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बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्रहीम

 

मानव-समष्टि में ज़िन्दगी की गतिविधियों के विचाराधीन स्वभावगुणों की भिन्न-भिन्न संरचनाएँ होती हैं, जैसे संरचना अलिफ़, , , , इत्यादि। यहाँ चर्चा उस संरचना की है जो "पद पद चलाकर बोध का गन्तव्य तक पहुँचा देती है।

पहले हम एक भौतिक उदाहरण देते हैं। वह यह है कि यदि कोई आदमी चित्रकार बनना चाहे तो वह तस्वीर के आकृतियाँ को अपनी प्रकृति में धीरे-धीरे समाहित करता जाता है। उसके स्मृति-भंडार में यह बात सुरक्षित रहती है कि कानों की संरचना के लिए पेंसिल की एक विशेष प्रकार की रेखाओं का प्रयोग होगा, आँखों की संरचना के लिए दूसरी प्रकार की, बालों की संरचना के लिए तीसरी प्रकार की। अभ्यास करते-करते वह मानवी शरीर के प्रत्येक अंग की संरचना को पेंसिल के नक़्श की छवि में पूर्ण रूप से प्रकट करने पर अधिकार पा लेता है। अब हम उसे चित्रकार कह सकते हैं। यह सब किस प्रकार हुआ?

उसके ज़ेह्न में मानवी आकृतियाँ का प्रतिबिंब विद्यमान था। जब इस प्रतिबिंब को उतारने के लिए उसने पेंसिल का उपयोग करना चाहा तो वह प्रतिबिंब जो उसके ज़ेह्न में मौजूद था, बार-बार उसकी पथप्रदर्शन करता रहा। साथ ही जिस उस्ताद ने उसे चित्रकारी का कला सिखाया, वह यह बतलाता गया कि पेंसिल इस प्रकार प्रयोग की जाती है और किसी अंग की आकृति को क्रमबद्ध करना इस प्रकार कर्म में आता है। उस्ताद का कार्य केवल इसी क़दर था लेकिन तस्वीर का प्रतिबिंब उस्ताद ने उसके ज़ेह्न में स्थानांतरित नहीं किया। वह उसके आंतरिक में पहले से विद्यमान था। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि उसकी आत्मा के भीतर मानव-समष्टि के हज़ार दर हज़ार आकृतियाँ संरक्षित थे। जब उसने एक उस्ताद की मार्गदर्शन में उन आकृतियाँ को काग़ज़ पर अंकित करना चाहा तो वे सभी आकृतियाँ जो ज़ेह्न में मौजूद थीं काग़ज़ पर स्थानांतरित हो गईं।

इस तर्क या तुलना के अनुसार भौतिक कलाओं की इस प्रकार की हज़ारों मिसालें हो सकती हैं जिनसे हम केवल एक ही निष्कर्ष निकालते हैं और वह यह कि मनुष्य स्वभावतः चित्रकार, लेखक, दर्ज़ी, लोहार, बढ़ई, दार्शनिक, चिकित्सक आदि सब कुछ होता है, मगर उसे किसी विशेष कला में एक विशेष प्रकार का अभ्यास करना पड़ता है। इसके बाद उसके भिन्न-भिन्न नाम रख लिए जाते हैं और हम इस प्रकार कहते हैं कि फलाँ व्यक्ति चित्रकार हो गया, फलाँ व्यक्ति दार्शनिक हो गया। वस्तुतः वे सभी क्षमताएँ और आकृतियाँ उसके ज़ेह्न में विद्यमान थीं। उसने केवल उन्हें जागृत किया। उस्ताद ने जितना काम किया वह केवल क्षमता के जागरण में एक सहायता है।

अब हम मूल उद्देश्य की ओर आते हैं। जिस प्रकार कोई व्यक्ति चित्रकार, लेखक या दार्शनिक होता है उसी प्रकार स्वभावतः अपनी आत्मा के भीतर एक आरिफ़, एक आत्माज्ञानी जन, एक वली, एक ईश्वर-शिनास, एक पैग़म्बर विशेष प्रकार की आत्मिक आकृतियाँ और विशेष प्रकार की आत्मिक क्षमताएँ लिए होता है। (यहाँ कोई पैग़म्बर इसलिए चर्चा में नहीं है कि पैग़म्बरी समाप्त हो चुकी है। केवल आत्मिक ानी व्यक्ति, उसका नाम कुछ भी हो, हमारा उद्देश्य यही है।) अब हम क्षमताओं का उल्लेख अ से शुरू करते हैं।

)अलिफ़): एक मनुष्य क्या है? हम उसे किस प्रकार अभिज्ञात करते हैं और क्या समझते हैं?

हमारे सामने एक प्रतिमा है जो मांस-पेशी से निर्मित है। चिकित्सीय दृष्टिकोण से हड्डियों की संरचना पर नस-पेशियों की बनावट को एक शरीर का रूप और आकार दिया गया है। हम इसका नाम शरीर रखते हैं और इसे वास्तविक समझते हैं। इसकी सुरक्षा के लिए एक वस्तु बनाई गई है, जिसका नाम वसन है। यह वसन सूती कपड़े का, ऊनी कपड़े का या किसी खाल आदि का होता है। इस वसन का उपयोग केवल मांस-पेशी के शरीर की सुरक्षा के लिए होता है। वास्तव में इस वसन में अपनी कोई जीवन शक्ति या अपनी कोई गति नहीं होती। जब यह वसन शरीर पर होता है तो शरीर के साथ ही गति करता है अर्थात् इसकी गति शरीर से स्थानांतरित होकर इसे प्राप्त होती है। लेकिन वास्तविकता में यह शरीर के अंगों की गति होती है। जब हम हाथ उठाते हैं तो आस्तीन भी मांस-पेशी वाले हाथ के साथ गमन करती है यह आस्तीन वसन का हाथ है, जो वसन शरीर की सुरक्षा के लिए प्रयोग हुआ है। यदि इस वसन की परिभाषा की जाए तो कहा जाएगा कि जब यह वसन शरीर पर है तो शरीर की गति इसके भीतर स्थानांतरित हो जाती है और यदि इस वसन को उतारकर चारपाई पर रख दिया जाए या खूँटी पर लटका दिया जाए तो इसकी सारी गति समाप्त हो जाती हैं। अब हम इस वसन की तुलना शरीर के साथ करते हैं। इसकी अनेक उदाहरणें हो सकती हैं। यहाँ केवल एक उदाहरण देकर सही अर्थ को ज़ेह्न में उतारा जा सकता है। वह यह है कि आदमी मर गया। मरने के बाद उसके शरीर को काट दीजिए, टुकड़े कर दीजिए, खींचिए, कुछ भी करिए। शरीर की अपनी ओर से कोई प्रतिरोध, कोई गति क्रियान्वित नहीं होगी। इस मृत शरीर को एक तरफ रख दीजिए तो इसमें जीवन का कोई अंश या किसी क्षण में उत्पन्न होने की कोई संभावना नहीं है। इसे जिस प्रकार रखा जाएगा, वैसे ही रहेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि मरने के बाद शरीर की स्थिति केवल वसन की रह जाती है। असली मनुष्य इसमें उपस्थित नहीं रहता। वह इस वसन को छोड़कर कहीं चला जाता है। जब अनुभवों और परीक्षणों ने यह निर्णय दे दिया कि मांस-पेशी का शरीर केवल वसन है, असली आदमी नहीं, तो यह खोज आवश्यक हो गई कि असली मनुष्य क्या है और कहाँ चला गया?

यदि यह शरीर असली मनुष्य होता तो किसी न किसी प्रकार से इसमें जीवन का कोई अंश जरूर पाया जाता, लेकिन मानव-समष्टि का संपूर्ण इतिहास ऐसी कोई मिसाल प्रस्तुत नहीं कर सकता कि किसी मृत शरीर ने कभी कोई गति दिखाई हो।

इस स्थिति में हम उस मनुष्य का जिज्ञासु हो जाते हैं जो इस शरीर के वसन को छोड़कर कहीं चला जाता है। उसी मनुष्य का नाम अनबियाँ--करामؑ की भाषा में आत्मा है और वही मनुष्य का असली शरीर है। यही शरीर उन सभी क्षमताओं का मालिक है जिनके समुच्चय को हम जीवन कहते हैं।

जीवन के विभिन्न क्षेत्रों और दृष्टिकोणों में यह देखें कि वह स्थिति, जिसका नाम मृत्यु या मर जाना है, हमें कहीं मिलती है या नहीं। यदि यह स्थिति जीवन के किसी भी चरण में व्यक्ति पर पूरी तरह से हावी नहीं होती, तो फिर यह देखना चाहिए कि क्या इसी तरह की स्थिति किसी अंतराल में प्रकट होती है या नहीं।

इसका उत्तर बहुत सरल है। आदमी रोज़ सोता है और सोने की अवस्था में उसका शरीर एक निश्चित अंतराल में पूरी तरह वसन की तरह हो जाता है। इस बात की व्याख्या हम इस प्रकार कर सकते हैं कि जब आदमी गहरी नींद में होता है, इतनी गहरी नींद में कि वह केवल श्वास ले रहा होता है। श्वास लेने के अलावा जीवन का कोई प्रभाव इसमें नहीं पाया जाता। न इसके किसी अंग में गति है, न इसका मस्तिष्क किसी प्रकार की चेतना रखता है। यह स्थिति चाहे दो मिनट के लिए हो, दस मिनट के लिए हो या एक घंटे के लिए, किसी न किसी समय होती ही है। फर्क केवल इतना होता है कि आदमी का शरीर श्वास ले रहा है, यानी इसके भीतर जीवन का एक अंश शेष है, लेकिन अन्य संकेत समाप्त हो चुके हैं। इस स्थिति को हम किसी हद तक मृत्यु से मिलती-जुलती अवस्था कह सकते हैं।

जिसे हम सपना देखना कहते हैं, वह हमें आत्मा और आत्मा की क्षमताओं का पता देता है। यह इस प्रकार है कि हम सोए हुए हैं। सभी अंग पूरी तरह स्थगित हैं। केवल श्वास का आवागमन जारी है, लेकिन सपना देखने की अवस्था में हम चल-फिर रहे हैं, बातें कर रहे हैं, सोच रहे हैं, दुःखी और प्रसन्न हो रहे हैं। कोई ऐसा कार्य नहीं है जो हम जाग्रत अवस्था में करते हैं और सपना देखने की अवस्था में नहीं करते।

कोई व्यक्ति यह आपत्ति कर सकता है कि सपना देखना केवल एक कल्पनात्मक वस्तु है और इसमें कल्पित क्रियाएँ होती हैं, क्योंकि जब हम जाग जाते हैं तो किए गए कार्यों का कोई प्रभाव शेष नहीं रहता। यह बात पूरी तरह निरर्थक है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में एक, दो, चार, दस, बीस ऐसे सपने अवश्य आते हैं कि जागने के बाद या तो उसे नहाने और स्नान करने की आवश्यकता पड़ती है या किसी भयानक सपना के बाद उसका पूरा भय और आतंक हृदय और मस्तिष्क पर छा जाता है, या जो कुछ सपना में देखा गया वह कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ महीने या कुछ वर्ष बाद पूर्णतः जाग्रत अवस्था में घटित होता है। कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जिसने अपने जीवन में इस प्रकार का एक या एक से अधिक सपने नहीं देखे हों। इस तथ्य के रोशनी में यह सिद्ध हो जाता है कि सपना केवल कल्पना नहीं है। जब यह मान लिया गया कि सपना केवल कल्पना नहीं है, तो सपने का महत्व स्पष्ट हो जाता है।

अब हम जाग्रत अवस्था के कार्यों और घटनाओं तथा सपना के कार्यों और घटनाओं को सामने रखकर दोनों की तुलना करते हैं।

यह रोज़मर्रा की बात होती है कि हम घर से चलकर बाजार पहुँच जाते हैं। किसी विशेष दुकान पर खड़े हैं और कोई वस्तु खरीद रहे हैं। यदि उस समय कोई व्यक्ति हमसे यह प्रश्न करे कि दुकान तक पहुँचने के रास्ते में आपने क्या देखा, तो हम मजबूरन यह उत्तर देते हैं कि हमने कुछ विचार नहीं किया। यह स्पष्ट हो गया कि जाग्रत अवस्था में हमारे चारों ओर जो कुछ होता है, यदि हम पूरी तरह ध्यान न दें, तो हमें यह नहीं पता चलता कि क्या हुआ, किस प्रकार हुआ और कब हुआ।

इस उदाहरण से यह प्रमाणित हो जाता है कि चाहे जाग्रत अवस्था हो या सपना, जब हमारा ज़ेह्न किसी वस्तु की ओर या किसी कार्य की ओर केंद्रित है तो उसका महत्व है, अन्यथा जाग्रत अवस्था और सपना दोनों का कोई महत्व नहीं है। जाग्रत अवस्था का बड़ा से बड़ा अंतराल बे-ख़याली में बीत जाता है और सपने का भी बहुत बड़ा भाग बे-ख़बरी में गुज़र जाता है। कितनी ही बार सपना अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है और कितनी ही बार जाग्रत अवस्था का भी कोई महत्व नहीं होता। फिर यह कैसे उचित है कि हम सपने की अवस्था और सपने के अंशों को, जो जीवन का आधा भाग है, नज़रअंदाज़ कर दें।

आइए! अब हम सपने के अंशों, सपने के महत्व और सपने की वास्तविकता का अन्वेषण करें।

मान लीजिए कि एक निबंधकार निबंध लिखने बैठता है। उसके ज़ेह्न में केवल शीर्षक है। न निबंध के क्रमबद्ध अंश मौजूद हैं, न विस्तार, लेकिन जैसे ही वह क़लम हाथ में उठाकर लिखना आरम्भ करता है तो निबंध के अंश क्रमशः और विस्तार सहित ज़ेह्न में आने लगते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि वाक्य का आशय लेखक के अतिचेतन में पहले से मौजूद था। वहीं से यह आशय अवचेतन अर्थात् ज़ेह्न में स्थानांतरित हुआ और शब्दों का वसन पहनकर काग़ज़ पर अंकित हो गया। यह निबंध, आशय की हैसियत में जहाँ मौजूद था, उसका नाम 'साबिता' है, जिसे विशेषज्ञ अतिचेतन कह सकते हैं। फिर यही आशय स्थानांतरित होकर 'अय्यान' में आया, अर्थात् अवचेतन में प्रविष्ट हुआ। अंततः यही आशय वाक्य की आकृति धारण कर लेता है। हम इसी अवस्था को 'जविया' में स्थानांतरित होना कहते हैं और सामान्य लोग आशय के इस स्थानांतरण को चेतना में आना कहते हैं।

अब हम उन क्षमताओं का उल्लेख करना आवश्यक समझते हैं जो स्वप्न अर्थात् 'रूया' के नाम से जानी जाती हैं। स्वप्न के लोक में मनुष्य भोजन करता है, पेय ग्रहण करता है और चलता-फिरता है। इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मा मांस और त्वचा के शरीर के बिना भी गति करती और संचरण करती है। आत्मा की यह क्षमता जो केवल 'रूया' में सक्रिय होती है, हम किसी विशेष विधि से इसका अन्वेषण कर सकते हैं और इस क्षमता को जाग्रति में भी प्रयोग कर सकते हैं।

नबीगण (अलैहिमुस्सलाम) का ज्ञान यहीं से आरम्भ होता है। और यही वह ज्ञान है जिसके माध्यम से नबियों ने अपने शिष्यों को यह बताया है कि मनुष्य प्रारम्भ में कहाँ था और इस लोक-नासूत का जीवन पूर्ण करने के पश्चात् वह कहाँ चला जाता है।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai