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उपरोक्त विमर्श को समझने के लिए गोलक-गति का विवेचन आवश्यक है। ब्रह्माण्ड एक ऐसा बिन्दु (नुक़्ता) है जिसे हमें अपने ज़ेह्न में अनुमित रूप से मानना पड़ता है। यही ब्रह्माण्डीय अस्तित्व का गूढ़ रहस्य है। बिन्दु गणितीय परिभाषा में न लम्बाई रखता है, न चौड़ाई, न गहराई। वह केवल चेतना (शऊर) की रचना है। यही बिन्दु चेतन-बिन्दु से यात्रा कर के इन्द्रिय-अवगाहन बनता है। इसका
इन्द्रिय-अवगाहन बन जाने का तरीका अत्यन्त सरल है। सबसे पहले
यह समझना आवश्यक है कि चेतना अपने आप में क्या है। चेतना स्वयं को स्थिर
रखती है और निरन्तर स्वस्मरण (याद-दहानी) में संलग्न रहती है। चेतना निरन्तर यह उद्घोषणा करती रहती है: “मैं हूँ, मैं यह हूँ, मैं वह हूँ, मैं चन्द्रमा को देख रहा हूँ, मैं सूर्य को देख रहा हूँ, मैं तारों का अवलोकन कर रहा हूँ, मेरे हाथ में पुस्तक है, मेरे हाथ में लेखनी है।” ये सभी उद्घोषणाएँ चेतना द्वारा निर्मित चित्र-रूप हैं। चेतना इन चित्रों का जिस ढंग से उपयोग करती
है, उस ढंग के अनेक नाम हैं। उनमें से एक नाम है निगाह । निगाह एक साथ दो केन्द्रों में देखती है—एक केन्द्र की समतल ग़ैब (अदृश्य) है, दूसरी समतल शुहूद (दृश्य) है। ग़ैब की समतल निगाह की व्यक्तिगतता (इन्फ़िरादियत) है, और शुहूद की समतल निगाह की सामूहिकता (इज्तिमाइयत)। वास्तव में इन दोनों सतहों में एक ही निगाह सक्रिय है। यदि हमारी
नेत्रों के समक्ष बादाम का एक वृक्ष हो, तो हमारा उद्घोष होगा: “यह बादाम का वृक्ष है।” और जब हम किसी अन्य व्यक्ति से पूछें, तो वह भी कहेगा: “यह बादाम का
वृक्ष है।” हम लाखों मनुष्यों से पूछेंगे, और उत्तर एक ही होगा। इस अनुभव से
यह यथार्थ उद्घाटित होता है कि उन लाखों मनुष्यों में देखने वाली निगाह एक और केवल एक है। यदि दृष्टियाँ वास्तव में अनेक होतीं तो
उनके अवलोकन भी भिन्न-भिन्न होते—क्योंकि अनेकरूपता का तात्पर्य है भिन्नता। परन्तु अनुभव यह गवाही देता है कि निगाह अनेक नहीं
है। अतः कहना पड़ेगा कि निगाह चेतना की एक प्रकार (तर्ज़) है, या चेतना की एक समतल (पृष्ठभाग) है। यही समतल सामूहिक है, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड सहभागी है। इस सामूहिक समतल
को ही हम इन्द्रिय-अवगाहन (इद्राक बि-ल-हवास) कहते हैं। यही सामूहिक समतल ब्रह्माण्ड है। और स्पष्ट है कि यह सामूहिक समतल भी व्यक्ति ही का अंश है। व्यक्ति से पृथक कोई सत्ता नहीं है।