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हर चेतन ब्रह्माण्ड का स्थान जानता है। वह अवश्य सोचता है कि यह
सब किस जगह स्थित है, किस पृष्ठभाग पर ठहरा हुआ है। क़ुरआन पाक में इस
प्रश्न का उत्तर जगह-जगह दिया गया
है। बार-बार ईश्वर ने
कहा है कि मैं सर्वज्ञ हूँ, मैं सर्वदर्शी हूँ, मैं सर्वद्रष्टा हूँ, मैं सर्वव्यापी हूँ, मैं सर्वशक्तिमान हूँ, मैं धरती और आकाश का नूर हूँ। इन सब उक्तियों से अनिवार्यतः यह निष्कर्ष
निकलता है कि ब्रह्मांड का स्थितिस्थान ईश्वर का ज्ञान है।
ब्रह्माण्ड ईश्वर के ज्ञान में किस
प्रकार विद्यमान है? इसे समझने के लिए ब्रह्माण्ड के अवयवों की आंतरिक संरचना जानना आवश्यक है। हम
देख रहे हैं कि हर वस्तु अपने स्थान से कदम-दर-कदम चलकर मंज़िल की ओर बढ़ रही है।
इस गति का नाम उत्कर्ष है।
अब यह समझना आवश्यक है कि उत्कर्ष क्या है और किस प्रकार घटित हो रहा है।
हम रोशनी के माध्यम से देखते हैं, सुनते हैं, समझते हैं और स्पर्श करते हैं। रोशनी
हमें इन्द्रियाँ प्रदान करता है। जिन इन्द्रियों के
द्वारा हमें किसी वस्तु का ज्ञान होता है, वे सब रोशनी के दिए हुए हैं। यदि रोशनी
को बीच से हटा दिया जाए तो हमारी इन्द्रियाँ भी नष्ट हो जाएँगी। उस समय न तो हम
स्वयं अपने अवलोकन में शेष रहेंगे और न कोई दूसरी वस्तु हमारे अवलोकन में रह
पाएगी।
उदाहरण: यदि कोई चित्रकार श्वेत काग़ज़ पर
रंग भरते समय बीच में एक कबूतर का स्थान रिक्त छोड़ दे, फिर वही काग़ज़ दिखाकर किसी
व्यक्ति से पूछा जाए—"तुम्हें क्या दिखाई देता है?"—तो वह कहेगा, "मैं एक श्वेत कबूतर देख रहा हूँ।"
ठीक उसी प्रकार ईश्वर का ज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को घेरे हुए है। ब्रह्माण्ड का
प्रत्येक कण अंतराल के रूप में ईश्वर के नूर में
स्थित है। देखने वाले को ईश्वर का नूर दिखाई नहीं देता, केवल ब्रह्माण्ड की अंतराल दिखाई
देती है, जिसे वह वस्तुएँ—चन्द्रमा, सूर्य, पृथ्वी, आकाश, मनुष्य, पशु आदि—कहता है।