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ईश्वर
का कोई नाम वास्तव में एक तजल्ली है। यह तजल्ली ईश्वर के एक विशेष गुण की धारक
होती है और इस तजल्ली के साथ गुण-नहर-एकी
तजल्ली और गुण-रहमत की तजल्ली भी सम्मिलित होती है। इस प्रकार हर गुण की
तजल्ली के साथ दो तजल्ली और होती हैं। अर्थात् हर नाम तीन तजल्लीओं का समष्टि है।
एक तजल्ली गुण-नाम की, दूसरी तजल्ली गुण-नहर-एकी, तीसरी
तजल्ली गुण-रहमत की। फलत किसी
तजल्ली के नाम को इस्म कहा जाता है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि हर नाम सामूहिक हैसियत
में दो गुणों पर आधारित है। एक स्वयं तजल्ली और एक तजल्ली का गुण। जब हम ईश्वर का
कोई नाम मन में पढ़ते हैं या जिह्वा से उच्चारित करते हैं तो एक तजल्ली अपने गुण
के साथ गति में आ जाती है। इस गति को हम ज्ञान कहते हैं जो वस्तुतः ईश्वर के ज्ञान
का प्रतिबिम्ब है। यह गति तीन अवयवों पर आधारित है।
पहला
अवयव तजल्ली है जो सूक्ष्म तत्त्व-अख़फ़ा
के भीतर अवतरित होती है।
दूसरा अंश तजल्ली का गुण है, जो सूक्ष्म
तत्त्व-ए-सिरी में अवतरण करता है।
तीसरा अवयव
उस तजल्ली के गुण की संरचना है जो सूक्ष्म तत्त्व-कल्पी
में अवतरित होती है और यही अवयव निगाह है और इसी अवयव की कई गतियाँ हैं जो एक के
बाद एक सूक्ष्म तत्त्व-कल्पी ही में घटित होती हैं। वाणी और श्रवण, घ्राण
और गंधज्ञान हैं। अब यह घ्राण और गंधज्ञान एक और गति के ज़रिये रंगों के आकार-प्रकार
बनकर सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी को अपनी तरफ़ खींचते हैं। सूक्ष्म तत्त्व-कल्पी
और सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी की यही दरमियानी आकर्षण क्रिया या परिणाम है।
इसी
तरह आत्मा तीन गतियाँ करती है जो एक साथ प्रकट होती हैं। पहली गति किसी वस्तु का
जानना है जिसका अवतरण सूक्ष्म तत्त्व-अख़फ़ा
में होता है। दूसरी गति अनुभव करना है जिसका अवतरण सूक्ष्म तत्त्व-सिर्री
में होता है। तीसरी गति इच्छा और क्रिया है जिसका अवतरण सूक्ष्म तत्त्व-कल्पी
और सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी में होता है। प्रत्येक गति साबिता से प्रारम्भ होकर जवैया
पर समाप्त हो जाती है। जैसे ही साबिता के सूक्ष्म तत्त्व-अख़फ़ा
में जानना घटित हुआ,
सूक्ष्म
तत्त्व-ख़फ़ी ने उसे रिकार्ड कर लिया। फिर जैसे ही अयन के सूक्ष्म
तत्त्व-सिर्री में अनुभव करना घटित हुआ, सूक्ष्म
तत्त्व-रूह़ी ने उसे रिकार्ड कर लिया। फिर जवैया के सूक्ष्म तत्त्व-कल्पी
में उसकी क्रिया घटित हुई और सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी
ने उसे रिकार्ड कर लिया। साबिता ने जाना, अअयान ने अनुभव किया और जवैया ने क्रिया की। ये तीनों
गतियाँ एक साथ प्रारम्भ हुईं और एक साथ समाप्त हो गईं। इस प्रकार जीवन क्षण-प्रतिक्षण
गति में आता रहा।
व्यक्ति
के जीवन से संबंधित ज्ञान की सभी तजल्लीयाँ साबिता में, विचार
की सभी तजल्लीयाँ अअयान में और क्रिया के सभी चिन्ह जवैया में रिकार्ड हैं।
सामान्य अवस्था में हमारी निगाह इस ओर कभी नहीं जाती कि अस्तित्वगत सभी पिण्डों और
व्यक्तियों में एक गुप्त सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध की खोज सिवाय आध्यात्मिक जन के और
किसी प्रकार के विद्वान अथवा कलाकार नहीं कर सकते, जबकि
इसी सम्बन्ध पर ब्रह्मांड के जीवन का आश्रय है। यही सम्बन्ध सभी आकाशीय पिण्डों और
पिण्डों में रहने वाले चेतन और अचेतन व्यक्तियों को एक-दूसरे
के परिचय का कारण है।
हमारी निगाह
जब किसी तारे पर पड़ती है तो हम अपनी निगाह के माध्यम से तारे के मानवीय
रूप को
अनुभव करते हैं। तारे का बशर्रा कभी हमारी निगाह को अपने दृश्य से नहीं रोकता। वह
कभी नहीं कहता कि मुझे मत देखो। यदि कोई गुप्त सम्बन्ध विद्यमान न होता तो
प्रत्येक तारा और प्रत्येक आकाशीय दृश्य हमारी जीवन को स्वीकार करने में कोई न कोई
बाधा अवश्य उत्पन्न करता। यही गुप्त सम्बन्ध सम्पूर्ण ब्रह्मांड के सभी व्यक्तियों
को एक-दूसरे के साथ सम्बद्ध किए हुए है।
यहाँ
इस सत्य का उद्घाटन होता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक ही सत्ता की सम्पत्ति है।
यदि ब्रह्मांड के विभिन्न पिण्ड विभिन्न सत्ताओं की सम्पत्ति होते तो निश्चय ही एक-दूसरे
के परिचय में संघर्ष उत्पन्न हो जाता। एक सत्ता की सम्पत्ति दूसरी सत्ता की
सम्पत्ति से परिचित होना कभी स्वीकार न करती। कुरआन पाक ने इसी स्वामी सत्ता का
परिचय शब्द अल्लाह से कराया है। पवित्र नामों में यही शब्द अल्लाह
नाम-स्वरूप है।
नाम-ए-ज़ात स्वामित्वाधिकार अधिकार
रखने वाली सत्ता का नाम है और नाम-ए-गुण
सामर्थ्यवान अधिकार रखने वाली सत्ता का नाम है। ऊपर की पंक्तियों में ईश्वर के
दोनों गुण—रहमत और क़ुदरत—का
उल्लेख हुआ है। प्रत्येक नाम सामर्थ्यवान गुण रखता है और नाम-ए-ज़ात
मालिकाना अर्थात् सृजनशीलता के अधिकार का धारक है। इसे सूफ़ी भाषा में रहमत कहा
जाता है। इसलिए प्रत्येक गुण के साथ ईश्वर का सामर्थ्यवान और करुणामय गुण अनिवार्य
रूप से आता है। यही दो गुण समस्त सृष्टि के सभी प्राणियों के बीच गुप्त संबंध की
स्थिति रखते हैं। अर्थात् सूर्य का रोशनी धरतीवासियों की सेवा से इसलिए इनकार नहीं
कर सकता क्योंकि धरती और सूर्य एक ही सत्ता की संपत्ति हैं। वह सत्ता स्वामित्वाधिकार अधिकार
में शासनकारी शक्तियों से सम्पन्न भी है और उसकी रहमत तथा शक्ति किसी भी समय यह
स्वीकार नहीं करती कि उसकी संपत्तियाँ एक-दूसरे
की पहचान से इंकार कर दें, क्योंकि ऐसा होने से उसकी नहर-एपर
आक्षेप आता है। इस प्रकार प्रत्येक सृजन-बिंदु
पर ईश्वर के दो गुण—नहर-एऔर रहमत—का
प्रभावी होना अनिवार्य है। इसलिए यही दोनों गुण ब्रह्मांड के प्राणियों का
पारस्परिक संबंध हैं।
अब यह
सत्य प्रकट हो जाता है कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था के निर्माण, संयोजन
और संपादन पर ईश्वर के दो नामों का शासन है—एक नाम
"अल्लाह" और
दूसरा नाम "क़दीर"। सभी
नाम-ए-गुणों में से प्रत्येक नाम इन दोनों नामों के साथ जुड़ा हुआ
है। यदि ऐसा न होता तो ब्रह्मांड के प्राणी एक-दूसरे
से परिचित न रह सकते थे और न ही उनकी पारस्परिक सेवा संभव होती।