Topics

काल-स्थान की वास्तविकता

 

यहाँ इस बात का विवेचन आवश्यक है कि ब्रह्मांड किस प्रकार उत्पन्न हुआ है और स्थान तथा काल का ब्रह्मांड की तकोवीन (सृष्टि-प्रक्रिया) से क्या संबंध है।

ब्रह्मांड की दो पृष्ठभाग हैं। यदि हम एक पृष्ठभाग को समष्टि-स्वरूप (Internal Self) कहें तो दूसरी पृष्ठभाग को व्यष्टि-स्वरूप (Personal Ego) कहा जाएगा। समष्टि-स्वरूप छोटे से छोटे अणु और बड़े से बड़े ग्रह-पिंड का आधार-रेखा (Base Line) है। अर्थात् छोटे से छोटा अणु और बड़े से बड़ा गोला जिन प्रकाशो का समुच्चय है, वे समस्त प्रकाश-रेखाएँ समष्टि-स्वरूप के ही अवयव हैं। यदि हम इन रोशनियाँ  को देख सकें तो वे छवि-स्वरूप में दृष्टिगोचर होंगी। यही छवियाँ समष्टि-स्वरूप से व्यष्टि-स्वरूप में प्रवाहित होती हैं। उनका प्रवाहित होना केवल समष्टि-स्वरूप पर निर्भर है। समष्टि-स्वरूप जिन छवियों को व्यष्टि-स्वरूप के हवाले कर देता है, व्यष्टि-स्वरूप उन्हें स्वीकार करने के लिए बाध्य होता है। उदाहरण के लिए गुलाब को समष्टि-स्वरूप से वही छवियाँ प्राप्त होती हैं जो गुलाब के आकार-प्रकार में प्रकट होती हैं। इसी प्रकार मनुष्य को भी समष्टि-स्वरूप से वही छवियाँ मिलती हैं जो उसकी मानवीय आकृति का प्रदर्शन करती हैं।

मनुष्य की संरचना क्या है?

वह ऐसी छवियों का संकलन है जो समष्टि-स्वरूप में व्यष्टि-स्वरूप का चैतन्य प्राप्त करती हैं। मनुष्य का अवचेतन (समष्टि-स्वरूप) स्वयं अपने शरीर की रचना करता है। सामान्य भाषा में जिसे पदार्थ(Substance) कहा जाता है, वह अवचेतन की मशीनरी का निर्मित हुआ है। यह समझना कि बाहर से मिलने वाला आहार ही रक्त और शरीर का निर्माण करता हैयह धारणा मूलतः असत्य है।

वास्तव में मनुष्य का अवचेतन (समष्टि-स्वरूप) छवियों को रोशनी से पदार्थ का रूप देता है। यही पदार्थ शारीरिक आकृति (ख़द--ख़ाल) और भार (गुरुत्व) के रूप में प्रकट होता है। जब अवचेतन किसी कारणवश छवियों को पदार्थ में रूपांतरित करने का उपक्रम नहीं करता, तो मृत्यु घटित हो जाती है।

जीवन में मनुष्य को एक से अधिक बार गहन रोगों से सामना करना पड़ता है। इस समय आहार या तो न्यूनतम रह जाता है या पूर्णतः अनुपस्थित हो जाता है, परंतु मृत्यु नहीं होती। इसका अभिप्राय यह है कि शरीर की भौतिक मशीन जीवन को चलाने की उत्तरदायी नहीं है। इन अनुभवों से यह तथ्य प्रमाणित होता है कि बाहर से प्राप्त पोषण जीवन का हेतु नहीं है। जीवन का वास्तविक हेतु केवल अवचेतन की कारीगरी है।

समष्टि-स्वरूप को समझने के उपाय असंख्य हैं। समष्टि-स्वरूप की विशेषताएँ असीम हैं। मनुष्य जन्म लेता है, कुछ महीनों का होता है, फिर साठ, सत्तर, अस्सी या नब्बे वर्ष का हो जाता है। उसके शरीर, उसके विचार और उसके ज्ञान-क्रियाओं में प्रत्येक क्षण परिवर्तन होता रहता है। उसके शरीर और चिंतन का प्रत्येक कण परिवर्तित हो जाता है, परंतु वह व्यक्ति नहीं बदलता। जो कुछ वह कुछ महीनों की अवस्था में था, वही नब्बे वर्ष की अवस्था में भी है। यदि उसका नाम ज़ैद है तो उसे ज़ैद ही कहा जाएगा। वह सदा ज़ैद ही के नाम से पहचाना जाएगा।

अंतरवाक्य (जुम्ला--मुअतरिज़ा)

यह ज़ैद क्या है?

यह ज़ैद समष्टि-सत्ता है। जितना भी परिवर्तन घटित होता है वह व्यष्टि-सत्ता (Personal Ego) समष्टि-सत्ता ब्रह्मांड को आवृत्त करती है। ब्रह्मांड का ज्ञान व्यक्तिगत-सत्ता को प्राप्त नहीं होता। समष्टि-सत्ता से असंबद्धता उसका कारण है। यदि किसी व्यक्ति की समस्त रुचियाँ केवल उसके परिवार तक सीमित रहें तो उसकी बौद्धिक क्षमता केवल परिवार की मर्यादाओं में ही सोच सकती है। उसके अनुभव और अवलोकन भी उसी के अनुसार सीमित होंगे। यह कहना उचित होगा कि उसने अपनी बौद्धिक क्षमता को सीमित कर लिया है, यहाँ तक कि वह परिवार से बाहर देखने में अक्षम है। मनुष्य की निगाह और श्रवण केवल उसकी बौद्धिक सीमा के भीतर ही देख सकते और सुन सकते हैं। उस सीमा से बाहर न देख सकते हैं, न सुन सकते हैं। बाह्यतः तो यह प्रतीत होता है कि वह संसार के चारों ओर देख और सुन रहा है, किन्तु उसकी बुद्धि को परिवार से बाहर किसी भी वस्तु में तनिक भी रुचि नहीं होती। उसका चेतन बिल्कुल उसी छोटे बच्चे के समान होता है, जिसे आप रेडियो पर संपूर्ण विश्व की समाचार सुना दें, परन्तु वह न कुछ समझेगा, न अनुभव करेगा। यदि कोई व्यक्ति पचास वर्ष की आयु में भी केवल अपने परिवार की सीमा में ही सोचता है तो आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उसकी आयु कुछ वर्षों से अधिक नहीं मानी जा सकती। ऐसा व्यक्ति जिसका चेतन केवल अपने स्वार्थ तक सीमित है, सौ वर्ष की आयु में भी परिपक्वता को प्राप्त नहीं कर पाता। यही आधार है कि वह समष्टि-सत्ता से अनभिज्ञ रहता है। ब्रह्मांड की रंगभूमि पर उसकी स्थिति वही होती है जो किसी तीन वर्ष के बालक की किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हो सकती है। इसी कारण धर्म मानव-जीवन का अनिवार्य तत्त्व है। जिस जाति का विश्वास ब्रह्मांडीय निष्कपटता पर आधारित नहीं है वह जाति ब्रह्मांडीय मूल्यों का अवलोकन नहीं कर सकती और न उसकी बुद्धि ब्रह्मांडीय विज्ञानों तक पहुँच सकती है। उसने स्वयं को समष्टि-सत्ता से विच्छिन्न कर लिया है। ऐसी जाति हजारों वर्षों की आयु प्राप्त कर लेने पर भी पालने का शिशु बनी रहेगी।

यह रोशनी जिसे हमारी आँखें देखती हैं, व्यक्तिगत-सत्ता (एक-जात) और समष्टि-सत्ता (कुल-जात) के बीच एक आवरण है। इसी रोशनी के माध्यम से समष्टि-सत्ता के चिन्तनात्मक संकेत व्यक्तिगत-सत्ता तक पहुँचते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि समष्टि-सत्ता जो सूचनाएँ व्यक्तिगत-सत्ता को प्रदान करती है, उन सूचनाओं को यह नूर रूप, वर्ण और आयाम प्रदान कर व्यक्तिगत-सत्ता तक पहुँचाती है। इसकी उपमा दूरदर्शन से दी जा सकती है। दूरदर्शन की समतल पर वे सभी दृश्य और ध्वनियाँ प्रकट होती हैं जिन्हें प्रसारण-केंद्र से प्रेषित किया जाता है। जिस क्षण यह प्रसारण विच्छिन्न हो जाता है, न कुछ दिखाई देता है और न ही सुनाई पड़ता है। यही स्थिति समष्टि-सत्ता से आने वाली सूचनाओं की है। मानव-जाति के प्रत्येक व्यक्ति को रोशनी के माध्यम से ही सूचनाएँ प्राप्त होती हैं। जिस प्रकार सूचना आती है, मनुष्य उसी प्रकार देखता और जानता है। जब किसी व्यक्ति से सूचना का नेहर रुक जाता है, तब उसकी मृत्यु घटित हो जाती है; किन्तु यह विच्छेद केवल सांसारिक लोक से होता है। अर्थात जीवन की एक समतल से व्यक्ति विच्छिन्न हो जाता है, किन्तु दूसरी समतल से (जिसे हम "ग़ैब" कहते हैं) सूचनाएँ आती रहती हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि जिस रोशनी के द्वारा हमारी आँखें देखती हैं, उसी रोशनी की भी दो समतल हैं। एक समतल में इन्द्रियों के अनुभव में गुरुत्व और आयाम दोनों सम्मिलित हैं; किन्तु समतल समतल केवल आयाम की है। आयाम की समतल रोशनी की गहनता में स्थित है। रोशनी हमें जो ऊपरी समतल से सूचनाएँ देती है, उन्हें इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष देखती और सुनती हैं; परन्तु जो सूचनाएँ निचली समतल से आती हैं, उनकी ग्रहण-प्रक्रिया में एक प्रतिरोध अवश्य होता है। यही कारण है कि इन्द्रियाँ उन सूचनाओं को पूर्णतः ग्रहण नहीं कर पातीं। वास्तव में, ऊपरी समतल की सूचनाएँ ही निचली समतल से आने वाली सूचनाओं के मार्ग में अवरोध बन जाती हैं। जैसे कोई दीवार खड़ी हो जाती है। यह दीवार इतनी कठोर होती है कि हमारी इन्द्रियाँ प्रयास करने पर भी उसे पार नहीं कर सकतीं। ऊपरी समतल की सूचनाएँ दो प्रकार की होती हैं:

. वे सूचनाएँ जो स्वार्थ या प्रयोजन पर आधारित हों उनके प्रति हमारा दृष्टिकोण पक्षपाती होता है।
. वे सूचनाएँ जो किसी व्यक्तिगत स्वार्थ से सम्बद्ध न हों उनके प्रति हमारा दृष्टिकोण निष्पक्ष होता है।

इन दोनों प्रकार की सूचनाओं के आलोक में विचार किया जाए तो यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के पास बोध के दो कोण हैं। एक कोण वह है जो व्यक्तित्व तक सीमित है; दूसरा वह है जो व्यक्तित्व की सीमाओं से बाहर है। जब हम व्यक्तित्व के भीतर देखते हैं, तो ब्रह्मांड सम्मिलित नहीं होता; किन्तु जब हम व्यक्तित्व से बाहर देखते हैं, तो ब्रह्मांड सम्मिलित हो जाता है। उस कोण में, जिसमें ब्रह्मांड सम्मिलित है, हम ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु के साथ अपना बोध करते हैं। यह बोध की क्रिया बार-बार घटित होती है, और इसे ही हम प्रयोगात्मक जगत कहते हैं। एक ओर मनुष्य ब्रह्मांड को अपनी व्यक्तिगत सीमा में देखने का आदी है, और दूसरी ओर अपनी व्यक्तिगत सीमा को ब्रह्मांड में देखने का आदी है। वह एक ओर व्यक्तिगतता की व्याख्या करता है, दूसरी ओर ब्रह्मांड की। जब ये दोनों व्याख्याएँ आपस में टकराती हैं, तो व्यक्तिगतता की व्याख्या को सत्य सिद्ध करने के लिए तर्क और व्याख्या का सहारा लिया जाता है। कभी-कभी इस तर्क-व्याख्या के समर्थक अपने प्रतिद्वन्द्वियों से संघर्षरत हो जाते हैं। यहीं से विचारधाराओं का संघर्ष प्रारम्भ होता है। व्यक्तित्व एक व्यक्ति, एक समुदाय या पूरी एक क़ौम पर सम्मिलित हो सकता है। व्यक्तित्व के दृष्टिकोण की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह किसी किसी चरण में ब्रह्मांड और वस्तुओं से विमुख हो जाता है।  इस कोण में निगाह हमेशा ग़लत देखती है। उदाहरण के लिए, किसी वस्तु का आकार(SIZE) वायु में कुछ और प्रतीत होता है, जल में कुछ और। यह निगाह का अंतर काल और अकालिक की बन्धनों के कारण है। जब तक दृष्टा काल अकालिक से मुक्त न हो, किसी वस्तु की वास्तविकता को प्राप्त नहीं कर सकता।

Topics


Loh o Qalam (Hindi)

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai