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सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी की गति

 

जब निद्रा से नेत्र खुलते हैं तो सबसे पहली गति पलक झपकने की होती है। पलक झपकने की क्रिया नेत्र-बासिरा )निगाह) को गति देती है। बासिरा ऐसी स्थिति है जो किसी वस्तु से अवगत होने की पुष्टि करती है, इस प्रकार कि वह वस्तु उस समय उपस्थित है। अर्थात् किसी वस्तु का मानसिक रूप से बोध प्राप्त है। यह क्रिया स्मृति से सम्बंधित बात है किन्तु जब स्मृति अपनी स्मरण-शक्ति को ताज़ा करना चाहती है या कोई बाहरी अनुभव स्मृति में किसी चिन्ह को जाग्रत करता है, उस समय बासिरा जो पलक के निरंतर क्रिया से उस बोध के रूप-रेखाओं और आकृति को देखने योग्य हो चुकी है, उसके सामने होने की पुष्टि करती है। पलक झपकने की यह क्रिया उसी समय आरम्भ होती है जब सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी गति में आ चुका हो। सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी की गति किसी वस्तु की ओर प्रवृत्ति उत्पन्न करने की शुरुआत करती है। सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी के सक्रिय होने पर मनुष्य की सूक्ष्म संवेदना अर्थात् निगाह प्रवृत्ति का आरम्भ करती है। नेत्र खुलते ही अवचेतन रूप से मनुष्य की यह इच्छा होती है कि वह जाने कि चारों ओर क्या वस्तुएँ विद्यमान हैं और वातावरण में किस प्रकार की आकृतियाँ पाई जाती हैं। वह उन सबकी जानकारी चाहता है और ऐसी जानकारी चाहता है जो प्रमाणित हो। जब तक मनुष्य की अपनी संवेदनाओं में कोई ऐसी इन्द्रिय न हो जो विद्यमान वस्तुओं की पुष्टि करने वाली हो, वह संतुष्ट नहीं होता। अतः सबसे पहले उसकी निगाह यह कार्य सम्पन्न करती है। आँखें बंद होने की स्थिति में निगाह का कार्य स्थगित था। पलक झपकते ही वह स्थगन समाप्त हो गया और निगाह पुनः क्रियाशील हो उठी।

नियम: संयोजन के नियमों में से एक नियम यह है कि जब तक नेत्रों के परदे गति न करें और नेत्रों के गोलकों पर आघात न डालें, नेत्र की नसें कार्य नहीं करतीं। उन नसों की संवेदनाएँ उस समय कार्य करती हैं जब उनके ऊपर नेत्रों के परदों का आघात पड़ता है। सिद्धांत यह हुआ कि बंद नेत्र जैसे ही खुलते हैं पहले दो-तीन क्षणों के लिए खुल कर स्थिर हो जाते हैं। यह स्थिरता सूक्ष्म तत्त्व-अख़फ़ा की गति को समाप्त करती है, जिसके बाद तुरंत जैसे ही सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी की केंद्रता को स्पंदन होता है, झुकाव, प्रवृत्ति या इच्छा की शुरुआत हो जाती है। उदाहरणार्थ, जाग्रत व्यक्ति अपने चारों ओर को जानना चाहता है और अपने वातावरण को समझने की ओर उन्मुख होता है। यह सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी की पहली गति है। इस झुकाव या इच्छा के बाद और इच्छाएँ लगातार और एक के बाद एक उत्पन्न हो जाती हैं। जब तक सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी की गति बन्द न हो यह सिलसिला जारी रहता है और बसारत की तरह शरीर-मानव की समस्त इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई इच्छाओं की पुष्टि, प्रमाण और परिपूर्ति में लगी रहती हैं। यदि सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी की रोशनी किसी ओर झुकाव करती है तो मनुष्य के सभी अनुभव अपने द्वार उसी ओर खोल देते हैं। इन्द्रियों में सबसे अधिक सूक्ष्म इन्द्रिय बसारत है जो सबसे पहले सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी के रोशनी से प्रभावित होती है। यह रोशनी मनुष्य को प्रारम्भ में कल्पना-लोक से परिचित कराती है। इस लोक में ज़ेह्न दो प्रकार की छवियाँ प्रस्तुत करता है। एक प्रकार वह है जो भावात्मक छवियों पर आधारित होती है और दूसरा प्रकार चित्रात्मक छवियाँ होती हैं। भावात्मक छवियों से यह अभिप्राय नहीं है कि ज़ेह्न-मानव में कोई भाव बिना आकार या बिना रूपरेखा के आ सकते हैं। भावों की प्रकृति चाहे जितनी सूक्ष्म हो आकार और रूपरेखा पर ही आधारित होती है। पहले पहल जब शक्ति-बासिरा गति करती है तो निगाह बाहरी वस्तु को भीतरी में और भीतरी वस्तुओं को बाहरी में देखती है। इस तात्पर्य की व्याख्या के लिए दर्पण का उदाहरण दिया जा सकता है।

उदाहरण: दर्पण का उदाहरण एक रूप में हम पहले बयान कर चुके हैं। दूसरी रूप यह है कि दर्पण देखने वाली निगाह को चकाचौंध कर देता है और उसकी प्रतिमा को, जो उसके सामने है, निगाह पर प्रकट कर देता है।

यह वह देखना है जो भीतर से बाहर आकर दृश्य का रूप धारण करता है। इसके विपरीत जब देखने की क्रिया बाहर से भीतर की ओर होती है तो कोई मुहीज (जो वस्तु किसी इन्द्रिय के माध्यम से ज़ेह्न-मानव को अपनी उपस्थिति का अनुभव कराती है उसे मुहीज कहते हैं) निगाह के सामने आकर स्वयं निगाह को दर्पण की स्थिति प्रदान करता है और अपने रूपरेखाओं से ज़ेह्न-मानव को सूचना देता है। जब इन दोनों कोणों में निगाह डालकर शोध किया जाता है तो यह बात उद्घाटित हो जाती है कि ज़ेह्न-मानव हर स्थिति में दर्पण का काम करता है और यही एक साधन है जिससे आत्मा--मानव अपनी छवियों को मूर्त आकार और रूप में देखती है।

यह निष्कर्ष निकलता है कि मानव-मन में वस्तुओं की उपस्थिति का अनंत क्रम निरंतर स्थापित रहता है। जिस मन में वस्तुओं की उपस्थिति का यह क्रम विद्यमान है, वह मन सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी (लतीफ़े-नफ़्सी) के अनवार की रचना है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि सूक्ष्म तत्त्व-नफ़्सी की रोशनियाँ याँ अपनी व्यापकता के अनुसार अनंत सीमाओं तक फैली हुई हैं। यदि इन अनंत रोशनियों की सीमा-निर्धारण करना हो तो समस्त ब्रह्मांड को इन असीम रोशनियों में आबद्ध स्वीकार करना पड़ेगा। ये रोशनियाँ अस्तित्वगत तत्व की प्रत्येक वस्तु का आवरण करती हैं। इनके आवरण से बाहर किसी वहम, ख़याल या छवि का निकल पाना असंभव है। तसव्वुफ़ की भाषा में रोशनी के इस मंडल को जवैया कहा जाता है। जवैया में जो कुछ घटित हो चुका है या वर्तमान में घट रहा है अथवा भविष्य में घटेगा, वह सब मानव-स्वरूप की निगाह के सामने है। बाहरी जगत के भीतर जो कुछ विद्यमान है, जाग्रत अवस्था में निगाह उसकी पुष्टि करती है। यदि निगाह की पहुँच वहाँ तक न हो तो छवियाँ उसके अस्तित्व की ओर संकेत कर देती हैं। यदि छवियों की पकड़ भी वहाँ तक न पहुँचे तो ख़याल अर्थबोधक रूप में उसे प्रस्तुत कर देती है। यदि कोई वस्तु कल्पना की सीमाओं से भी परे है तो वहम किसी न किसी प्रकार उसकी उपस्थिति का अनुभव करा देता है। सिद्धांततः यह स्वीकार करना पड़ता है कि जवैया की रोशनियाँ  याँ मानव-स्वरूप को अनंत सीमाओं तक व्यापक बना देती हैं।

साक्षात्कार के धारकों (साहिबाने-शुहूद) ने आध्यात्मिक विकास (सुलूक) की राहों में निगाह को "जुय्या" की समस्त व्यापकताओं में देखने पर विवश किया है। नबियों की शिक्षाओं में इस प्रयास का प्रथम पाठ दिन-रात के भीतर इक्कीस घंटे बीस मिनट जाग कर पूरा किया जाता है।

नबियों की शिक्षाएँ अर्थात ज्ञान-बोध की पद्धति का दूसरा पाठ अंधकार में लंबे समय तक बिना पलक झपकाए निगाह जमाना है। पहले अभ्यास को तक़वीन और दूसरे अभ्यास को इस्तिर्ख़ा कहा जाता है।

हज़रत ओवैस क़रनी (रज़ि.) के निवास पर जब इब्ने-हिशाम भेंट करने पहुँचे तो उन्हें बहत्तर घंटे अर्थात तीन दिन और तीन रातें प्रतीक्षा करनी पड़ी। लगातार बहत्तर घंटे नफ़्ल नमाज़ पढ़ने के पश्चात हज़रत ओवैस क़रनी (रज़ि.) ने यह दुआ की:

बार--इलाही! मैं अधिक सोने से और अधिक खाने से केवल तेरी ही पनाह माँगता हूँ।

एक सूफ़ी इसी प्रकार लगातार जागते रहने से अपने भीतर साक्षात्कार की शक्तियों को जाग्रत कर लेता है। इसका संक्षिप्त उल्लेख पहले किया जा चुका है कि मानव में ऐसी क्षमताएँ निहित हैं जो समय-समय पर अपने गुणों का प्रकटीकरण करती रहती हैं। बासिरा मानव की एक इंद्रिय है। यहाँ उसकी रचना और संरचना का वर्णन किया जाता है।

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लोह़ ओ कलम Loh o Qalam

Qalandar Baba Aulia Rahmatullah Alai