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कालिकता (मक़ानियत) और कालिकता (ज़मानियत) का रहस्य

 

क़ुरआन पाक के इन शब्दों وَمِنْ كُلِّ شَيْءٍ خَلَقْنَا زَوْجَيْنِ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ में ईश्वर ने कालिकता (मक़ानियत) और कालिकता (ज़मानियत) का रहस्य प्रकट किया है।

किसी भी वस्तु के अस्तित्व में तीन प्रकार की धाराएँ होती हैं। एक प्रवृत्ति (अहवाल) अवस्थाओं की है, दूसरी प्रवृत्ति (आसार) चिह्नों की है और तीसरी प्रवृत्ति इन दोनों का समाहार है, जिसे (अहकाम) कहा जाता है। किसी वस्तु के दो प्रकार होने से अभिप्राय उसके दो पक्ष हैं। ये दोनों पक्ष एक-दूसरे के विपरीत होते हैं, किन्तु एक-दूसरे से पूर्णतः जुड़े भी रहते हैं। यद्यपि विपरीत होने का कारण उनके गुणों का भेद (जैसे कर्ताकार्य, बनाने वालाबनाया हुआ) उन्हें अलग-अलग कर देता है, तथापि इन दोनों का समष्टि ही वस्तु का अस्तित्व कहलाती है। दूसरे शब्दों में, जब ये दोनों पक्ष एकत्र होते हैं, तो उनकी सामूहिकता ही अनुभूत वस्तु बन जाती है। वस्तु का एक पक्ष संवेदक (अनुभव करने वाला) होता है, और वस्तु का दूसरा पक्ष अनुभूत (जो अनुभव किया जाता है) तसव्वुफ़ की भाषा में वस्तु का संवेदनशील पक्ष अहल (अहवाल) कहलाता है, और उसका अनुभूत पक्ष आसार कहलाता है। इन दोनों का संयुक्त नाम अहकाम है। धर्म की भाषा में इसी को अमर--रब्बी कहा जाता है।

अतः अमर--रब्बी के दो पक्ष या दो अवयव हुए। एक पक्ष अहल (अहवाल) है जो गुण और क्षमता का जानने वाला या उसका उपयोग करने वाला है। दूसरा पक्ष आसार है जो गुण और क्षमता स्वयं है। ये दोनों अवयव मिलकर एक अमर--रब्बी की हैसियत रखते हैं। दोनों अवयव आपस में जुड़े होने के बावजूद एक-दूसरे से भिन्न हैं। वास्तव में यही विभाजन वह क्रिया है जो अवतरण (तनज़्ज़ुल) के बाद एक निगाह से काल (ज़मान) और दूसरी निगाह से स्थान (मकान) कहलाती है। जब यह क्रिया अनुभूति की ज़ेहन की सीमाएँ के चारों ओर घटित होती है तो उसका नाम काल है, और जब यह क्रिया अनुभूति के रूप-आकार की सीमाओं के चारों ओर घटित होती है तो उसका नाम स्थान है।

यदि ईश्वर वस्तुओं के अस्तित्व को जोड़े-जोड़े में न रचते, तो यह मध्यस्थ क्रिया जो काल और स्थान बनती है उत्पन्न ही न होती। यह क्रिया तब प्रकट होती है जब वस्तु के अस्तित्व में आयाम उत्पन्न हो जाते हैं। और आयामों का उद्भव प्रतिमा-लोक (आलम--मिसाल) में होता है, आत्मा-लोक (आलम--अरवाह) में नहीं होता। इसी कारण आत्मा-लोक में न तो काल होता है और न ही स्थान। वहाँ वस्तु का अस्तित्व केवल आदेश-रूप (अमर--शक़्ल) होता है, गतिशील आदेश नहीं होता। अतः नस्मा की दुनिया वहीं से आरम्भ होती है जहाँ से गति का उदय होता है।

तम्सील: उदाहरण जैसे नमाज़ पढ़ने वाले के ज़ेहन में जब नमाज़ की अनुभूति उत्पन्न होती है तो उसके दो पक्ष होते हैंएक पक्ष स्वयं नमाज़ की रूप-रचना (हैयत) है और दूसरा पक्ष नमाज़ का अनुभव करने वाला चेतन मन

यदि ऊपर उल्लिखित ईश्वर के आदेश की और अधिक व्याख्या की जाए तो अनुभूति के अनेक द्वैतीय पक्षों का उल्लेख करना पड़ेगा। इनमें से एक पक्ष सामान्य और दूसरा विशेष है। विशेष पक्ष का उल्लेख हम कर चुके हैं। इसके सम्मुख अनुभूति का सामान्य पक्ष वह है जो प्रबल (ग़ालिब) का दर्जा रखता है। इस अवसर पर शख़्से-अकबर (व्यापक पुरुष) का उल्लेख करना आवश्यक है। अर्थात् शख़्स (व्यक्ति) के भी दो पक्ष हैं एक शख़्से-अकबर और दूसरा शख़्से-असगर शख़्से-अकबर की प्रकृति प्रबल की है और शख़्से-असगर की स्थिति अप्रबल की है। एक प्रकार से हम इन दोनों को जाति (प्रकार) और व्यक्ति (फर्द) का नाम भी दे सकते हैं जिनमें से एक मूल (मसदर) है और दूसरा उपजात (मुश्तक़) अतः यदि हम सामान्य अनुभूति का वर्णन करें तो उस अनुभूति को शख़्से-अकबर की अनुभूति माना जाएगा।

पिछले पृष्ठों में शख़्से-अकबर का उल्लेख हुआ है। यहाँ उसके विषय में संक्षेप में बताना आवश्यक है।

ईश्वर ने क़ुरआन पाक में फ़रमाया है:وَعَلَّمَ آدَمَ الأَسْمَاءَ كُلَّهَا           

अनुवाद: और ईश्वर ने हज़रत आदम (अलैहिस्सलातो वस्सलाम) को (उन्हें उत्पन्न करके) सब वस्तुओं के नाम (उन वस्तुओं के गुण और प्रभाव सहित) सिखा दिए। अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि और धरती पर मौजूद सभी वस्तुओं के नाम और उनके गुण-धर्म आदम को प्रदान कर दिए। सुरक्षित पट्टिका की पारिभाषिक भाषा में अस्मा उन शीर्षकों और विशेषताओं का नाम है जिनके द्वारा वस्तुओं की प्रकृति और वास्तविकता का बोध कराया जाता है।

उस रुकू का आरंभिक श्लोक में ईश्वर ने आदम को अपना नायब (प्रतिनिधि) बनाने का उल्लेख किया है और दूसरी आयत में यह स्पष्ट कर दिया है कि मैंने आदम को इल्म-उल-अस्मा प्रदान किया है। अब यदि हिकमत--तक़्वीन (सृष्टि की गूढ़ व्यवस्था) की रोशनी में इन दोनों के संबंध को खोजा जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ईश्वर की नायबी का संबंध इल्म-उल-अस्मा से अत्यन्त गहरा है।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai