय है।
इन्हीं गुणों की परस्पर संयोजना से सृष्टि की रचना होती है। आध्यात्मिक
वैज्ञानिकों (रूहानी शोधकर्ताओं) ने सृष्टि की
गहराइयों में जाकर इन गुणों का अवलोकन किया है और उन्हें विविध नाम प्रदान किए
हैं।
पैग़म्बरों (ऋषियों) को वह्य (दिव्य प्रेरणा) के माध्यम से इन
गुणों का ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि ब्रह्माण्ड में क्रियाशील समस्त
गुण वास्तव में ईश्वर के गुण हैं। अंतर यह है कि ईश्वर में ये गुण पूर्णता (समग्रता) के साथ विद्यमान
हैं, जबकि सृष्टि को उनका अंश मात्र प्रदान हुआ है। उदाहरण के लिए, ईश्वर द्रष्टा (बसीर) हैं, अर्थात देखने का
गुण ईश्वर का है, किंतु प्राणी में भी देखने की शक्ति क्रियाशील
है। ईश्वर श्रवणशील (समीअ) हैं, और प्राणी भी
सुनने में सक्षम हैं।
ईश्वर ने कहा है:
"मैं सृष्टि करने
वालों में श्रेष्ठतम स्रष्टा हूँ।"
या
"मैं दयालुओं में
सर्वाधिक दयालु हूँ।"
अर्थ यह है कि
ईश्वर में प्रत्येक गुण परम स्तर पर, असीम रूप में
स्थित है, जबकि सृष्टि में वही गुण सीमित और अपूर्ण रूप
में प्रकट होते हैं।
परम नाम अर्थात् “अल्लाह” को आध्यात्मिक
दृष्टि से विशेष महत्त्व प्राप्त है। इसीलिए इसलिए आध्यात्मिक मार्ग के साधक "नाम-स्वरूप/परम नाम (इसमें जात)" से संबंध और
जुड़ाव स्थापित करने तथा नाम-स्वरूप/परम नाम की दिव्य
आभाओं (परकशो) का अनुभव प्राप्त
करने के लिए नाम-स्वरूप पर (मोराकाबा-ए-इस्म-ए-ज़ात) की शिक्षा देते
हैं।
यह समस्त सृष्टि
इस सत्य पर आधारित है कि सम्पूर्ण अस्तित्व का स्वामी केवल एक ही सत्ता है। इसी
एकत्व की वजह से समस्त प्राणी एक-दूसरे से परिचित
होते हैं और एक-दूसरे को अनुग्रह (फ़ैज़) प्रदान करने के
लिए बाध्य हैं। यदि यह ब्रह्मांड एक ही सत्ता की मिल्कियत न होता, तो परस्पर संबंध
असंभव हो जाता। इसी सर्वशक्तिमान स्वामी सत्ता को “अल्लाह” कहा जाता है और ईश्वर के नामों में यही नाम “इस्म-ए-ज़ात” है। अन्य नाम
ईश्वर के गुणों (सिफ़ात) को प्रकट करते
हैं। “अल्लाह” शब्द में एक ऐसी
तजल्ली (दिव्य प्रकाश) निहित है जो
प्रभुत्व और सृजनशीलता को प्रकट करती है। इस तजल्ली की पहचान के माध्यम से साधक
सम्पूर्ण सृष्टि का मूल आधार साक्षात् देखने लगता है, क्योंकि सृजन और
स्वामित्व की यह शक्ति सम्पूर्ण समस्त सृष्टियोंमें व्याप्त है।
मुराक़बा में यह
कल्पना की जाती है कि साधक के हृदय पर “अल्लाह” का नाम नूरी अक्षरों में लिखा हुआ है और उसकी किरणें साधक
के सम्पूर्ण अस्तित्व को प्रकाशित कर रही हैं।
जैसे-जैसे साधक की
तल्लीनता और एकाग्रता बढ़ती है, राह-ए-सुलूक का यात्री
सम्पूर्ण सृष्टि को इस्म-ए-ज़ात के प्रकाश
में प्रतिबिंबित देखता है। अंततः उसे प्रत्येक वस्तु की अंतिम सीमा पर “अल्लाह” की सृजनशीलता (ख़ालिक़ियत) और स्वामित्व (मालिकियत) का अनुभव अपने
हृदय में होता है।
ख्वाजा शम्सुद्दीन अजीमी
ग़ार-ए-हिरा के नाम
जहाँ अंतिम युग के संदेशता (ﷺ) ने (रेहाना)किया
और हज़रत जिब्राईल, क़ुरआन की प्रारंभिक
आयतों को लेकर पृथ्वी पर अवतरित हुए।